गुरुग्राम [महावीर यादव]। वतन के नाम पर जीना, वतन के नाम पर मरना। शहादत से बड़ी कोई इबादत हो नहीं सकती। 13 जून 1999 की रात, जम्मू-कश्मीर के गंदरबल के पास घुसपैठियों के साथ सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की मुठभेड़ हो रही थी। आजाद सिंह आतंकियों को चुन-चुनकर मार रहे थे। उन्होंने अपनी टुकड़ी के साथ दस घुसपैठियों को मौत के घाट उतार दिया। आंख में गोली लगने के बावजूद वह टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे। इसी दौरान एक गोली उनके सीने में आकर लगी और भारत माता का यह सपूत शहीद हो गया।

बच्चे व पत्नी को पार्क में ही छोड़कर आजाद मुठभेड़ स्थल पर पहुंचे

आजाद सिंह बीएसएफ में सहायक कमांडेंट थे। यह घटना तब हुई थी जब रात में ड्यूटी करने के बाद दिन में उन्हें अवकाश मिला था। वह अपनी यूनिट के पास ही बने एक पार्क में पत्नी तथा सात माह के बच्चे के साथ बैठे थे, तभी उन्हें सूचना मिली की बीएसएफ की उनकी टुकड़ी की घुसपैठियों के साथ मुठभेड़ हो गई है। बच्चे व पत्नी को पार्क में ही छोड़कर आजाद मुठभेड़ स्थल पर पहुंचे और टुकड़ी का नेतृत्व किया।

फौज में जाने का जज्बा

मूलरूप से झज्जर जिले के गांव जाखोदा के रहने वाले आजाद सिंह का जन्म 15 अगस्त 1970 को हुआ था। उनका मन शुरू से ही फौज में जाने का था। वर्ष 1996 में बीएसएफ में सहायक कमांडेंट के रूप में भर्ती हुए। 1999 में कारगिल का युद्ध हुआ तो उनकी तैनाती बीएसएफ की 141वीं वाहिनी में श्रीनगर में थी। रविवार का दिन था और उन्हें अवकाश मिला था। वह पत्नी अलका दलाल व सात माह के बेटे कोणार्क के साथ पार्क में बैठे थे। वहीं पर उन्हें सूचना मिली कि कुछ आतंकी भारतीय जवानों पर फायरिंग कर रहे हैं।

आजाद सिंह के सीने में लगी गोली

वह पत्नी व बेटे को छोड़कर तुरंत मोर्चे पर पहुंचे। दिन में फायरिंग का मुंहतोड़ जवाब देने के बाद रात में टुकड़ी के साथ सर्च ऑपरेशन में शामिल हुए। इसी दौरान उनकी टुकड़ी का सामना दस आतंकियों से हुआ। तीन को तो आजाद ने अपनी रायफल से गोली चलाकर ढेर कर दिया। अपने साथियों का हाल देखकर अन्य आतंकी छिप गए। वे रह-रहकर गोली चला रहे थे। भारतीय जांबाज उन्हें ढूंढ़-ढूंढ़कर मार रहे थे। इसी दौरान आजाद की आंख में गोली लगी, लेकिन वह मोर्चे से नहीं हटे और साथियों का उत्साह बढ़ाते रहे। तब तक आठ आतंकी मारे जा चुके थे। दो निकल कर भागे तो बीएसफ के जवानों ने उनका पीछा किया। आतंकियों ने फायर किया और गोली आजाद सिंह के सीने में लगी और वह शहीद हो गए। अफसर की शहादत का बदला जवानों ने दोनों आतंकियों को मारकर तुरंत ले लिया।

बचपन से ही निडर थे आजाद

आजाद बचपन से ही खतरों के खिलाड़ी थे। देश सेवा का जज्बा भी बचपन से था। गुरुग्राम के जीएसटी कार्यालय में बतौर अधीक्षक तैनात रवि कादियान आजाद सिंह के बचपन के साथी हैं। उनका गांव बेरी भी झज्जर में है। रवि बताते हैं कि हम दोनों ने कॉलेज में साथ पढ़ाई की। आजाद को सादगी पसंद थी, कपड़े पहनने से लेकर खान-पान में भारतीयता झलकती थी। द्रोणाचार्य कॉलेज के बाद दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में भी साथ रहे। हम सब दोस्त उन्हें टेकनपुर के ट्रेनिंग सेंटर में छोड़ने गए तो चलते वक्त उन्होंने कहा था कि देश के लिए कुछ न कुछ करने का जज्बा सभी में होना चाहिए।

तस्वीर से मिला संबल

पत्नी अलका दलाल कहती हैं कि जब रात में पति की शहादत की सूचना मिली तो मुझे लगा कि जैसे मेरी दुनिया उजड़ गई, तभी नजर सामने लगी उनकी वर्दी वाली तस्वीर पर गई तो जैसे मुझे संबल मिला। लगा कि वह कह रहे हैं कि इतना दुख क्यों, मैंने तो अपनी मां के लिए बलिदान दिया है। बेटे को इस काबिल बनाओ कि वह देश सेवा करे। मैंने खुद को संभाला और गुरुग्राम (मालिबी टाउन, सोहना रोड) आकर समाज सेवा से जुड़ी, वकालत करने लगी। अब यही इच्छा है कि बेटा आइपीएस बन जाए।

हर काम में हमेशा आगे रहने की जिद

आजाद सिंह के बैचमेट रहे सुरेश कुमार बीएसएफ के छावला सेंटर में सेकेंड इन कमांड के रूप में तैनात हैं। वह कहते हैं कि आजाद हरफनमौला थे। ट्रेनिंग सेंटर में आते ही मेरी पहले ही दिन उनसे दोस्ती हो गई थी। सबसे दोस्ती गांठना उनकी आदत थी। उनमें लीडरशिप की भावना तो गजब की थी। बैच में 148 अधिकारी थे। पूरी ट्रेनिंग के दौरान वह टॉप-10 में शामिल रहे। वह बास्केटबॉल के अच्छे खिलाड़ी थे।

Posted By: Amit Mishra