नई दिल्ली, जागरण संवाददाता। निजामुद्दीन स्थित सुंदर नर्सरी में गोल्डन हाइव फाउंडेशन की ओर से ‘नो द बी’ कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसमें लोगों को मधुमक्खी पालन व शहद के बारे में जानकारी दी गई। कार्यशाला में मधुमक्खी पालन करने वालों के साथ नर्सरी में घूमने आए लोग भी शामिल हुए।

शहरी प्रदूषण की वजह से मधुमक्खी की संख्या पर असर पड़ा

प्रकृति की छांव में लोगों को मधुमक्खी को लेकर जागरूक किया गया। कार्यशाला के आयोजक राकेश गुप्ता ने बताया कि शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण की वजह से मधुमक्खी की संख्या पर असर पड़ रहा है। लोग शहद तो खाते हैं, लेकिन उनके पालन व संरक्षण की बात कोई नहीं करता। हमें उनको लुप्त होने से बचाना है। यह तब ही संभव हो पाएगा, जब लोगों के अंदर जागरूकता आएगी।

कई राज्यों में आयोजित हो चुकी है कार्यशाला

उन्होंने बताया कि वह अब तक गुजरात, मध्य प्रदेश, हिमाचल, उत्तराखंड और अन्य राज्यों में मधुमक्खी पालन को लेकर जागरूकता कार्यशाला आयोजित कर चुके हैं। इसमें कई ग्रामीण क्षेत्र आगे आ रहे हैं। उन्होंने बाजार में बिक रहे शहद और शुद्ध शहद के अंतर को स्पष्ट किया। कार्यशाला में लोगों को बताया गया कि मधुमक्खी फूलों से पराग कैसे लाती है और छत्ता किस तरह बनाती है। इसको लेकर नर्सरी में एक यात्र भी आयोजित की गई।

आखिरकार पता चला कहां हो रही थी गलतियां

गुरुग्राम से आई रेखा ने बताया कि उन्हें मधुमक्खी पालन करना पंसद है। कई बार मधुमक्खी पालन किया, लेकिन सफल नहीं हो पाई थी। यहां आकर अपनी गलतियों के बारे में पता चला। आने वाले दिनों में मधुमक्खी पालन करना है। योगेश ने बताया कि मधुमक्खी शहद किस तरह बनाती है, इसकी विस्तार से जानकारी मिली। मधुमक्खी पालन के लिए कोई बड़ी जगह की जरूरत नहीं, लेकिन पर्यावरण स्वच्छ होना जरूरी है। इसमें युवाओं को आगे आने की जरुरत है। इसकी शुरुआत छोटी सी जगह में भी कर सकते हैं। नेहा ने बताया कि पहले शहद निकालने के लिए छत्ते के सामने धुआं करते थे, लेकिन उसके बाद मधुमक्खी वहां छत्ता नहीं बनाती थी, जो गलत प्रक्रिया थी। यहां अलग-अलग मधुमक्खी की विशेषताओं के बारे में बताया गया।

Edited By: Prateek Kumar