नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। वैवाहिक दुष्कर्म के अपराधीकरण की मांग वाली याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट के समक्ष अदालत मित्र ने अहम सवाल रखते हुए कहा कि क्या यह उचित है कि एक पत्नी को दुष्कर्म को दुष्कर्म कहने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। अदालत मित्र और वरिष्ठ अधिवक्ता राजशेखर राव ने कहा कि क्या कोई यह तर्क दे सकता है कि यह उचित और न्यायसंगत है कि एक पत्नी को दुष्कर्म को दुष्कर्म कहने की क्षमता से वंचित किया जाना चाहिए, लेकिन आइपीसी की धारा 498 ए (विवाहित महिला के प्रति क्रूरता) के तहत उपाय तलाशने के लिए कहा जाना चाहिए। आज का युग दुर्भाग्य से कानून लैंगिक रूप से समान नहीं है।

दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राजीव शकधर और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की पीठ ने कहा कि उनका प्रथम ²ष्टया यह मानना है कि इस मामले में सहमति बिल्कुल भी मुद्दा नहीं है। एक उदाहरण देते हुए चंद्रशेखर राव ने कहा यदि पत्नी सिर्फ यह कह रही है कि वह आज संभोग के लिए न करती है तो कानून यह नहीं कहता कि पति ऐसा कर सकता है, लेकिन यह सूक्ष्मता से कहता है कि यदि वह सहमति के अभाव में संभोग करता है, तो उसे उसके साथ दुष्कर्म नहीं माना जाएगा। मामले में आगे की सुनवाई 17 जनवरी को जारी रहेगी।

गौरतलब है कि एक गैर सरकारी संगठन आरआइटी फाउंडेशन, आल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन के अलावा एक पुरुष और एक महिला ने याचिका दायर कर वैवाहिक दुष्कर्म के अपराधीकरण की मांग की है।

गौरतलब है कि दुष्कर्म को जहां बड़ा अपराध माना जाता है, वहीं शादी के पत्नी से दुष्कर्म को अभी अपराध की श्रेणी में रखने या न रखने को लेकर बहस जारी है। ऐसे दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में रखने के लिए दिल्‍ली हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई है, जिस पर सुनवाई चल रही है। दिल्ली हाई कोर्ट में जवाब देते हुए इस याचिका के खिलाफ केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि पत्नी से दुष्कर्म को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। इससे विवाह की संस्था अस्थिर हो सकती है। इसके अलावा पतियों को सताने के लिए पत्नियां इसका एक आसान औजार के रूप में प्रयोग कर सकती हैं।

Edited By: Jp Yadav