नई दिल्ली [सौरभ श्रीवास्तव]। दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान प्रबंधन को चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे जिससे कि राष्ट्रीय कैंसर संस्थान की सुविधाओं का अधिकाधिक मरीजों को लाभ मिल सके और इलाज के लिए वेटिंग खत्म की जा सके। देश के सबसे प्रमुख चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कैंसर पीड़ितों की रेडियोथेरेपी के लिए लंबी वेटिंग दुर्भाग्यपूर्ण है। रेडियोथेरेपी न हो पाने के कारण कैंसर मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। वहीं मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है, जो उनके लिए खासा महंगा भी साबित हो रहा है।

एम्स के तहत राष्ट्रीय कैंसर संस्थान (एनसीआइ) का निर्माण हरियाणा के झज्जर जिले में किया गया है, लेकिन करीब दो हजार करोड़ रुपये की लागत से इस एनसीआइ के तैयार हो जाने के बावजूद कैंसर के मरीजों की परेशानी कम न होना अत्यंत निराशाजनक है। इसमें कोई दो राय नहीं कि एम्स पर मरीजों का बोझ बहुत अधिक है। देश के दूरदराज के इलाकों से भी मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद लिए एम्स पहुंचते हैं, लेकिन मरीजों की संख्या के अनुपात में यहां संसाधन न बढ़ने के कारण मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। एम्स पर मरीजों के भारी बोझ को कम करने के लिए यह आवश्यक है कि दिल्ली के साथ ही राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में भी ऐसे कई सरकारी अस्पताल विकसित किए जाएं, जहां मरीजों को एम्स के स्तर का गुणवत्ता वाला इलाज मिले।

यही नहीं, एम्स प्रबंधन को भी यह चाहिए कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि राष्ट्रीय कैंसर संस्थान की सुविधाओं का अधिकाधिक मरीजों को लाभ मिल सके और यहां इलाज के लिए वेटिंग खत्म की जा सके। साथ ही, कैंसर मरीजों को एम्स से झज्जर स्थित एनसीआइ ले जाने के लिए परिवहन की सुविधा मुहैया कराई जानी चाहिए, ताकि उन्हें वहां पहुंचने में किसी तरह की परेशानी न होने पाए। यह समझा जाना चाहिए कि कैंसर मरीजों को बिना वे¨टग के बेहतर इलाज मिलेगा, तभी एनसीआइ को बनाने का उद्देश्य सफल हो पाएगा।

Edited By: Jp Yadav