नई दिल्ली [संजीव गुप्ता]। कोरोना संकट के बीच कांग्रेसी नेताओं की सलाह आजकल खासी चर्चा में हैं। नीचे से ऊपर तक सभी नेता मानो किसी सलाहकार परिषद के सदस्य बन गए हों। सोनिया, राहुल और प्रियंका जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सलाह देते नहीं थकते वहीं प्रदेश के वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आप सरकार को ज्ञान बांटते रहते हैं। कभी यह सलाह या ज्ञान स्वास्थ्य सेवाओं पर तो कभी आक्सीजन संकट, कभी वैक्सीनेशन और कभी गरीबों के लिए राशन व्यवस्था को लेकर आ जाता है। सामने वाला कोई तव्वजो दे या नहीं, लेकिन कांग्रेसी ज्ञान इतनी गंभीरता से देते हैं, मानो उसी के आधार पर सब कुछ तय होगा। कांग्रेस की इसी सलाह और ज्ञान पर आज सियासी गलियारों और आम जनता सभी में चर्चा जोर पकड़ रही हैं? कि अगर पार्टी नेता इतने ही समझदार हैं? तो कांग्रेस सत्ता से बाहर क्यों हैं? और क्यों लगातार हाशिये पर जा रही हैं?

फिर बंधी उम्मीद

केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक में सोनिया गांधी द्वारा पांच राज्यों में पार्टी की हार पर गंभीरता जताने से दिल्ली के कांग्रेसियों को भी थोड़ी उम्मीद बंधी है। दरअसल, पुराने और समर्पित कांग्रेसी पार्टी की लगातार पतली होती हालत से दुखी हैं। इनका कहना है कि पार्टी नेतृत्व कों अपनी खामियां दूर करने और संगठन में बदलाव के लिए सोचना चाहिए। लेकिन आमतौर पर होता यही रहा है कि पार्टी के युवराज हर फिक्र को धुएं में उड़ाते चले जाते हैं। इसीलिए परदे के पीछे समूह 23 के नेताओं की सूची भी लंबी होती जा रही है। ऐसे में सोनिया गांधी के गंभीर रूख से वरिष्ठों को फिर उम्मीद बंध रही है कि शायद अब कुछ ढर्रे पर आ पाए। दिल्ली में भी पार्टी की खस्ता हालत पर नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट जोर पकड़ रही है। ¨चगारी भड़कने और उसकी आंच महसूस होते ही कई दिग्गज एकाएक सक्रिय भी हो गए हैं।

संकट में भी मदद न कर पाने की लाचारी

कोरोना महामारी के बीच प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में भी पिछले एक पखवाड़े से नियंत्रण कक्ष चल रहा है। टविटर और हेल्पलाइन नंबर के जरिये करीब 1500 लोग मदद के लिए संपर्क कर चुके हैं, लेकिन पार्टी ज्यादातर की मदद नहीं कर पा रही है। दरअसल, जनाधार घटने से पार्टी के पास संसाधनों का भी अभाव हो गया है। जिला स्तर पर भी कुछ पदाधिकारी सहयोग कर रहे हैं जबकि कुछ पल्ला झाड़ ले रहे हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी के निर्देश पर नियंत्रण कक्ष के लोग समन्वयक की भूमिका निभा रहे हैं। जहां से मदद की गुहार आती है वहां के जिलाध्यक्ष के पास अग्रसारित कर दी जाती है। आक्सीजन की मांग पर संभव होता है तो मुहैया करा दी जाती है और अस्पतालों में बेड के लिए कोशिश करके देख ली जाती है। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि ज्यादा न सही, जितना संभव है, कर रहे हैं।

शक्तियां हुई कम, कैसे करें समस्या का समाधान!

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग का कामकाज आजकल सियासी दांव पेच में भी उलझ रहा है। दरअसल, केंद्र सरकार ने आयोग के पुनर्गठन में वह प्रविधान तो हटा दिया जिसमें पराली जलाने वाले किसानों को कड़ी सजा दी जा सकती थी। अब न उन्हें जेल भेजा जाएगा और न ही उन पर मोटा जुर्माना लगेगा। ऐसे में आयोग समझ नहीं पा रहा कि पराली की समस्या का समाधान निकाले तो निकाले कैसे। मानसून सिर पर है औैर इसके बाद देखते ही देखते सर्दियों की आहट शुरू हो जाएगी। इसी के साथ पराली का धुआं फिर से दिल्ली एनसीआर का दम घोटने लगेगा। इस समस्या का सुलझाने का जिम्मा सरकार ने आयोग को दे तो दिया, लेकिन इससे पहले उसे नख दंत विहीन भी कर दिया। अब आयोग के सदस्य समस्या का तकनीकी समाधान खोज रहे हैं। लेकिन अगर तकनीक से ही समस्या हल हो पाती तो शायद सालों पहले ही हो चुकी होती।