नई दिल्ली [रितु राणा]। 1975 के आपातकाल की कड़वी यादें जब आती हैं, तो रूह तक कांप जाती है। उस दिन साथियों के साथ मैं भी कांग्रेस की इंदिरा सरकार के खिलाफ आवाज उठाने के लिए चांदनी चौक पर सत्याग्रह के लिए पहुंचा था। उसी समय पुलिस की गाड़ियां आई और सभी को चांदनी चौक से ले जाकर जेल में डाल दिया। जिन्होंने पुलिसिया कार्रवाई का विरोध किया उन्हें पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ीं और जो शांति से चले गए। वह इस पीड़ा से बच गए। मुझे भी तिहाड़ जेल में गंगाचरण और अरुण जेटली (भाजपा नेता व पूर्व वित्त मंत्री) जैसे संघ के नेताओं के साथ बंद कर दिया गया।

पत्‍‌नी और परिवार की चिंता में कई बार पुलिस अधिकारियों से परिवार के सदस्यों से मिलवाने की गुहार लगाई, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था। परिवार से जुदाई को ही नियति मानकर 19 महीने विवेकानंद और रामकृष्ण परमहंस की किताबों के सहारे गुजारे। फिर वक्त बदला और बाहर आए तो परिवार से भी मिलन हुआ। लेकिन, आपातकाल का दर्द 97 साल की उम्र में भी जवां है और यादें हैं कि जेहन से जाती ही नहीं। यह कहना है प्रीत विहार निवासी ईश्वर दास महाजन का, जिन्होंने आपातकाल की काली रात की सजा जेल में काटी।

इस कानून के तहत हुए थे गिरफ्तार
महाजन को मीसा (आतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम) कानून के तहत गिरफ्तार किया गया था। महाजन ने बताया कि वह 1942 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। वह संघ के दिल्ली प्रदेश कार्यवाह सचिव का दायित्व भी संभाल चुके हैं। सबसे पहले उन्होंने संघ के प्रचारक के रूप में काम किया। इस बीच वह शिमला, अंबाला, करनाल, रोहतक आदि क्षेत्रों में प्रचार करने जाते थे। आपातकाल के दौरान वह शकर नगर स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल में प्रधानाचार्य के पद पर कार्यरत थे।

वहीं, उनकी पत्‍‌नी निर्मला कुमारी गीता कॉलोनी के आरए गीता स्कूल में शिक्षिका थीं। आपातकाल में दोनों की नौकरी चली गई और स्कूल बंद हो गया। इस वजह से परिवार के सामने रोजी रोटी का संकट आ गया था।

ऐसे कटीं जेल की रातें
ईश्वर दास ने बताया कि जेल में काली रातें उन्होंने परिवार की चिंता में बिताई। पत्‍‌नी व बच्चे किस हाल में और कहां होंगे इसी फिक्र में कई दिनों तक रात में नींद नहीं पड़ती थी। हालांकि, कुछ दिन बाद साथियों को देखकर मन को समझाया। इसके बाद किताबों में खुद को उलझाकर वक्त बिताया। उनके साथ डेढ़ से दो हजार लोग जेल में बंद थे। करीब डेढ़ माह बाद रिहाई का सिलसिला शुरू हुआ और जेल में साथियों की संख्या कम होने लगी। फिर 19 महीने बाद एक दिन उनकी रिहाई का भी आदेश आ गया। महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में भी गए थे जेल महाजन ने बताया कि आपातकाल से पहले भी वह जेल जा चुके थे।

1948 में भी हुए थे गिरफ्तार
सबसे पहले 1948 में उन्हें शिमला से गिरफ्तार किया गया था। उस समय उन पर महात्मा गाधी की हत्या करने का आरोप लगाया गया था। उस समय भी वह बताते रहे कि हम हिंसा में विश्वास नहीं करते हैं, लेकिन उनकी एक न सुनी गई। बाद में नाथूराम गोडसे का नाम हत्याकांड में सामने आने पर उन्हें रिहा कर दिया गया।

पत्नी व बड़े बेटे ने संघर्ष कर संभाला परिवार
महाजन बताते हैं कि आपातकाल में जेल जाने के बाद उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद खराब हो गई थी। परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट आ गया, तो बच्चों का पेट पालने के लिए पत्‍‌नी ने ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाया। इसी बीच बड़े बेटे मधुकांत ने एक मोटर कंपनी में नौकरी करके बेटी व छोटे बेटे रवि की पढ़ाई का खर्च उठाया।

मकान मालिक को डेढ़ साल नहीं दे सके थे किराया
महाजन ने बताया कि वह मूल निवासी अमृतसर के हैं, लेकिन संघ के प्रचार के लिए वह जगह जगह जाते रहते थे। आपातकाल के समय वह कृष्णा नगर एफ-1/28 में किराये के घर में रहते थे। उनके जेल जाने की वजह से परिवार के सदस्य डेढ़ साल तक घर का किराया नहीं चुका सके। इस दौरान मकान मालिक का उनके परिवार को पूरा सहयोग मिला। हालांकि, संघ कार्यकर्ता आर्थिक सहयोग के लिए आए थे, लेकिन स्वाभिमानी परिवार ने कभी इसे स्वीकार नहीं किया। आपातकाल खत्म होने के बाद वेतन मिला तो प्रीत विहार में घर लिया और जो कर्ज था वह भी लौटाया। गृह प्रवेश व बड़े बेटे की शादी में लालकृष्ण आडवाणी भी शामिल हुए थे।

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