नई दिल्‍ली, जागरण संवाददाता। प्रदूषण बढ़ने की स्थिति में ऑड-इवेन व्यवस्था हालात पर काबू पाने का एक कारगर उपाय है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन किसी भी व्यवस्था को लागू करने का एक तरीका होता है। अगर इसे राजनीतिक स्तर पर लागू किया जाएगा तो फायदा कम और जनता को परेशानी ही ज्यादा होगी। इसके तहत छूट भी केवल पर्यावरण अनुकूल वाहनों और अनिवार्य सेवाओं से जुड़े वाहनों को ही दी जानी चाहिए, इसके अतिरिक्त किसी को नहीं। हालांकि यह प्रदूषण कम करने का अस्थायी उपाय है, प्रयास स्थायी प्रयासों को बढ़ावा दिए जाने का किया जाना चाहिए।

पर्याप्त परिवहन व्यवस्था तक नहीं

इसमें कोई विरोधाभास नहीं है कि ऑड-इवेन के लिए सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था ऑड इवेन के लिए रीढ़ की तरह है। लेकिन दिल्ली की अगर बात करें तो यहां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था बहुत कमजोर है। सन् 2012-13 में दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के पास 5,445 बसों का बेड़ा था, जबकि आज डीटीसी के बेड़े में महज 3,600 बसें ही रह गई हैं। 2013 में डीटीसी की क्षमता प्रतिदिन 46.77 लाख यात्रियों को ढोने की थी, जो अब केवल 29.86 लाख रह गई है। पर्याप्त बसें न होने के कारण ही डीटीसी बसों में प्रतिदिन 16.91 लाख यात्रियों की कमी आ गई है।

जनहित से ज्यादा राजनीतिक कदम

मेरा मानना है कि पिछली दो बार की तरह इस बार भी दिल्ली सरकार ऑड-इवेन को लेकर पूरी तरह तैयार नहीं है। महज दो हजार अतिरिक्त बसों से लाखों यात्रियों को समायोजित करना नामुमकिन है। दिल्ली में 33 से 34 लाख कारें हैं। इनमें से अगर 16-17 लाख कारों पर ऑड-इवेन के तहत प्रतिबंध लगाया जाता है तो इतने यात्री मंजिल तक कैसे पहुंच पाएंगे? अगर सार्वजनिक परिवहन प्रणाली सही मायनों में मजबूत होती तो यह निर्णय अवश्य प्रभावी हो सकता था। दूसरे इस बार भी इस व्यवस्था में पिछली बार की तरह छूट के जितने प्रावधान जारी रखे गए हैं, उससे यह निर्णय भी स्कूल बंद करने की तरह राजनीतिक ही ज्यादा साबित होगा, जनहितकारी नहीं।

सालाना नौ फीसद तक कम हो रही है यात्रियों की संख्या

मेरा सुझाव है कि अस्थायी कदम उठाने से कोई फायदा नहीं मिलने वाला। सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को बढ़ाना जरूरी है। लेकिन, दिल्ली में बस यात्रियों की संख्या 2013 से ही हर साल औसतन नौ फीसद तक कम हो रही है। 2013 से अब तक यह संख्या 34 फीसद कम हो चुकी है। बसों की आवृत्ति और संख्या बढ़ाया जाना जरूरी है। पिछले तीन साल से डीटीसी में एक भी नई बस नहीं जुड़ी है। इस बार भी दिल्ली सरकार भले ही ऑड-इवेन से वायु प्रदूषण कम करने का दावा ठोक रही हो, लेकिन आंकडे़ बयां करते हैं कि पहले भी जब दो बार ऑड-इवेन लागू किया गया था तो वायु प्रदूषण में कोई कमी नहीं आई थी। इससे यातायात व्यवस्था में तो सुधार संभव है, पर हवा की बेहतरी नहीं।

पहले भी हुए लागू मगर नहीं मिला कोई नतीजा

पहले भी दिल्ली सरकार ऑड-इवेन लागू कर चुकी है, लेकिन कोई उल्लेखनीय नतीजे सामने नहीं आए। सामान्य दिनों की तुलना में इस दौरान पीएम 2.5 में जरा भी कमी नहीं आई। दोनों बार यह खराब, बहुत खराब व गंभीर श्रेणी में दर्ज किया गया। इसलिए ऑड-इवेन तभी लागू किया जाना चाहिए जब सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था मजबूत हो और इसमें छूट की गुंजाइश कम हो।

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Posted By: Prateek Kumar

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