नई दिल्ली [निखिल पाठक]। जहां एक ओर दिव्यांग लोग दुख-दर्द, संघर्ष और समाज के ताने सुनकर टूट जाते हैं, वहीं यमुनापार के घोंडा इलाके की संकीर्ण गली में एक ऐसा परिवार रहता है जिसमें पांच लोग नेत्रहीन हैं। आंखों में रोशनी न होने के बावजूद इन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाज में अपनी अलग पहचान बनाई है। डिजिटल युग में ये लोग तकनीकों का उपयोग करना भी बखूबी जानते हैं।

मूल रूप से बिहरा पटोरी, सहरसा, बिहार रहने वाले डा. बसंत कुमार वर्मा ने बताया कि बचपन में उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी। लेकिन उन्होंने अपनी शारीरिक कमजोरी को अड़चन नहीं बनने दिया और अपने सपनों को पूरा करने के लिए दिल्ली आ गए।

JNU से की पीएचडी

यहीं पर उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की और बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिंदी विषय में पीएचडी की। इसके बाद 1987 में उन्हें टीजीटी शिक्षक के रूप में सरकारी नौकरी मिल गई। विद्यालय में वह सामान्य छात्रों को भाषण के माध्यम से पढ़ाया करते थे। विद्यालय से वह पीजीटी शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे।

डा. बसंत ने बताया कि उनकी बड़ी बेटी अर्चना ईश्वर की कृपा से देख सकती हैं। वह दरभंगा, बिहार में सरकारी शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं और परिवार के साथ वहीं रहती हैं। उनके दो बेटे आदित्य और अभिनव जन्म के बाद बीमारी के कारण नेत्रहीन रह गए। सबसे छोटी बेटी शक्ति भी देख नहीं सकती हैं।

छोटे बेटे और पत्नी हैं ठीक

घर में सबसे छोटा बेटा आलोक और उनकी पत्नी सुधा वर्मा को कोई दृष्टि दोष नहीं है। आदित्य की पत्नी सुरभी नेत्रहीन हैं। आदित्य सुरभि के साथ कपूरथला में रहते हैं, जहां वह केंद्रीय विद्यालय में प्राथमिक शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं।

अभिनव ने बताया कि जब वह दो साल के थे तो उन्हें ग्लूकोमा की बीमारी से जूझना पड़ा था। इसके बाद उनकी आंखों का आपरेशन हुआ और उनके भीतर संसार को देखने की फिर से उम्मीद जागी। लेकिन एक दिन घर के बाहर हलवाई की दुकान के पास उन पर गर्म सब्जी गिर गई। इससे आंखों की रोशनी पूरी तरह से चली गई।

अभिनव ने बताया कि पिता ने अपने तीनों नेत्रहीन बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए उनका आरके पुरम स्थित नेशनल एसोसिएशन फार द ब्लाइंड में दाखिला करा दिया था। उनका कहना है कि इस संगठन के माध्यम से हमने ब्रेल पद्धति की मदद से शिक्षा ग्रहण की।

इसके बाद अभिनव ने दिल्ली विश्वविद्यालय के खालसा कालेज से बीए में स्नातक की। वर्तमान में वह भारतीय दृष्टिहीन विद्यालय में कंप्यूटर के शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं। इसी वर्ष अप्रैल महीने में अभिनव और रीत की शादी हुई है। इस मौके पर रीत का कहना है कि वह अपनी आंखों से अभिनव को दुनिया के रंग दिखाने में मदद करती हैं।

Edited By: Geetarjun

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