यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 27, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
AIIMS में ब्लड सैंपल से फेफड़े के कैंसर की बायोप्सी जांच का बढ़ेगा दायरा, जीन के म्युटेशन का हो सकेगा टेस्ट
एम्स में फेफड़े के कैंसर की पहचान के लिए ट्यूमर के टुकड़े बायोप्सी जांच की जगह मरीज के ब्लड प्लाज्मा ...और पढ़ें

नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। बायोप्सी का नाम सुनते ही सर्जिकल विधि से शरीर के किसी हिस्से में मौजूद ट्यूमर का टुकड़ा लेकर जांच का ख्याल सामने आने लगता है, लेकिन अत्याधुनिक तकनीक से जांच के तरीके बदल रहे हैं और आसान हो रहे हैं।
एम्स में फेफड़े के कैंसर की पहचान के लिए ट्यूमर के टुकड़े बायोप्सी जांच की जगह मरीज के ब्लड प्लाज्मा के सैंपल से लिक्विड बायोप्सी जांच होने लगी है। करीब एक वर्ष से यह सुविधा उपलब्ध है। अभी तक इस तकनीक से सिर्फ एक जीन ईजीएफआर (एपिडर्मल ग्रोथ फैक्टर रिसेप्टर) म्युटेशन की जांच हो पा रही है।
एम्स लिक्विड बायोप्सी का दायरा बढ़ाने की तैयारी में है। इससे आने वाले समय में मरीज के ब्लड के एक सैंपल की लिक्विड बायोप्सी कर कई तरह के जीन के म्युटेशन की जांच हो सकेगी।
एम्स के पैथोलाजी विभाग की प्रोफेसर डा. दीपाली जैन ने बताया कि फेफड़े का कैंसर से काफी संख्या में लोग पीड़ित होते हैं। फेफड़े के कैंसर से पीड़ित बहुत कम लोग ठीक हो पाते हैं। इसका कारण सही समय पर फेफड़े के कैंसर की पहचान नहीं हो पाना भी है।
बायोप्सी जांच के लिए प्रोसीजर करके ट्यूमर का छोटा टुकड़ा निकाला जाता है। इसके बाद मरीजों की जांच होती है। यह जांच आसान नहीं होती। ब्लड में कुछ बायोमार्कर होते हैं जिससे जांच कर नन स्माल सेल फेफड़े के कैंसर की जांच कर व्यक्तिकृत चिकित्सा (पर्सनलाइज्ड थेरेपी) इलाज हो सकता है।
व्यक्तिकृत चिकित्सा का इलाज थोड़ा बेहतर हो सकता है, लेकिन ब्लड सैंपल से कैंसर की जांच के लिए अत्याधुनिक लैब और दक्षता की जरूरत होती है। उन्होंने बताया कि एम्स में वर्ष 2012 में थोरासिक पैथोलाजी लैब शुरू की गई थी।
इस लैब में एक वर्ष पहले फेफड़े के कैंसर की लिक्विड बायोप्सी जांच की सुविधा शुरू की गई थी। इसके लिए मरीज के ब्लड से सैंपल लिया जाता है और ब्लड में मौजूद ट्यूमर के डीएनए की जांच कर बीमारी की पहचान की जाती है। मौजूदा समय में सिर्फ एक जीन के म्युटेशन की जांच हो पाती है।
इस वजह से नेक्स्ट जनरेशन सीक्वेंसिंग की सुविधा विकसित की जा रही है। जिससे ब्लड सैंपल से डीएनए में 14 तरह के जीन और आरएनए में चार तरह के जीन की जांच हो सकेगी। इससे मरीजों को अधिक फायदा होगा।
