नई दिल्ली [किशन कुमार]। इन्होंने न लौ का रंग देखा है और न ही इन्हें उसकी चमक का आभास है। इन्हें अंधेरे व रोशनी में फर्क का पता नहीं है। इनके लिए तो ये चुपचाप चले आते हैं और चुपचाप ही चले जाते हैं, लेकिन इन्हें यह जरूर पता है कि अपने हुनर से दूसरों के जीवन को कैसे रोशन करना है। यही कारण है कि अपने जज्बे व हुनर से ये दृष्टिबाधित लोग दीये व मोमबत्ती बनाकर दूसरों के घरों को रोशन कर रहे हैं।

लाल बहादुर शास्त्री मार्ग स्थित द ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन में 30 साल से काम करने वाले दृष्टिबाधित 60 वर्षीय राजकुमार कहते हैं कि बेशक उन्हें रंगों का ज्ञान नहीं है और उन्हें नहीं पता कि रोशनी कैसी होती है, लेकिन इसके बावजूद मन में एक जुनून है दूसरों के जीवन में रोशनी का रंग भरने का।

राजकुमार कहते हैं कि वे देख नहीं सकते, लेकिन जब लोग उनकी बनाई मोमबत्ती व दीयों को खरीदकर अपने घरों को रोशन करते हैं तो उनके मन को खुशी होती है कि लोग उनकी मेहनत की कद्र कर रहे हैं। इससे भी उन लोगों को अपने काम में जुटे रहने की हिम्मत मिलती है। यही कारण है कि इतने सालों में यहां पर बहुत कुछ सीखने को मिल गया है।

हर साल दिवाली के अवसर पर इसी तरह सुबह से शाम तक अपने इस हुनर की बदौलत लोगों का घर रोशन करने में जुट जाते हैं। वहीं, छत्तीसगढ़ से पहुंची दृष्टिबाधित पदमावती जब कुछ सेकेंड में मोमबत्तियों को पैक कर देती हैं तो हर कोई उनके काम को देखकर हैरान हो जाता है। पद्मावती कहती हैं कि इससे पहले छत्तीसगढ़ में जीवन सिर्फ कट रहा था, लेकिन अब जीवन को जीने का एक नजरिया मिला है।

बचपन से ही देख पाने में असमर्थ थी। ऐसे में अंधेरे में जीवन कट रहा था, लेकिन मोमबत्तियों व दीयों के बीच आकर जीवन में भी रोशनी भर गई है। प्रतिदिन इसी प्रकार लोगों के लिए मोमबत्तियों की पैकिंग करती हैं। द ब्लाइंड रिलीफ एसोसिएशन के कार्यकारी सचिव कैलाश चंद्र पांडे ने बताया कि यहां पर हर वर्ष दिवाली के मौके पर 30 से भी अधिक दृष्टिबाधित लोग अपने हुनर के दम पर दीये व मोमबत्ती बनाते हैं, जिन्हें लोग भी हाथोंहाथ खरीदते हैं। उन्होंने बताया कि इनको इस काम के लिए पूरी ट्रेनिंग दी जाती है, जिसे ये जल्द सीख भी जाते हैं। ये लोग एक नहीं, बल्कि अलग-अलग डिजाइन वाली 70 किस्म की मोमबत्तियां बनाते हैं। इसी प्रकार करीब 12 किस्म के दीयों को भी इन्हें बखूबी तैयार करना आता है।

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