डॉ शेखर मांडे। Coronavirus Outbreak कोरोना संक्रमण का हमला देश दुनिया के लिए जितना चौंकाने वाला था, उतना ही हम विज्ञानियों के लिए भी इसे समझने वाला भी। शोध हमेशा से ही समय मांगता है और इस आपातकाल में हमारे पास वही नहीं था। 30 जनवरी 2020 को डब्लूएचओ द्वारा इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल (पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी) और 11 मार्च 2020 को इसे महामारी घोषित किया गया।

ऐसे में दुनिया के साथ-साथ वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) की देशभर में स्थित 37 प्रयोगशालाओं के 4000 विज्ञानियों के कंधे पर बड़ी जवाबदेही आन पड़ी। कोरोना से संभलने के साथ-साथ हमें उसकी चाल को भी थामना था। साथ ही व्यवहारिक जिंदगी में इसके असर को देखते हुए शोध करना जरूरी था। इस कड़ी में हमने अपनी शोध यात्रा इन पांच चीजों पर केंद्रित करते हुए शुरू की।

प्रणाली: फेलूदा से लेकर एंटीबॉडी टेस्ट तक सीएसआइआर ने टाटा समूह के साथ मिलकर क्लस्टर्ड रेग्युलरली इंटरस्पेस्ड शॉर्ट पैलिनड्रॉनमिक रिपीट्स कोरोना टेस्ट किट बनाया है। इस टेस्टिंग किट को नाम दिया गया है फेलूदा। आधे घंटे में इसकी रिपोर्ट मिल सकती है। इसके परिणाम 98 फीसद सटीक हैं।

पीसीआर टेस्ट: आरएनए और डीएनए आधारित इस जांच के परिणाम बहुत सटीक हैं। आमतौर पर आरटीपीसीआर में सात से आठ घंटे का समय लगता है, वहीं इसमें दो घंटे का समय लगेगा।

एंटीजन-एंटीबॉडी टेस्ट: सीरो सर्वे के जरिये हमें शुरुआती दौर में शहर की स्थिति जानने-समझने में मदद मिली। अस्पतालों के लिए बनेगा कंसंट्रेटर इस आपातकाल में जिस चीज की सबसे ज्यादा कमी महसूस की गई, वो है आक्सीजन। भविष्य में इस कमी को पूरा करने के लिए कंसंट्रेटर प्लांट का माडल तैयार किया है। इस प्रोजेक्ट को पुणे के एक अस्पताल में लगाया जा रहा है। यह कंसंट्रेटर 100 लीटर प्रति मिनट की क्षमता से आक्सीजन तैयार करेगा। पुणे के एक अस्पताल में इसका प्रयोग शुरू किया गया है। आने वाले कुछ समय में देश में 50-60 अस्पतालों और स्थानों पर इसका ट्रायल किया जाएगा। भविष्य में यह मॉडल 500 लीटर प्रति मिनट की क्षमता के हिसाब से तैयार किया जाएगा। इसके पीछे उद्देश्य है कि हर छोटा-बड़ा अस्पताल अपनी जरूरत के हिसाब से आक्सीजन पैदा कर सके। उसे निर्भर नहीं रहना पड़े। इसके साथ ही वेंटीलेटर व अन्य सहायक उपकरण भी शामिल है।

घोड़े से एंटीबॉडी बनाने पर शोध इस्तेमाल: दवाइयों और टीकों के मोर्चे पर भी सीएसआइआर लगातार काम कर रहा है। सांप काटने पर एंटीवेनम इंजेक्शन घोड़े के एंटीबॉडी से तैयार किया जाता है। कोरोना से लड़ने में भी यह कारगर हो सकता है। इसके अलावा ऐसी दवाइयों पर ट्रायल किया जा रहा है, जो अन्य बीमारियों में कारगर है। साथ ही कुछ नई दवाइयां भी तैयार की जा रही हैं। हालांकि इसे बाजार में आने में एक से दो साल का समय लग सकता है।

उम्मीद कायम: सीएसआइआर के सभी विज्ञानी अपने-अपने तरीके से शोध में जुटे हैं। वहीं उन शोध को बाजार तक ले जाने की जिम्मेदारी देश की 100 बड़ी कंपनियां उठा रही हैं। वे हमारे साथ मिलकर इन प्रोड्क्ट को बनाकर बाजार तक ले जा रहे हैं। यदि ये सारे प्रयास सफल रहे तो आने वाले समय में हम कोरोना पर काबू कर पाने में बहुत हद तक सफल होंगे।

टीकाकरण और मास्क बहुत जरूरी है: इन शोध के बावजूद कोरोना से बचाव में सबसे अहम टीका और मास्क है। हमारे देश में दो टीके कोवैक्सीन और कोविशील्ड बनाया गया, जिससे दुनियाभर में लोगों ने माना और सराहा। इसके परिणाम भी बेहतर रहे। और भी कई टीकों पर काम चल रहा है। ज्यादा से ज्यादा टीकाकरण करवाकर और मास्क लगाकर कोरोना की इस डरावनी चाल को थाम सकते हैं।

[महानिदेशक, सीएसआइआर, नई दिल्‍ली]

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