नई दिल्ली [वीके शुक्ला]। लोकसभा चुनाव के परिणाम को देखकर यह बात जरूर साफ हो रही है कि यदि आम आदमी पार्टी (आप) और कांग्रेस के बीच गठबंधन हो भी जाता तो भी आप और कांग्रेस के लिए जीत का स्वाद चखना संभव नहीं था। दिल्ली में एक भी सीट पर आप व कांग्रेस को इतने वोट नहीं मिले हैं कि दोनों को मिलाकर भाजपा प्रत्याशी के बराबर हो पाएं। गठबंधन को लेकर आप और कांग्रेस दोनों के बीच लंबी खींचतान चली थी। गठबंधन को लेकर गत वर्ष अगस्त व सितंबर से ही बात शुरू हो गई थी और इसके बाद बात बनती और बिगड़ती रही।

सीटों के बंटवारे को लेकर नहीं बात

जनवरी में कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष शीला दीक्षित ने गठबंधन के प्रयासों के विरोध में बयान दिया था, जिस पर 18 जनवरी को आप ने घोषणा की कि वह अपने दम पर दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ़ में चुनाव लड़ेगी और कांग्रेस से गठबंधन नहीं करेगी, लेकिन इसके बाद भी फिर से गठबंधन को लेकर प्रयास शुरू हुए। इसके पीछे का गणित यह था कि गठबंधन के बाद आप और कांग्रेस मिलकर भाजपा के प्रत्याशी को हरा देंगे। अंतिम समय में सीटों के बंटवारे को लेकर बात नहीं बनी और गठबंधन नहीं हो सका।

गठबंधन के बाद भी जीतना था मुश्‍किल

आप और कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने-अपने प्रत्याशी उतार दिए। चुनाव के परिणाम न आने तक माना जा रहा था कि ये दोनों दल साथ मिलकर चुनाव लड़ते तो जीत सकते थे, लेकिन नतीजों ने साफ कर दिया कि गठबंधन के बाद भी भाजपा प्रत्याशी नहीं हारते। आप और कांग्रेस का वोट फीसद जोड़ लें तो भी आंकड़ा काफी कम है। आप के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि गठबंधन न करके हार जाना हमारे लिए उतना नुकसानदायक नहीं है, जितना गठबंधन के बाद हार जाना होता, क्योंकि उस स्थिति में हमें विधानसभा चुनाव में जनता के बीच जाने में परेशानी होती। विपक्षी दल भी इसे मुद्दा बना सकते थे।

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