नई दिल्ली [रणविजय सिंह]। कोरोना मरीजों को महामारी के साथ ही आर्थिक व सामाजिक स्तर पर भावनात्मक पीड़ा भी ङोलनी पड़ी। खास तौर पर निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को ज्यादा परेशानी हुई। आलम यह रहा कि नौकरी पेशा एक चौथाई लोगों को मेडिकल अवकाश तक नहीं मिला। ऐसे में जिनके पास छुट्टियां नहीं थी, उन्हें वेतन कटौती के रूप में आर्थिक नुकसान ङोलना पड़ा। यह बात एम्स द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आई है।

दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के डाक्टरों ने कोरोना की पहली लहर के दौरान अस्पताल में भर्ती किए गए कोरोना के 245 मरीजों पर एक अध्ययन किया है। इसमें 190 नौकरी पेशा लोग शामिल थे, जिनमें 99 सरकारी नौकरी जबकि 47 निजी कंपनियों के कर्मचारी शामिल थे। इस अध्ययन को डाक्टरों ने हाल ही में मेडिकल जर्नल (जर्नल आफ फैमिली मेडिसिन व प्राइमरी केयर) में प्रकाशित किया है।

अध्ययन के दौरान 24.7 फीसद मरीजों ने बताया कि उन्होंने कोरोना होने पर इलाज के लिए व्यक्तिगत अवकाश लिया। ये सभी निजी क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारी थे। अध्ययन में कहा गया है कि व्यक्तिगत अवकाश के बदले वेतन में कटौती हुई। इसलिए कर्मचारियों की आर्थिक सुरक्षा के लिए बीमारी व आइसोलेशन में रहने के दौरान वेतन कटौती के बगैर विशेष अवकाश का प्रविधान निजी क्षेत्र में भी होना चाहिए।

अध्ययन में शामिल एम्स के मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डा. अरविंद कुमार ने कहा कि एम्स में भर्ती होने वाले मरीजों की सामाजिक आर्थिक स्थिति से संबंधित डाटा एकत्रित किया गया। इसके तहत मरीजों के कामकाज, आय, अवकाश इत्यादि की जानकारी ली गई। इस अध्ययन में यह बात निकलकर सामने आई की 66.3 फीसद नौकरी पेशा मरीजों का कामकाज प्रभावित हुआ। व्यक्तिगत अवकाश मरीजों ने खुद लिया या दबाव में यह कह पाना मुश्किल है।

कोरोना संक्रमण के शुरुआती दिनों में किसी को संक्रमण होने पर भेदभाव भी बहुत होता था। शारीरिक दूरी के नियम के पालन के नाम पर कुछ लोगों ने मरीजों से भावनात्मक दूरी भी बनाना शुरू कर दिया था। इस डर से भी संभव है कि कुछ मरीजों ने अपनी बीमारी के बारे में सही जानकारी अपने दफ्तर में साझा नहीं की हो और मेडिकल अवकाश की जगह व्यक्तिगत अवकाश लिया हो। अध्ययन में यह पाया गया कि कार्यस्थल पर भेदभाव से बचने के लिए चार कर्मचारियों ने अपनी बीमारी के बारे में दफ्तर में जानकारी नहीं दी।

Edited By: Jp Yadav