नई दिल्ली [विनीत त्रिपाठी]। भूमि अधिग्रहण के बदले वैकल्पिक भूमि देने की सरकार की एक नीतिगत योजना के मामले में आवेदन निरस्त करने के खिलाफ दायर याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने कहा कि 54 साल तक सोने वाला व्यक्ति अधिकारों के लिए अदालत आने का हकदार नहीं है। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता खूबी राम शर्मा के अधिवक्ता एनएस दलाल ने दलील दी है कि जिन भी लोगों से भूमि अधिग्रहण किया गया था उन्हें वैकल्पिक भूमि आवंटित की जा चुकी है।

पीठ ने कहा इससे यह पता चलता है कि याचिकाकर्ता अपने अधिकारों को पाने के लिए भी 54 साल तक लगातार सोता रहा। ऐसे में तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए याचिका खारिज की जाती है। याचिका के अनुसार भूमि एवं भवन निर्माण विभाग ने नवंबर 1963 में भूमि अधिग्रहण के बदले वैकल्पिक भूमि देने का सार्वजनिक नोटिस निकाला था। इसके तहत आवेदनकर्ता को दिसंबर 1963 तक आवेदन दाखिल करना था।

इस योजना के तहत याचिकाकर्ता खूबी राम शर्मा की जमीन का भी अधिग्रहण हुआ था, लेकिन खूबी राम ने पिता की मौत होने पर सितंबर 1980 में वैकल्पिक जमीन के लिए आवेदन किया। खूबी राम का आरोप है कि इस आवेदन के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं दी गई और अब प्रतिवादी आवेदन के रद होने की दलील दे रहा है। वहीं, भूमि एवं भवन निर्माण विभाग ने अदालत में कहा कि वैकल्पिक भूमि के आवेदन दिसंबर 1963 तक ही भरे जाने थे और याची ने 17 साल बाद 1980 में आवेदन भरा, जिसे रद किए जाने की जानकारी याची को 15 दिसंबर, 1982 को दी गई थी। हालांकि, याची ने आवेदन के रद होने के 36 साल बाद 2018 में प्रतिवेदन दिया।

वहीं, भूमि एवं भवन निर्माण विभाग ने भूमि अधिग्रहण के बदले वैकल्पिक भूमि देने की मांग को लेकर 2015 में दिल्ली सरकार बनाम जंगली राम व अन्य के मामले में हाई कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ के फैसले का हवाला दिया। जिसमें दिल्ली हाई कोर्ट ने 27 साल की देरी होने पर याचिका खारिज कर दी थी। विभाग ने कहा कि वर्तमान मामला तो 54 साल पुराना है और यह दो सदस्यीय पीठ द्वारा खारिज किए गए 27 साल पुराने मामले से भी पुराना है।

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