राहुल चौहान, नई दिल्ली। Fog In Delhi NCR सर्दी का मौसम शुरू होने के साथ ही कोहरा पड़ने लगता है और उसके कारण सड़क हादसों की आशंका काफी बढ़ जाती है। ऐसे तमाम उपाय हैं, जिन्हें अपनाकर कोहरे में भी सड़क हादसे न्यूनतम कर वाहन चलाना सुरक्षित बनाया जा सकता है। लेकिन जहां एक ओर संबंधित सरकारी विभागों की लापरवाही स्थिति को खतरनाक बनाती है, वहीं वाहन चालकों द्वारा कोहरे में यातायात नियमों का पालन न करना उनके लिए जानलेवा साबित होता है। यही वजह है कि हर साल कोहरे के कारण राजधानी में करीब एक हजार सड़क हादसे होते हैं, जिनमें बड़ी संख्या में लोगों की जान जाती है और कई अन्य गंभीर रूप से घायल होते हैं।

राजधानी में पिछले कुछ वर्षों में प्रतिवर्ष औसतन साढ़े पांच से सात हजार सड़क हादसे हुए हैं, जिनमें से हर साल करीब एक हजार हादसे कोहरे के कारण हुए हैं। कोहरे के कारण होने वाले इन हादसों में प्रतिवर्ष दो सौ से ज्यादा लोगों की जान गई है। इनमें युवाओं की संख्या ज्यादा है। इन सड़क हादसों का कारण विशेष तौर पर हाईवे पर यातायात व्यवस्थाओं का दुरुस्त न होना, स्ट्रीट लाइटों का खराब होना, सड़कों पर गड्ढे होना है। वहीं, वाहन चालकों की लापरवाही भी कोहरे में सड़क हादसों की वजह बनती है, जो कई बार जानलेवा साबित होती है।

बिना रिफ्लेक्टर वाले वाहनरात के समय सड़कों पर सामान्य तौर पर दौड़ते नजर आते हैं। कोहरे के कारण इन भारी वाहनों में लदे हुए सरिये इत्यादि दूर तक निकले रहते हैं, जो रिफ्लेक्टर न होने के कारण दिखाई नहीं देते और हादसा हो जाता है। खराब वाहनों का बिना रिफ्लेक्टर के सड़कों पर खड़ा होना भी कोहरे में हादसे की बड़ी वजह बनता है। वाहनों में फॉग लाइटें न होना भी कोहरे में हादसे की वजह बनता है।

फुटपाथ पर लगे पेड़ भी बनते हैं हादसे की वजह: दिल्ली में कई जगहों पर फुटपाथ पर लगे पेड़ भी सड़क पर आ गए हैं। मथुरा रोड पर तीन जगह ऐसे पेड़ हैं। संबंधित विभागों द्वारा न तो इन पेड़ों को हटाया जा रहा है और न ही इन पर रिफ्लेक्टर लगाए गए हैं। इससे कोहरे के समय हादसे की आशंका ज्यादा हो जाती है। अभी हाल ही में दक्षिणी दिल्ली से हरियाणा जाने वाले मथुरा रोड पर मोदी मिल फ्लाईओवर की ओर जाने वाली सड़क पर उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम की बस सड़क पर खड़े पेड़ से टकरा गई थी, जिसमें 13 लोग घायल हुए थे। यहां खराब स्ट्रीट लाइटें दे रहीं हादसे को दावत वहीं, वजीराबाद से जीटी करनाल बाईपास के बीच, वजीराबाद फ्लाई ओवर पर राजौरी गार्डन से नारायाणा के बीच, दिल्ली कैंट से धौलाकुआं के बीच, बीआरटी कॉरिडोर पर चिराग दिल्ली से दिल्ली गेट के बीच और मधुबन चौक से बादली मोड़ के बीच अधिकांश स्ट्रीट लाइटें खराब हैं।

 

स्थानीय लोग इन लाइटों को ठीक कराने के लिए कई बार कह चुके हैं। लेकिन सर्दी और कोहरे का सीजन आने के बावजूद अभी तक इनकी ओर ध्यान नहीं दिया गया है, जबकि अंधेरे की वजह से इन जगहों पर कई बड़े सड़क हादसे हो चुके हैं। बदहाल सड़क और चालकों की मनमानी भी बनती है खतरा यमुनापार में भोपुरा बॉर्डर से मंडोली चारखंभा चौराहे तक सड़क पर गड्ढे होने से यहां हादसे की आशंका ज्यादा है। बाहरी दिल्ली में ¨सघु बॉर्डर से मुकरबा चौक के बीच शनि मंदिर चौराहे पर यातायात का दबाव अधिक होने और वाहन चालकों द्वारा रेड लाइट जंप करने के कारण यहां सड़क हादसे ज्यादा होते हैं। कोहरे के समय यहां सड़क हादसे का खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। इसके साथ ही मुकंदपुर चौक पर भी अधिक सड़क हादसे होते हैं। आजादपुर मंडी जाने वाला अधिकतर यातायात यहीं से गुजरता है।

22 दिसंबर से 10 जनवरी के बीच गहराता है कोहरा दिल्ली-एनसीआर में सर्दी की शुरुआत के साथ ही कोहरा पड़ने लगता है, लेकिन 22 दिसंबर से 10 जनवरी के बीच कोहरा घना होता है। मौसम विभाग के अनुसार, एक से 10 जनवरी के दौरान घना कोहरा छाने की सर्वाधिक परिस्थिति बनती है, क्योंकि इस दौरान न्यूनतम तापमान 3 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहता है। कोहरे के कारण सड़क हादसे न हों इसके लिए सभी दिशा सूचक, स्ट्रीट लाइट, गड्ढों और निर्माण स्थलों पर डायवर्जन रिफ्लेक्टर आदि को दुरुस्त कराया जाना चाहिए। 

कोरोना से कम जानलेवा नहीं सड़क दुर्घटनाएं : कोरोना संक्रमण के कारण इस समय पूरी दुनिया परेशान है। इसके कारण दुनियाभर में अब तक 13.5 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। कोविड-19 को वैश्विक महामारी घोषित कर दिया गया है और इससे निपटने के लिए हरसंभव प्रयास किए जा रहे हैं। हालांकि, सड़क हादसे भी इससे कम जानलेवा नहीं हैं। दुनियाभर में हर साल 13.5 लाख से ज्यादा लोग सड़क हादसों में जान गंवा देते हैं। भारत में तो स्थिति ज्यादा गंभीर है। दुनियाभर में उपलब्ध वाहनों में भारत की हिस्सेदारी महज एक फीसद है, जबकि 11 प्रतिशत सड़क हादसे अपने ही देश में होते हैं। देश की सड़कों पर हर घंटे होने वाले हादसों में कम से कम 17 लोगों की मौत हो जाती है। सड़क हादसे कोरोना से कम घातक कतई नहीं हैं, इसलिए उन पर अंकुश लगाने के लिए भी बेहद गंभीर होना पड़ेगा।

अर्थव्यवस्था को भी बड़ा नुकसान : हादसों का असर सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं होता, बल्कि इससे देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होती है। सेव लाइफ फाउंडेशन के अनुसार, देश में हर साल होने वाले करीब 4.5 लाख सड़क हादसे हमारी अर्थव्यवस्था को लगभग 4.34 लाख करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाते हैं।

नामुमकिन कुछ भी नहीं : बड़ी आबादी होने के बावजूद भारत ने एहतियाती उपायों व सतर्कता से कोरोना संक्रमण पर नकेल कसने में काफी हद तक कामयाबी पाई है। कुछ वर्ष पहले तक देश में कैंसर से हर साल करीब सात लाख लोगों की जान चली जाती थी। जागरूकता और चिकित्सीय उपायों से इसमें कमी आने लगी है। नक्सली व आतंकी वारदातों पर भी नकेल कसा गया है, जिनमें हजारों लोग जान गंवा देते थे। ये उदाहरण बताते हैं कि सरकार व जनता चाहे तो सड़क हादसों पर भी प्रभावी अंकुश लग सकता है।

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