सुशील गंभीर, नई दिल्ली। यौन उत्पीड़न एवं यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण अधिनियम (पाक्सो) का ऐसा मामला सामने आया है, जहां नाबालिग पीड़िता कोर्ट के बार-बार बुलाने के बाद भी दो साल तक जिरह के लिए पेश नहीं हुई।

क्योंकि केस से जुड़े अन्य गवाहों से हुई जिरह में सामने आया था कि असल में कार की टक्कर का बदला लेने के लिए नाबालिग के भाई ने गलत तथ्यों के साथ केस दर्ज कराया है। बचाव पक्ष के अधिवक्ता विशाल चोपड़ा की दलील और अभियोजन पक्ष के कमजोर तथ्यों के चलते पाक्सो मामलों की सुनवाई करने वाली विशेष अदालत ने आरोपित को बरी कर दिया।

मई 2015 में एक नाबालिग लड़की के बयान पर राजेंद्र नगर थाने में नांगलोई निवासी एक व्यक्ति के खिलाफ पीछा कर अश्लील इशारे कर उत्पीड़न करने का केस दर्ज हुआ था। नाबालिग ने अपने बयान में कहा था कि जब वह ट्यूशन से लौट रही थी तो एक युवक ने उसका पीछा किया और उसे आवाज देकर बुलाया। जब उसने पीछे घुमकर देखा तो युवक ने अश्लील हरकत की। वह भागकर घर आ गई और राेते हुए घटनाक्रम अपने भाई को बताया। नाबालिग की शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज कर आरोपित को गिरफ्तार कर लिया था।

पुलिस की तरफ से दायर किए गए आरोपपत्र पर तीस हजारी की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश दीपाली शर्मा की अदालत में ट्रायल चला। पुलिस की तरफ से नाबालिग के भाई को इस केस का मुख्य गवाह बनाया गया था। अधिवक्ता विशाल चोपड़ा ने बताया कि नाबालिग के भाई से जिरह हुई तो पता चला कि उसकी कार की टक्कर आरोपित की कार से हो गई थी। इस पर दोनों पक्षों में झगड़ा हो गया। उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर आरोपित युवक की पिटाई कर दी। कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए अपनी बहन से शिकायत दर्ज करा दी।

भाई की जिरह पूरी होने के बाद अदालत ने कई बार नाबालिग को जिरह के लिए बुलाया, लेकिन वह पेश नहीं हुई। अदालत ने आरोपित को बरी करते हुए आदेश में कहा है कि कई बार मौका देने के बाद भी नाबालिग लड़की जिरह के लिए पेश नहीं हुई। लिहाजा उसके बयान को खारिज किया जाता है, क्योंकि उसके बयानों पर भरोसा कायम नहीं होता है। इस केस में न तो उसका भाई या कोई अन्य चश्मदीद गवाह है। इसलिए आरोपित को सजा नहीं दे सकते और उसे बरी किया जाता है।  

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