ब्रह्मानंद मिश्र। स्वाधीनता के बाद बीते 75 वर्षों में देश ने हर क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन स्वास्थ्य के मामले में हमारी तरक्की खास है। कोविड-19 महामारी के दौर में वैक्सीन के लिए दुनिया हमारी तरफ देख रही थी और हमने उनकी अपेक्षाओं को यथासंभव पूरा किया, जिसकी विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित दुनिया के तमाम देशों ने सराहना की। बीते साढ़े सात दशक में हमने क्या हासिल किया और आगे क्या लक्ष्य होगा, स्वाधीनता के अमृत महोत्सव के मौके पर विचार आवश्यक है।

भारत की चिकित्सा प्रणाली सदियों पुरानी है और समय-समय पर इसमें बदलाव होता रहा है। उसी का परिणाम है कि आज हम स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हैं। आयुर्वेद दुनियाभर में हमारी सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है। हमारे चिकित्सा मनीषियों ने लिखा है कि जब तक मानव जाति है, ऐसा कभी नहीं हो सकता है कि पूरे जीवनकाल में उसे वैद्य की जरूरत न पड़े। उपचार के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में आयुर्वेद की अलग-अलग विधाएं प्रचलन में रही हैं। एम्स का नाम ही अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान है यानी मौजूदा दौर की मेडिकल साइंस को हम आयुर्विज्ञान कहते हैं। आज देश में कुल 19 एम्स संचालित हो रहे हैं और पांच पर काम चल रहा है।

प्राचीन है हमारी चिकित्सा पद्धति

देश में जब अंग्रेज आए तो उन्होंने हर एक चीज को संगठन का रूप देना शुरू किया। उन्होंने हर क्षेत्र के लिए कायदे कानून बनाए। उन्हीं का बनाया हुआ 1940 का एक कानून है- ‘ड्रग एंड कास्मेटिक एक्ट।’ माडर्न मेडिसिन, जो चलन में है, उसे आम भाषा में एलोपैथ कहते हैं। सुश्रळ्त संहिता से सदियों पुरानी चिकित्सा प्रणाली का पता चलता है। उस कालखंड में चरक जैसे विद्वान भी हुए। धन्वंतरि का इतिहास तो उससे भी प्राचीन है। अंग्रेजों ने आधुनिक चिकित्सा प्रणाली का विधान तैयार किया। उसी का आधार स्वास्थ्य केंद्र हैं।

स्वाधीनता के समय थे मात्र चार मेडिकल कालेज

स्वाधीनता के पहले हमारे पास चार मेडिकल कालेज थे- प्रिंस आफ वेल्स मेडिकल कालेज, पटना, जिसका वर्तमान नाम है- पटना मेडिकल कालेज एंड हास्पिटल। दूसरा था- स्टेनले मेडिकल कालेज, चेन्नई। तीसरा था- किंग जार्ज मेडिकल कालेज लखनऊ और चौथा मेडिकल कालेज कोलकाता में था। स्वाधीनता के बाद पिछले 75 वर्षों में हमने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की। आज देश में 600 से अधिक मेडिकल कालेज हैं। इनमें से ज्यादातर पिछले आठ वर्षों में खुले हैं। मोदी सरकार का संकल्प देश के हर जिले में मेडिकल कालेज खोलने का है। दूसरी तरफ देखा जाए तो आयुर्वेद एक पूरी तरह विकसित विज्ञान था और आज भी है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में निरंतर प्रगति

स्वाधीनता के बाद हमें विरासत में कुछ ही मेडिकल कालेज, उपचार का प्रोटोकाल, कुछ पीएचसी और कुछ सीएचसी, माडर्न मेडिसिन की कार्यप्रणाली प्राप्त हुई थी। धीरे-धीरे हमारी जरूरतों के अनुरूप स्वास्थ्य प्रणाली विकसित की गयी। उस दौर में हम दवाओं के लिए दूसरे देशों पर निर्भर थे, लेकिन अब हमने दवाओं का निर्माण शुरू कर दिया है। आज हम दुनिया के अन्य देशों को भी दवाओं की आपूर्ति कर रहे हैं। वैक्सीन उत्पादन में भारत शीर्ष पर है। कोरोना महामारी के दौर में भारत ने न केवल अपने नागरिकों को वैक्सीन उपलब्ध कराई, बल्कि दुनिया के अनेक देशों को भी वैक्सीन की आपूर्ति की।

अनेक बीमारियों को नियंत्रित करने में सफलता

भारत जैसे विकासशील देश में संक्रामक बीमारियों की गंभीर चुनौती रही है। स्वाधीनता के बाद इनके नियंत्रण पर बहळ्त काम हळ्आ फिर भी हमें हर साल मलेरिया, कालाजार, टीबी, चिकनगुनिया, डेंगू जैसी अनेक संक्रामक बीमारियों का सामना करना पड़ता है। ये समस्याएं भारत और अफ्रीकी देशों में निरंतर बनी रहती हैं। इसके साथ-साथ ही हाइपरटेंशन, डायबिटीज, कैंसर, कम उम्र में हार्ट अटैक जैसी बीमारियों का भी बोझ बढ़ रहा है। आमतौर पर जब कोई देश विकास कर रहा होता है, तो गैर-संचारी रोगों का भार भी बढ़ता है। इसके लिए हमें भी गंभीरता से विचार और काम करने की जरूरत है।

आमजन को मिल रहा है गुणवत्ता पूर्ण उपचार

आज स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र में नयी-नयी तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे देश के दूरदराज इलाकों तक लोगों को गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा उपलब्ध हो रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल बढ़ रहा है। आने वाले समय में शोध और विकास कार्यों को बढ़ावा देने की जरूरत है, ताकि भारत न केवल अपने नागरिकों के लिए बल्कि दुनिया के अन्य देशों के लिए भी गुणवत्तापूर्ण और सस्ती चिकित्सा उपलब्ध करा सके। इस प्रयास में देश काफी हद तक तेजी से काम कर रहा है, जिसका उदाहरण बढ़ी हळ्ई औसत आयळ् है।

शोध और विकास पर जोर

शोध और विकास के लिए हमें जितना करना चाहिए था, उतना हम नहीं कर पाए। हालांकि, इस दिशा में अब मजबूती से प्रयास हो रहे हैं। कुछ दशकों पहले तक हमारे सामने मातृ और शिशु मृत्यु दर की गंभीर समस्या थी, लेकिन अनेक स्वास्थ्य एवं जागरूकता कार्यक्रमों द्वारा हम इसे नियंत्रित करने में सफल रहे। देश में कुपोषण की गंभीर समस्या बनी हुई है, जिसके उन्मूलन के लिए निरंतर प्रयास हो रहे हैं। उम्मीद है कि 25 वर्ष बाद जब हम अपनी स्वाधीनता का 100वां साल मना रहे होंगे, यह सवाल हमारे सामने नहीं होगा।

स्वच्छता अभियान में सफलता

हम स्वच्छता को नजरअंदाज करते रहे, जिससे संक्रामक बीमारियां बढ़ती गईं, लेकिन स्वच्छ भारत मिशन जैसे कार्यक्रमों से समाज में जागरूकता आई है, जिससे बीमारियां कम हो रही हैं और लोग अधिक सतर्क हो रहे हैं। देश में राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम आया, जिससे अनेक तरह की बीमारियों की रोकथाम संभव हो सकी।

मेडिकल टूरिज्म में भारत की धमक

आने वाले दिनों में भारत मेडिकल टूरिज्म का बहुत बड़ा हब बन सकता है। हमारे डाक्टर और मेडिकल प्रोफेशनल जो बाहर जाकर सेवाएं दे रहे हैं, वे भारत में ही रहकर अपना योगदान दे सकेंगे। अगले 25 वर्षों में भारत दुनिया के लिए एक बड़ी मिसाल बन सकता है। हर देश के पास इलाज के लिए एक ही विधा है, जबकि हमारे पास एलोपैथी के साथ-साथ आयुर्वेद, होम्योपैथ, यूनानी, सिद्धा जैसी पद्धतियां हैं।

[डा. अंशुमान कुमार, वरिष्ठ कैंसर सर्जन एवं स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ]

Edited By: Sanjay Pokhriyal