नई दिल्ली, यशा माथुर। आज नाश्ते में क्या बनेगा? पति के लंच में क्या रखना है? ससुर जी के लिए डॉक्टर से समय कब के लिए लेना है? गृहिणी के कामों का अंत नहीं। अब सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले से जब इनके काम का आकलन करने और आदर देने की बात हो रही है तो वे कह रही हैं हम किसी से कम नहीं..

सुबह-सवेरे जब वे बिस्तर छोड़ती हैं और अलसाई हुई सी आंखें खोलती हैं तो दिनभर ढेर सारे काम करने की योजनाएं उनके मन में छा जाती हैं। वे सोचती हैं कि कैसे करूंगी इतने काम? लेकिन करना तो है ही, बस प्राथमिकता देखनी होगी। फिर कमर में पल्ला खोंस, खुद को भूलकर वे घर के काम में लग जाती हैं। फिरकी जैसी दौड़ती हैं दिनभर और आखिर में उन्हें सुनने को मिलता है कि दिनभर क्या करती रहती हो? पूरे घर को संभालने वाली होममेकर महिलाएं घर के सारे काम बिना रुके, बिना बोले करती हैं, लेकिन क्या उनके घरेलू कामों की कीमत किसी ने जानी है? 

हाउसवाइफ नहीं कहलाना

इस प्रश्न को अब सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया है और एक सर्वे का हवाला देते हुए कहा है कि महिलाएं अपने परिवार को पुरुषों से ज्यादा वक्त देती हैं, उनका काम किसी भी तरह से ऑफिस जाने वाले पति से कम नहीं है। उनके काम का आकलन होना चाहिए और उनकी अनुमानित आय तय की जानी चाहिए। यह फैसला उन घरेलू महिलाओं के काम को सम्मान देने जैसा है जिनके नाम के आगे हाउसवाइफ का टैग लगा है।

होममेकर रंजना जायसवाल कहती हैं, हम सुबह से लेकर रात तक काम करते रहते हैं। घर को पूरे समर्पण से बनाकर रखते हैं। फिर हमें हाउसवाइफ क्यों कहा जाता है? हमें तो घर की मालकिन समझा जाना चाहिए। एक अध्ययन भी बताता है कि ब्रिटेन की दो तिहाई माताओं का कहना है कि हाउसवाइफ से नकारात्मकता का बोध होता है और यह उनकी पारिवारिक भूमिका को कम करके आंकता है। इनमें से एक तिहाई को तो यह शब्द ही पसंद नहीं। वे इसे अपमानजनक मानती हैं। 

वेतन मिलना चाहिए

कोई छुट्टी नहीं, छुट्टी का कोई इंतजार नहीं, कभी चैन नहीं, कभी करार नहीं, गृहिणी के जीवन में कोई इतवार नहीं..। किसी लेखक की इन पंक्तियों में गृहिणी की व्यस्तता और मजबूरी साफ झलकती है। सुबह उठने के साथ ही घर के लोगों को चाय देना, बच्चों को स्कूल भेजना, पुरुषों को टिफिन देना, दोपहर में खाना बनाना और फिर शाम का चाय-नाश्ता बनाकर रात के खाने की तैयारी।

पूरे दिन उन्हें खाना खाने का भी आराम से समय नहीं मिलता। ग्रामीण महिलाएं तो सुबह उठकर गोबर थापती हैं, गाय-भैंसों को चारा-पानी देती हैं, खाना बनाकर खेत पर भी जाती हैं और लौटने पर फिर सारे काम करती हैं। इतना काम करने वाली औरत के काम की कीमत गिनी भी जाएगी तो कैसे? एक सर्वे के मुताबिक एक महिला को घर संभालने के लिए कम से कम 45000 रुपये सैलरी हर महीने मिलनी चाहिए। 

इसे इस तरह समझा जा सकता है। औसत दो बच्चों की देखभाल-12000, तीन से चार लोगों का रोज का खाना-6000, घर की साफ-सफाई और कपड़े-3000, घर के खर्च, हिसाब और बजट संभालना-4000, बीमार होने पर देखभाल का-6000, बच्चों का होमवर्क और पढ़ाई-6000, बच्चों को घुमाने समेत बाकी के काम-8000

रुपये।

फिर नौकरी पर

मेघा के जब दूसरा बच्चा हुआ तो उन्हें आराम से नींद में दूसरी दुनिया के सपने देख रहे बच्चे को क्रेच में छोड़ना गवारा नहीं हुआ और उन्होंने अपनी मौजूदा सíवस से ब्रेक लेने की ठान ली। वह एक प्राइवेट संस्थान में काम करती थीं और सीनियर्स से बातकर उन्होंने छुट्टियां ले लीं। दो साल बच्चों के साथ रहने पर मेघा घर में रम गईं, उनका बिल्कुल भी मन नहीं रहा वह नौकरी करने का जिसमें नाम, पसंदीदा काम और पैसा सब कुछ था। एक दिन उनको संस्थान से मैसेज मिला फिर ज्वॉइन करने का, वह पसोपेश में पड़ गईं। बच्चों की देखभाल से समझौता करने का उनका कोई विचार नहीं था।

होममेकर बने रहना उन्हें भा रहा था, लेकिन एक दिन पति के साथ बहस हो गई और वह गुस्से में बोल गए कि दिनभर क्या करती रहती हो? केवल सोती ही तो रहती हो? उसी समय मेघा को एहसास हुआ कि वह घर से बाहर जाकर काम करेंगी तभी उनके काम को सम्मान मिलेगा अन्यथा वह बेकार समझी जाती रहेंगी। तुरंत ही उन्होंने फिर से सíवस ज्वॉइन करने का फैसला कर लिया और कशमकश से निकल गईं। वह कहती हैं, गृहिणी को कमतर समझना लोगों के दिमाग में सेट हो गया है। वे इस मानसिकता से बाहर निकल ही नहीं सकते कि गृहिणियां दिनभर फालतू बैठकर सिर्फ गप्पें लड़ाती हैं या चादर तानकर सोती हैं या टीवी सीरियल्स देखती रहती हैं।

14 से 16 घंटे तक काम

2011 की जनगणना के आंकड़ों से यह पता चलता है कि 15 से 59 वर्ष के आयु वर्ग में जो कुल 30.31 करोड़ लोग थे, वे उस समय किसी काम में भाग नहीं ले रहे थे। दूसरे शब्दों में, ये जो गैर कामगार थे, उनमें 22.20 करोड़ यानी 73 फीसद महिलाएं थीं, जबकि इन गैर-कामगार महिलाओं में 97.6 फीसद महिलाएं गृहिणी थीं, जो हर दिन 14 से 16 घंटे तक खाना बनाने, बर्तन और कपड़े धोने, बच्चों की देखभाल करने, पीने के लिए पानी भरने, घर की सफाई करने जैसे काम  करती थीं।

तब से अब तक हालात कुछ बदले नहीं हैं। गृहिणी शब्द की उपेक्षा से ऊबकर अब अनामिका ने घर से ही खाना बनाकर बेचने का काम शुरू किया है। वह कहती हैं, कोई नहीं जानना चाहता कि मेरी योग्यता क्या है, मैं पहले क्या काम करती थी और मैंने काम क्यों छोड़ा? बस कह देते हैं कि हाउसवाइफ हैं। इसी से उकताकर मैंने घर से ही काम करना शुरू किया है। अब मैं एंटरप्रेन्योर हूं। दरअसल अनामिका सीए हैं और अपनी छोटी बच्ची के कारण दस से छह वाला जॉब नहीं करना चाहतीं। 

गृहिणियों को सलाम

ऐश्वर्या राय बच्चन, अभिनेत्री कहती हैं कि गृहिणियां देश की सबसे बड़ी सीईओ हैं। उन्हें देश में अत्यधिक सम्मान और प्रशंसा दी जानी चाहिए। मैं देश और दुनिया की सभी गृहिणियों को पूर्ण सम्मान और प्रशंसा के साथ सलाम करती हूं।

आप तो घर की रानी हैं

चेतन भगत, सेलिब्रिटी राइटर कहते हैं कि अगर आप वìकग वुमेन नहीं हैं तो किसी को भी हाउसवाइफ कहकर अपना परिचय न दें। याद रखें आपकी शादी घर के साथ नहीं हुई है। आप तो घर की रानी हैं। अत: खुद को क्वीन ऑफ हाउस कहकर अपना परिचय दें।

गृहिणी घर की नींव होती है

सुकृति नारंग, होममेकर का कहना है कि किसी कंपनी में कोई मैनेजमेंट देख रहा होता है तो कोई एडमिनिस्ट्रेशन, कोई फाइनेंस देख रहा है तो कोई मेंटिनेंस, कोई सामान की खरीदारी देख रहा होता है तो

कोई मानव संसाधन। इन सब कामों के लिए सबकी अलग-अलग सैलरी होती है, लेकिन एक गृहिणी अपने घर के ये सारे काम अकेले देखती है। वही लीडर होती है।

इनका मल्टी टैलेंटेड टास्क होता है, लेकिन लोग आसानी से कह देते हैं कि यह तो बस हाउसवाइफ है। यह बहुत गलत है। गृहिणी के काम को जितनी पहचान मिलनी चाहिए उतनी कभी मिलती ही नहीं। मेरे खयाल से इनके काम का कोई मूल्य ही नहीं है। घर के लिए जितना काम गृहिणियां करती हैं उतना पुरुष नहीं कर सकते। घर के बहुत काम होते हैं। पूरे दिन लगे रहें तो भी खत्म नहीं होते। बच्चे की पढ़ाई और असाइनमेंट अलग से काम बन जाता है।

राष्ट्र का निर्माण करती हैं

अभिलाषा सिंह (हाउसवाइफ-द नेशन मेकर नामक पुस्तक की लेखिका) कहती हैं कि बच्चे हमारे देश का भविष्य हैं तो गृहिणियां देश के भविष्य को पाल पोसकर बड़ा करती हैं। अगर गृहिणी नहीं है तो पुरुषों की सफलता मुश्किल है।

बच्चों को सही परवरिश न मिले तो देश का भविष्य खतरे में पड़ जाएगा। कहीं न कहीं वे राष्ट्र का निर्माण करती हैं। अपनी पूरी जिंदगी लगा देती हैं। परिवार की मुस्कुराहट बनाए रखने और स्वास्थ्य के लिए बिना कुछ बोले बस करती ही चली जाती हैं। इनकी कोई छुट्टी नहीं है। बीमार हों तो भी काम करती हैं। कह नहीं सकतीं कि आज खाना नहीं बनेगा, क्योंकि मैं बीमार हूं और छुट्टी पर हूं। गृहिणियां खाना बनाती हैं, कपड़े धोती हैं, बच्चों को स्कूल लाती ले जाती हैं।

घर व बच्चों की सुरक्षा करती हैं यानी पूरे घर का रखरखाव। अगर आप कुक, धोबी, ड्राइवर, गार्ड और केयरटेकर का ही खर्चा जोड़ लें तो 30-35 हजार आएगा, लेकिन पति बोल देते हैं कि शी इज जस्ट ए हाउसवाइफ। यह जस्ट लगाना क्या जरूरी है? यह सब अब रुकना चाहिए, क्योंकि हमारे देश में 64 फीसद महिलाएं हाउसवाइफ हैं। अब इन्हें समाज में बराबरी का हक मिलना चाहिए। ये किसी से भी कम नहीं हैं। 

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