नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। 23 साल पहले किशोरी से दुष्कर्म की घटना के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने दो व्यक्तियों सुरेंद्र कुमार और रविंद्र को दोषी करार दिया। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ मृदुल व आइएस मेहता की पीठ ने निचली अदालत द्वारा आरोपितों को बरी करने के फैसले को रद करते हुए कहा कि अदालत के समक्ष पेश किए गए चिकित्सा साक्ष्य पीड़िता की गवाही की पुष्टि करते हैं। पीठ ने निचली अदालत के फैसले पर कहा कि यह न्याय का गंभीर उल्लंघन है। पीठ ने कहा कि 13 वर्षीय किशोरी ने निचली अदालत के समक्ष बताया था कि मार्च 1997 को उसके साथ क्या हुआ।

पीठ ने कहा कि मामले से जुड़े तथ्यों को परिस्थितियों की समग्रता के संबंध में देखें तो पता चलता है कि निचली अदालत ने सबूतों को नजरअंदाज कर दिया था। नाबालिग पीड़िता ने बयान दिया था कि आरोपितों की तुरंत पहचान कर ली गई थी, उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया था। पीठ ने कहा कि निचली अदालत इस पर विचार करने में विफल रही कि दोनों दोषियों की पहचान पर कोई विवाद नहीं था।

आरोपितों से लिए गए चिकित्सा साक्ष्य और पीड़िता के बयानों में मेल पाया गया। पीड़िता ने निचली अदालत के समक्ष अपराधियों के रूप में दो लोगों की पहचान की थी।

पीठ ने इन टिप्पणियों के साथ दोषी सुरेंद्र कुमार व रविंद्र की चुनौती याचिका को खारिज करते हुए अभियोजन की अपील को स्वीकार कर लिया। पीठ ने सुरेंद्र कुमार को दुष्कर्म एवं आपराधिक धमकी के आरोप में दोषी ठहराया। वहीं रविंद्र को दुष्कर्म का दोषी करार दिया। इन्हें अगले सप्ताह सजा सुनाई जाएगी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार 27 मार्च 1997 को पीड़िता अपने छोटे भाई के साथ बाहर गई थी। रास्ते में रविंद्र ने भाई को पकड़ लिया और सुरेंद्र किशोरी को जबरदस्ती उठाकर पास के खाली स्थान पर ले गया। उसने किशोरी का दुष्कर्म किया और इस बारे में किसी को बताने पर गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी दी। बेटी को खोजते हुए उसके पिता घटनास्थल पर पहुंचे तो पीड़िता ने उन्हें घटना के बारे में बताया। किशोरी के पिता की शिकायत पर अलीपुर पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट दर्ज की गई थी। दोनों दोषियों ने खुद को फंसाए जाने का आरोप लगाया था।

Posted By: JP Yadav

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