नई दिल्ली [स्वदेश कुमार]। कड़कड़डूमा कोर्ट के एक न्यायाधीश ने दिल्ली दंगे को देश के बंटवारे के समय हुए नरसंहार से जोड़ा है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने एक आरोपित की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज करते हुए कहा कि इस दंगे ने विभाजन के दौरान हुए नरसंहार की यादें ताजा कर दीं। आरोपित सिराज अहमद खान पर दूसरे समुदाय के एक किशोर पर हमले का आरोप है। गिरफ्तारी से बचने के लिए लगाई गई अर्जी में सिराज का कहना था कि उसे गलत तरीके से इस मामले में फंसाया जा रहा है।

सिराज के खिलाफ लगे आरोप गंभीर

अर्जी पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश विनोद यादव ने कहा कि सिराज के खिलाफ लगे आरोप गंभीर हैं। पूरे मामले की साजिश से पर्दा उठाने के लिए उसकी पुलिस के समक्ष मौजूदगी जरूरी है। उन्होंने कहा कि पिछले साल 25-25 फरवरी को उत्तर पूर्वी दिल्ली में कई इलाके दंगे की चपेट में आ गए थे। यह दंगे विभाजन के दौरान हुए नरसंहार की याद दिलाते हैं।

न्यायाधीश ने कहा कि दंगे ने जंगल में आग तरह की कई इलाकों को अपनी चपेट में ले लिया। कई मासूमों की जानें चली गईं। इस मामले में पीड़ित किशोर पर दंगाइयों ने 25 फरवरी को बेरहमी से हमला कर दिया था। जांच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि सीसीटीवी फुटेज में सिराज नजर आया है और उसके हाथ में भाला भी दिखाई दे रहा है। इस मामले में सिराज के दोनों बेटे अरमान और अमन भी आरोपित हैं जो फरार चल रहे हैं। इस मामलें में सिराज पर आरोप लगे तो वह भी फरार हो गया था। बाद में कोर्ट ने उसे भगोड़ा करार दिया।

जांच में आरोपित शामिल नहीं हुआ

न्यायाधीश ने कहा कि इस मामले की जांच में आरोपित शामिल नहीं हुआ। इसलिए उसे अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकती है। सिराज के वकील शादाब खान ने कोर्ट में कहा कि उनके मुवक्किल का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं है। सिर्फ सह आरोपितों के बयान पर उन्हें फंसाया जा रहा है। शादाब खान ने यह भी कहा कि न्यू उस्मानपुर थाने की पुलिस सिराज की गिरफ्तारी के लिए उसके घर पर दबिश दे रही है और परिवार को धमका रही है। वहीं अभियोजन पक्ष के वकील सलीम अहमद ने किशोर हुए बेरहमी से हमले को देखते हुए सिराज की अर्जी खारिज करने की मांग की। बता दें कि दिल्ली दंगे में 53 लाेगों की मौत हुई थी और 200 से अधिक जख्मी हुए थे।

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