नई दिल्ली [स्वदेश कुमार/अरविंद द्विवेदी/निहाल सिंह]। कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के बीच दिल्ली के बुजुर्ग एक नई मिसाल पेश कर रहे हैं। अपने जब्जे और हिम्मत के बल पर कोरोना वायरस महामारी कोरोना को मात देकर घर लौट रहे हैं। एक नहीं ऐसे कई बुजुर्ग हैं, जिन्होंने बढ़ती उम्र के बावजूद कोरोना को हराकर सकुशल इलाज के बाद घर लौट चुके हैं।

कोरोना का कहर सबसे ज्यादा बुजुर्गों और पहले से बीमारियों से पीड़ित मरीजों पर पड़ रहा है, लेकिन पंचशील गार्डन, शाहदरा के 72 साल के बुजुर्ग महेंदर सिंह के आगे कोरोना टिक नहीं पाया। वह बुजुर्ग होने के साथ मधुमेह और दिल की बीमारी से भी पीड़ित हैं। फिर भी विजेता बनने में उनकी बीमारियां आड़े नहीं आईं। चार दिन हालत गंभीर जरूर रही, लेकिन इसके बाद हर दिन कोरोना को शिकस्त देते गए और स्वस्थ होकर घर लौट आए। हालांकि उनकी बेटी मनदीप कौर की कोरोना से जंग अभी जारी है। उम्मीद है वह भी सुरक्षित घर लौट आएंगी।

गुरुओं का किया ध्यान और डॉक्टरों पर भरोसा

महेंदर सिंह ने बताया कि वह अपनी बेटी के साथ पंचशील गार्डन में रहते हैं। बेटा अपने परिवार के साथ पड़ोस में दूसरे मकान में है। वह आठ मार्च को बेटी के साथ श्रीलंका गए थे। 14 मार्च को वापस लौट आए। कुछ दिन बाद बुखार आ गया। डॉक्टर की सलाह पर दवा ली लेकिन ठीक नहीं हुए। बेटे नवदीप को कोरोना की आशंका हुई तो वह दोनों को लेकर दो अप्रैल को आरएमएल अस्पताल पहुंच गए। यहां दोनों की जांच हुई और दोनों को भर्ती कर लिया गया। चार अप्रैल को दोनों की रिपोर्ट में कोरोना के संक्रमण की पुष्टि हुई।

इसके बाद दोनों को झज्जर स्थित एम्स भेज दिया गया। महेंदर बताते हैं कि वहां पर चार दिन उनकी हालत गंभीर रही। वह खुद शौच के लिए भी नहीं जा पा रहे थे। लेकिन इसके बाद ठीक होने लगे। महेंदर सिंह ने कहा कि अस्पताल में वह लगातार अपने गुरुओं का ध्यान करते रहे। वहां के डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ ने बहुत सहयोग किया। उनपर मुझे पूरा भरोसा हो गया कि ये ठीक करके ही भेजेंगे।

अकेलापन महसूस नहीं हुआ

हालांकि इस दौरान उनकी बेटी भी उसी वार्ड में थी तो अकेलापन महसूस नहीं हुआ। यह पूछने पर कि क्या कभी डर लगा, उन्होंने कहा कि मेरे मन में कभी इसका ख्याल नहीं आया। 13 और 15 अप्रैल को जांच हुई और दोनों की रिपोर्ट नेगेटिव आई। इसके बाद 16 अप्रैल को मुझे छुट्टी दे दी गई। वहां से एंबुलेंस से आरएमएल अस्पताल पहुंचा। यहां से एंबुलेंस के जरिये अपने घर आ गया। मुझे लगता है कि किसी को इससे डरने की जरूरत नहीं है। बेटे नवदीप बताते हैं कि उनके पिता अपनी दवाओं का खुद ध्यान रखते हैं। वह समय के बड़े पाबंद है। घर आने के बाद भी वह अपनी दवा खुद ही समय पर लेते हैं।

73 साल की उम्र, कई बीमारियां, फिर भी मात्र छह दिन में कोरोना को हराया

दिल्ली के जंगपुरा में रहने वाले मनमोहन सिंह नंदा ने कई बीमारियों के साथ कोरोना को भी हरा दिया है। मात्र 6 दिनों के अंदर कोरोना पर विजय पाने वाले 73 वर्षीय मनमोहन सिंह ने बताया कि डॉक्टरों द्वारा बताई गई सावधानी और अपनी इच्छाशक्ति के साथ हर कोई कोरोना पर विजय पा सकता है। मनमोहन सिंह को कई बीमारियां हैं। पिछले 8 साल से वह रात को ऑक्सीजन की मशीन लगाकर सोते हैं। 8 साल पहले उनकी एक किडनी भी निकाली गई थी। उन्हें आर्थराइटिस और थायराइड की भी समस्या है। उनका चेस्ट ब्लॉक रहता है। 73 वर्ष की उम्र में इतनी सारी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ कोरोना से जंग जीतना उनकी बड़ी उपलब्धि है।

मनमोहन के पुत्र ने बताया कि पता चला कि जब घर के लोगों को पता चला कि उनके पिता कोरोना पॉजिटिव हैं तो घरवालों के जैसे होश उड़ गए थे। स्वजनों को ऐसा लग रहा था कि उन्हें काफी लंबे समय तक अस्पताल में रहना पड़ सकता है। लेकिन डॉक्टरों की मेहनत और मनमोहन की इच्छाशक्ति से वह बहुत जल्द ठीक हो गए।

मनमोहन के बेटे ने बताया की उनके पिता को 10-12 दिन से बुखार था। 30 मार्च को उन्होंने उन्हें अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टरों ने कोरोना की आशंका जताते हुए उन्हें जांच कराने के लिए कहा। पहली अप्रैल को उनकी जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आयी। स्थानीय विधायक प्रवीण कुमार की सहायता से उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। 14 लोगों के परिवार में रहने वाले मनमोहन ने बताया कि अस्पताल में काफी अकेला महसूस करते थे। लेकिन उन्हें पता था इस वायरस से लड़ना है तो उन्हें अकेला ही रहना होगा। तीन दिन इलाज करने के बाद उनकी हालत में सुधार हुआ तो डॉक्टरों ने उनकी जांच कराई। पांच और छह अप्रैल को उनकी रिपोर्ट लगातार दोनों दिन नेगेटिव आई तो डॉक्टरों ने उन्हें डिस्चार्ज करने का फैसला किया। अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान मनमोहन अपने घरवालों से फोन पर बात करते थे। उन लोगों से कहते थे की चिंता न करें। वह बहुत जल्द ठीक होकर आएंगे। हालांकि वह इतनी जल्दी ठीक हो जाएंगे इसकी उम्मीद न घर वालों को थी और न ही उन्हें। 

दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के एएसआइ जीत सिंह कोरोना को हराया

कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद 11 दिन अस्पताल में इलाज करवाकर दिल्ली ट्रैफिक पुलिस के एएसआइ जीत सिंह स्वस्थ होकर घर लौट आए हैं। हालांकि, एहतियात के तौर पर उन्हें 14 दिन के लिए होम क्वारंटाइन किया गया है। एसआइ जीत सिंह ने कहा कि 11 दिन अस्पताल में रहते हुए उन्होंने कोरोना वायरस को काफी करीब से समझा है। वह कहते हैं कि कोरोना से बचने के लिए सिर्फ दो रास्ते हैं। अगर आप चाहते हैं कि यह संक्रमण आप तक न पहुंचे तो आप घर से बाहर न निकलें। बहुत जरूरी काम से अगर घर से बाहर निकलें भी तो शारीरिक दूरी का पूरा ध्यान रखें। लेकिन, अगर आप। किसी तरह संक्रमित हो जाएं तो भी हिम्मत नहीं हारना चाहिए। इस बीमारी को भी आम बीमारी की तरह ही लेना चाहिए। अगर आपकी इच्छाशक्ति मजबूत होगी तो इस बीमारी से लड़ने के लिए आपका शरीर भी पूरी तरह से तैयार रहेगा।

एएसआइ जीत सिंह ने बताया कि वह हौजखास सर्कल में तैनात हैं। पिछले कुछ दिनों से उनकी ड्यूटी युसूफ सराय पिकेट पर थी। 30 अप्रैल को उन्हें पूरे शरीर में काफी दर्द महसूस हुआ। इस पर उन्होंने बुखार की दवा ले ली तो बुखार उतर गया लेकिन, अगले ही दिन फिर से बुखार आ गया। उन्होंने अस्पताल में चेकअप कराया तो डॉक्टरों ने उन्हें 14 दिन के लिए होम क्वारंटाइन होने को कहा। लेकिन, सांस लेने में दिक्कत होने के कारण सात अप्रैल को उन्होंने टेस्ट कराया तो रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आई। इस पर पूरा परिवार परेशान हो गया। उन्हें सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया। जीत सिंह ने बताया कि गले में संक्रमण इतना ज्यादा हो गया था कि वह सांस नहीं ले पा रहे थे। तीन दिन उन्हें वेंटिलेटर पर रहना पड़ा। इसके बाद हालत में सुधार होने लगा। 13 से 15 अप्रैल के बीच कई टेस्ट हुए। 16 अप्रैल को रिपोर्ट नेगेटिव आई तो डॉक्टरों ने 17 को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया।

58 वर्ष के शख्स ने दी कोरोना को मात

इसी अप्रैल महीने में ही प्रो.अजित मिश्रा ने कोरोना को हराकर घर लौटे। मधुमेह बीमारी के बाद उन्होंने कोरोना को मात दे दी। अस्पताल से घर आने के बाद उन्होंने कहा कि अगर किसी को कोरोना हो भी जाए तो लोग छिपाएं नहीं बल्कि प्रशासन को इसकी सूचना दें। और बिना घबराए हिम्मत के साथ इसके खिलाफ लड़ाई लड़ें। उन्होंने बताया कि इलाज के दौरान उन्होंने छह किताबें बल्कि और लैपटॉप पर फिल्म भी देखा। अस्पताल में डॉक्टर और नर्सें एक-एक मरीज को चेक करते हैं। पूरे दिन में तीन से चार बार जांच होती है।

सिविल लाइंस में परिवार के साथ रहने वाले प्रो. मिश्रा ने बताया कि विदेश से लौटने के बाद वह 16 मार्च को डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचे और खुद ही इलाज के लिए डॉक्टरों से संपर्क किया। बाद में जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आयी और 4 अप्रैल को इलाज के बाद घर आ गया।

 

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