शुभम कुमार सानू। Delhi Jal Board News हाल ही में दिल्ली जल बोर्ड (डीजेबी) द्वारा दिल्ली के प्रत्येक घरों में वर्ष 2024 तक चौबीसों घंटे जलापूर्ति के लिए राजधानी को तीन जोन में विभाजित किया गया है। इन जोन के माध्यम से पूरी दिल्ली में जलापूर्ति को नियंत्रित किया जाएगा। प्रत्येक जोन के लिए अलग अलग कंपनियों को इस कार्य के लिए ठेका दिया जाएगा, जो आगामी 15 वर्षो तक इलाके में जलापूíत और सीवरेज प्रणाली का प्रबंधन करेंगी।

उल्लेखनीय है कि पहली बार इस योजना का आरंभ पायलट प्रोजेक्ट के रूप में जनवरी 2013 में दक्षिणी दिल्ली के मालवीय नगर एवं वसंत विहार में किया गया था। इस प्रोजेक्ट के तहत बीते आठ वर्षो में इन इलाकों के महज पांच प्रतिशत क्षेत्रों को 24 घंटे पानी की आपूर्ति की जा सकी है। आंकड़े दर्शाते हैं कि इसकी क्रियान्वयन दर सालाना एक प्रतिशत से भी कम है, लिहाजा यह दिल्ली जल बोर्ड के 2024 तक राजधानी में चौबीसों घंटे पानी आपूर्ति के लक्ष्य के दावे की वास्तविकता को दर्शाने के लिए काफी है। दरअसल इस पायलट प्रोजेक्ट से दो प्रमुख बातें निकलकर सामने आई हैं। एक तो इन क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति पानी की खपत में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है, वहीं दूसरी ओर दिल्ली जल बोर्ड ने उन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचा होने के बावजूद पानी की अनुपलब्धता को भी ङोला है, जिस वजह से पायलट प्रोजेक्ट वाले क्षेत्रों में भी इस योजना को पूरी तरह से अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है।

राजधानी में वर्षो से पेयजल की समस्या रही है, जो गर्मियों के मौसम में आपूर्ति की कमी एवं खपत में वृद्धि के कारण और भी विकराल हो जाती है। इस वर्ष भी दिल्ली में गर्मी के मौसम में पानी की किल्लत हुई थी। दिल्ली में आमतौर पर रोजाना औसतन प्रत्येक घर को दो से चार घंटे पानी की आपूर्ति की जाती है, तो वहीं काफी ऐसे क्षेत्र हैं जहां पर एक घंटे के लिए भी पानी की नियमित आपूर्ति नहीं हो पाती है। अनेक इलाकों में लोगों को टैंकर एवं अन्य स्रोतों पर निर्भर रहना होता है। कुछ इलाकों में पीने का पानी तो छोड़िए नहाने एवं अन्य जरूरतों के लिए भी पानी नहीं मिल पाता है। ज्यादातर घरों में लोग पेयजल खरीद कर इस्तेमाल करते हैं। कई इलाकों में तो आपूर्ति होने वाला पानी पीने लायक ही नहीं होता है। ऐसे में दिल्लीवासियों के लिए चौबीसों घंटे पीने योग्य पानी की आपूर्ति करने की योजना काफी सराहनीय है। परंतु इसकी राह में संभावित समस्याओं का आकलन भी जरूरी है जो इस योजना की सफलता में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं :

खपत व आपूर्ति में अंतर : जनगणना 2011 के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली की आबादी 1.67 करोड़ थी, जिसके वर्तमान में ढाई करोड़ के आसपास होने का अनुमान लगाया जाता है। इस कारण इस वर्ष के आखिर तक पानी की मांग भी प्रतिदिन 1140 एमजीडी (मिलियन गैलन प्रतिदिन) से बढ़कर 1380 हो जाएगी। दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण 2021 के डाटा के अनुसार दिल्ली जल बोर्ड प्रतिदिन सभी स्रोतों से मिलाकर 935 एमजीडी पानी की आपूर्ति ही कर पाता है। इस हिसाब से राजधानी में मांग की तुलना में करीब 445 एमजीडी कम पानी की आपूर्ति हो पा रही है। इससे कई इलाकों में लोगों को पेयजल संकट का सामना करना पड़ रहा है।

अन्य राज्यों पर निर्भरता : दिल्ली आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार ही राजधानी की 90 प्रतिशत पेयजल की मांग की पूर्ति पड़ोसी राज्यों पर निर्भर है। यहां लगभग 41 प्रतिशत पानी यमुना नदी, करीब 26.5 प्रतिशत पानी गंगा नदी, लगभग 23 प्रतिशत भाखड़ा स्टोरेज एवं 8.8 प्रतिशत भूजल से प्राप्त होता है। एक समस्या यह भी है कि गर्मी के दिनों में जब पड़ोसी राज्यों में भी पानी की समस्या होती है तो वे दिल्ली की आपूर्ति कम कर देते हैं।

भूजल का क्षय : अत्यधिक दोहन के कारण दिल्ली के कई क्षेत्रों में भूजल स्तर घटकर 20 से 30 मीटर नीचे जा चुका है। कुछ क्षेत्रों में तो भूजल में नाइट्रेट की मात्र 1000 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक पाई गई है। लगभग 30 प्रतिशत क्षेत्रों में फ्लोराइड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम प्रति लीटर की निर्धारित सीमा से अधिक है। ज्यादातर क्षेत्रों की भूजल में अत्यधिक लवणता है जो कि मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

जल रिसाव और चोरी : दिल्ली जल बोर्ड के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत पानी उपभोक्ताओं तक पहुंचने से पहले ही लीक या चोरी हो जाता है। टैंकर माफिया द्वारा पानी का दुरुपयोग एक बड़ी समस्या है जो लोगों से अनाप-शनाप धन वसूली करता है। दिल्ली में ऐसे लाखों घर हैं जहां पर पानी का मीटर नहीं लगा है और लोग चोरी से पानी का इस्तेमाल करते हैं। यहां की बड़ी आबादी को गुणवत्तायुक्त पानी नहीं मिल पाता है जिस कारण पीने के पानी के लिए उनकी निर्भरता निजी आपूर्तिकर्ताओं पर बढ़ती जा रही है। प्रदूषित पानी का उपयोग करने के कारण पैदा समस्या एक अलग परेशानी है।

असमान जल वितरण : दिल्ली की लगभग 40 प्रतिशत आबादी झुग्गियों और अनधिकृत कालोनियों में रहती है। इन क्षेत्रों की बड़ी आबादी को पाइपलाइन से पानी की आपूर्ति नहीं होती है। पानी के टैंकर पर निर्भर यहां के लोगों को रोजाना पानी इकट्ठा करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जो इन गरीब लोगों की आजीविका एवं जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। लोगों के विचार में यह जल के लिए जीवन को दांव पर लगाने की स्थिति जैसी होती है। इतना ही नहीं, पाइपलाइन के माध्यम से लोगों के घरों तक जो पानी पहुंचाया जाता है, उस पानी का दबाव भी इतना कम रहता है कि भूमि तल से ऊपर की मंजिलों तक पानी पहुंचाने के लिए बिजली के मोटर पंपों का इस्तेमाल करना पड़ता है। अधिकांश इलाकों में तो भूमि तल पर भी पानी का पंप चलना पड़ता है। लिहाजा इसमें अतिरिक्त बिजली का खर्च भी होता है।

अपशिष्ट प्रबंधन : उपभोक्ताओं को उपलब्ध कराए गए पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा एक बार उपयोग के बाद अपशिष्ट के रूप में नाली में चला जाता है। वहीं दिल्ली के 35 वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट प्लांट शहर की कुल अनुमानित 720 एमजीडी अपशिष्ट पानी में से केवल 473 एमजीडी यानी 66 प्रतिशत अपशिष्ट पानी का ही उपचार कर पाती है। इतना ही नहीं, शहर के कई ऐसे इलाके हैं जहां अभी तक सीवर कनेक्शन नहीं है। दिल्ली का वर्तमान सीवरेज नेटवर्क 8400 किमी से अधिक लंबा है जो शहर की आबादी का लगभग 78 प्रतिशत ही कवर करता है।

व्यक्तिगत स्तर पर लोग पेयजल का इस्तेमाल पौधों और वाशिंग मशीन आदि में भी करते हैं। अनुमानित रूप से घरों में आपूíत किए जाने वाले पेयजल का 40 प्रतिशत गैर पीने योग्य उद्देश्य के लिए किया जाता है। इसके अलावा, अधिकांश लोग उपयोग के दौरान बहुत सारा पानी बर्बाद करते हैं जिसे नियंत्रित करना होगा। इन तमाम प्रयासों के अलावा, अधिकारियों की कार्यस्थिति एवं उनकी क्षमता, वित्तीय स्थिति एवं जल एजेंसियों की जवाबदेही, बुनियादी ढांचे का रखरखाव आदि पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। साथ ही प्राकृतिक आपदाओं एवं अन्य विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए तैयार रहने की जरूरत है। प्रत्येक व्यक्ति को जल संरक्षण के लिए स्वयं के स्तर पर भी कदम उठाने की जरूरत है। व्यक्तिगत स्तर पर उठाया गया कदम जल संरक्षण में काफी मददगार हो सकता है। इन सभी बिंदुओं का ध्यान रखते हुए ही सतत पोषणीय विकास के लक्ष्य ‘स्वच्छ पेयजल और स्वच्छता’ को दिल्ली में प्राप्त किया जा सकता है।

दिल्ली में चौबीस घंटे पानी की आपूर्ति करना वास्तव में एक अच्छी योजना हो सकती है, परंतु इससे पैदा कुछ पर्यावरणीय पहलुओं का भी ध्यान रखना जरूरी है। पहला जल संसाधन के सतत पोषणीय इस्तेमाल का मामला है। पायलट प्रोजेक्ट वाले क्षेत्रों का अनुभव यह दर्शाता है कि निरंतर जल आपूर्ति के कारण प्रति व्यक्ति पेयजल इस्तेमाल में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। सामान्य तौर पर संसाधनों की व्यापक उपलब्धता लोगों को इसके दुरुपयोग की ओर ले जाती है और कमी संरक्षण की ओर। इसीलिए दुरुपयोग एवं संरक्षण के बीच का एक रास्ता ढूंढना होगा।

पानी की उपलब्धता की समस्या के लिए सरकार का मानना है कि वह निकट भविष्य में इसकी कमी को वजीराबाद प्लांट में 95 एमजीडी अतिरिक्त पानी पैदा कर, 50 एमजीडी हिमाचल प्रदेश से प्राप्त कर, 25 एमजीडी दिल्ली के जल स्रोतों से एवं 200 एमजीडी भूजल से प्राप्त करेगा। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि अतिरिक्त पानी मुख्य रूप से भूजल से प्राप्त किया जाएगा जिसकी स्थिति वैसे भी दिल्ली में बदतर है। उपरोक्त लक्ष्य को हासिल करने के लिए दिल्ली में पहले तमाम संबंधित तैयारियों की समीक्षा करने की आवश्यकता है। इनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हो सकते हैं। राजधानी में पानी का समग्र आडिट का काम होना चाहिए ताकि इसकी उपलब्धता की संभावनाओं की जानकारी हो सके। इससे जल गुणवत्ता एवं इससे जुड़े अन्य आयामों की जानकारी मिलेगी, जो पानी के वितरण एवं प्रबंधन से जुड़ी संभावित योजनाओं को बनाने में काफी मददगार होगा।

दिल्ली में करीब 30 किमी की लंबाई में प्रवाहित यमुना नदी को नया जीवन देने की जरूरत है, ताकि राजधानी की मुख्य जल धमनी सभी जनमानस को स्वच्छ पानी दे सके। आज यमुना भारत की सबसे प्रदूषित नदी है, इस स्थिति को सामुदायिक प्रयास से बदलना होगा। भूमिगत जल की स्थिति को सुधारने के लिए पात्र भूजल उपयोगकर्ताओं को लाइसेंस प्रदान करना, नलकूपों एवं बोरवेलों का पंजीकरण एवं भूजल को प्रदूषित करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता है।

दिल्ली में वर्षा जल संरक्षण की आवश्यकता है। हाल के वर्षो में इसके लिए अनेक कदम अवश्य उठाए गए हैं, लेकिन दिल्ली में बड़ी संख्या में लगभग विलुप्त हो चुके जलाशयों को पुनर्जीवित करने की दिशा में अभी बहुत प्रयास करने की जरूरत है। राजधानी की एक बड़ी आबादी को अभी भी टैंकरों के द्वारा पानी पहुंचाया जाता है। ऐसे में राजधानी के सभी घरों में चौबीसों घंटे पानी पहुंचाने से पहले पूरी दिल्ली में पाइपलाइन से कम से कम कुछ घंटों के लिए पीने योग्य पानी आपूर्ति कराने की आवश्यकता है।

[शोधार्थी, दिल्ली स्कूल आफ इकोनामिक्स]

Edited By: Sanjay Pokhriyal