नई दिल्ली [विनीत त्रिपाठी]। पति पर नपुंसकता का झूठा आरोप लगाने को क्रूरता करार देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने निचली अदालत द्वारा एक व्यक्ति को तलाक दिए जाने के फैसले को बरकरार रखा है। व्यक्ति की पत्नी ने दावा किया था कि वह शारीरिक संबंध बनाने में असमर्थ था। सुनवाई के दौरान दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति मनमोहन व न्यायमूर्ति संजीव नरुला सचदेवा की पीठ ने अपनी टिप्पणी में कहा कि पत्नी द्वारा लगाया गया झूठा आरोप बहुत ही गंभीर है और यह किसी व्यक्ति के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने वाला है। ऐसे में पारिवारिक अदालत के आदेश में कोई त्रुटि नहीं है और उसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है। पीठ ने यह कहते हुए पत्नी की अपील खारिज कर दी।

हाई कोर्ट की पीठ ने यह भी कहा कि दोनों काफी समय से अलग-अलग रह रहे हैं और पारिवारिक अदालत ने पाया है कि उनके बीच फिर से संबंध स्थापित होना संभव नहीं दिख रहा है। पीठ ने कहा कि पूरी सुनवाई में पत्नी ने पति को नपुंसक ही कहा और डॉक्टरी परीक्षण में पति सामान्य निकला है। इस तरह का झूठा आरोप पति के लिए बहुत ही व्यथित और आहत करने वाला है। सबसे पहले पति ने पत्नी से तलाक लेने की अर्जी दाखिल की थी और कहा था कि उसे शारीरिक सुख नहीं दिया जा रहा है। इस वजह से उसे तलाक चाहिए।

पत्नी ने इसके जवाब में कहा था कि उसका पति नपुंसक है, इसलिए वह उसके साथ शारीरिक संबंध नहीं बना रही है। मामले में पारिवारिक अदालत ने तलाक की मंजूरी दे दी थी। इस फैसले के खिलाफ पत्‍‌नी में हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

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