नई दिल्ली (शुजाउद्दीन)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पकौड़े वाले बयान पर इन दिनों सियासी बयानबाजी का दौर चल रहा है। दिल्ली में तीस साल से रेहड़ी लगा पकौड़े बेचने वाले विजय कुमार इससे खासे आहत हैं। उनका कहना है कि जिस पकौड़ा व्यवसाय को कुछ राजनीतिक दलों ने मजाक बनाकर रख दिया है, उसी व्यवसाय ने उन्हें जीवन की हर खुशी दी है।

बकौल विजय, पकौड़े बेच कर ही मैं हर उस सपने को पूरा कर सका, जो कभी मेरे लिए नामुमकिन था। बता दें कि हालही दिए एक टीवी इंटरव्यू में पीएम मोदी ने पकौड़े बेचने वाले को भी रोजगार में रत बताया था। देश में नए रोजगारों के सृजन को लेकर पीएम से एक सवाल पूछा गया था।

मोदी की बातों से सहमत हैं विजय

45 वर्षीय विजय पीएम मोदी की बात से सौ फीसद सहमति जताते हुए कहते हैं कि मैं कभी खुद रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहा था, लेकिन पकौड़े बेच कर आज दूसरों को रोजगार देने के काबिल बना हूं।

पकौड़े से मिली पहचान

विजय उन नेताओं के प्रति नाराजगी व्यक्त करने से भी नहीं चूकते, जो पकौड़े बेचने वालों को कमतर करार दे रहे हैं और उनके व्यवसाय को रोजगार नहीं मानते हैं। अतीत को याद करते हुए विजय की आंखें भर आईं। गीता कॉलोनी छह व 11 ब्लॉक चौक पर पंजाब दे मशहूर पकौड़े के नाम से रेहड़ी चलाने वाले विजय कहते हैं कि पकौड़े से मिली पहचान को वह ताउम्र भुला नहीं सकते।

35 साल पहले पंजाब से आए थे दिल्ली

अतीत में झांकते हुए वह बताते हैं कि करीब 35 वर्ष पहले जब वह अपने माता-पिता, भाई-बहन के साथ पंजाब रोडवेज की बस में लुधियाना से दिल्ली आने के लिए बैठे तो उनके पास टिकट खरीदने के अलावा चंद पैसे ही बचे थे। पेट की आग बुझाने को भी पर्याप्त पैसे नहीं थे। दिल्ली के कश्मीरी गेट बस अड्डे पर जब वह उतरे तो आंखों में ढेर सारे सपने थे, लेकिन अंजान शहर में सब कुछ पा लेना आसान नहीं था।

काम न मिला तो बनाने लगे पकौड़ा

वह बताते हैं, न सिर पर छत थी और न ही खाने को दाने। जैसे-तैसे पूर्वी दिल्ली के कृष्णा नगर पहुंचे तो उन लोगों ने ही रहने का ठिकाना दिया, जिनका हाल भी अपने जैसा था। छत तो मिल गई, लेकिन रोजी-रोटी कैसे मिलेगी, इस सवाल ने नींद छीन ली। विजय बताते हैं कि उम्र कम थी, इसलिए जल्दी काम मिलना और हर काम कर पाना भी आसान नहीं था।

पकौड़ा बनाकर पूरा किया सपना

सरकारी स्कूल में पढ़ाई शुरू की और बाकी समय में जगह-जगह घूमकर स्ट्रीट फूड बेचने लगे। रेहड़ी खरीदने के पैसे नहीं थे। धीरे-धीरे पड़ोसियों की मदद से एक रेहड़ी खरीदी और उस रेहड़ी पर पकौड़े का व्यवसाय शुरू किया। यह हुनर का ही कमाल है कि आज विजय परिवार के हर सपने पूरे करने का माद्दा रखते हैं। उनके हाथों में शाकाहारी खाद्य पदार्थ बनाने की ऐसी कला है कि चटकारे लगाकर खाने वाले भी उनके मुरीद हो गए। आज भी उनके पास रेहड़ी ही है, लेकिन करीब 30 किस्म के पकौड़े उनकी शान बढ़ाते हैं।

बेटी के हाथ पीले किए, बेटे को दिलाई अच्छी तालीम

विजय बताते हैं कि इसी पकौड़े के व्यवसाय से बेटी के हाथ पीले किए और बेटे को दिल्ली विश्वविद्यालय से अच्छी शिक्षा दिला रहे हैं। वह कहते हैं, पकौड़े नहीं बेचता तो यह मेरे लिए नामुमकिन था। इसलिए प्रधानमंत्री ने जब पकौड़े के व्यवसाय को स्वरोजगार से जोड़कर उनके जैसे लोगों का जिक्र किया तो अतीत की याद ताजा हो उठी और आंखें छलक पड़ीं।

Posted By: JP Yadav