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राष्ट्रीय विधायी सूचकांक ही होगा जनप्रतिनिधियों का रिपोर्ट कार्ड: विजेन्द्र गुप्ता

Published: Sat, 31 Jan 2026 06:52 PM (IST)

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआई) का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य विधानसभाओं को जनता के ...और पढ़ें

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने एनएलआई की परिकल्पना से लेकर इसको लागू करने के लिए प्रक्रिया और संभावित परिणामों पर विस्तार से चर्चा की।

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने एनएलआई की परिकल्पना से लेकर इसको लागू करने के लिए प्रक्रिया और संभावित परिणामों पर विस्तार से चर्चा की।

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संक्षेप में पढ़ें

विधानसभाओं में बैठकों की संख्या में लगातार गिरावट, विचार-विमर्श की जगह धरना-प्रदर्शन व बहिर्गमन और जनता द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधियों का सदन के कामकाज के प्रति अरुचि को लेकर बढ़ती चिंता के बीच 'राष्ट्रीय विधायी सूचकांक' यानी नेशनल लेजिस्लेटिव इंडेक्स (एनएलआइ) की अवधारणा सामने आई है। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने पिछले दिनों लखनऊ  में पीठासीन अधिकारियों के तीन दिवसीय सम्मेलन में इसका उल्लेख करते हुए दावा किया कि इसके जरिये विधायिका जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी होगी, नवाचारों को बढ़ावा मिलेगा और राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विकसित होगी। बीते साल बेंगलुरु में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के सम्मेलन में उन्होंने ही पहली बार राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआइ) का प्रस्ताव दिया। वह कहते हैं कि लोकतंत्र सिर्फ किताबी जमा-खर्च नहीं, भाषण-नारेबाजी नहीं है। यहां हर जनप्रतिनिधि, पक्ष-विपक्ष और हर सदन को अपने एक-एक काम का हिसाब देना होगा। राष्ट्रीय विधायी सूचकांक यही हिसाब रखेगा। यह जनप्रतिनिधियों का रिपोर्ट कार्ड होगा। इसके जरिये ही जनता उन्हें परख सकेगी। 31 में से 28 विधानसभाओं में इसे लागू करने की तैयारी शुरू हो चुकी है। श्रीराम कालेज आफ कामर्स के पूर्व छात्र गुप्ता छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़ गए थे। वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष रहे। भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष, तीन बार पार्षद और तीन बार  रोहिणी क्षेत्र  से विधायक  रहे गुप्ता दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वर्तमान में वह दिल्ली विधानसभा के सातवें अध्यक्ष हैं। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं। दैनिक जागरण के दिल्ली राज्य ब्यूरो के प्रमुख संवाददाता संजीव गुप्ता ने उनसे एनएलआइ की अवधारणा से लेकर इसे लागू करने की प्रक्रिया और संभावित परिणामों पर विस्तार से चर्चा की। प्रस्तुत हैं बातचीत के मुख्य अंश:

क्या है एनएलआई?

बीते वर्ष बेंगलुरू में आयोजित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ के सम्मेलन में विजेन्द्र गुप्ता ने ही पहली बार राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआई) का प्रस्ताव दिया। वह कहते हैं कि लोकतंत्र सिर्फ किताबी जमा-खर्च नहीं, भाषण-नारेबाजी नहीं है। यहां हर जनप्रतिनिधि, पक्ष-विपक्ष और हर सदन को अपने एक-एक काम का हिसाब देना होगा। एनएलआई यही हिसाब रखेगा। यह जनप्रतिनिधियों का रिपोर्ट कार्ड होगा। 31 में से 28 विधानसभाओं में इसे लागू करने की तैयारी शुरू हो चुकी है।

परिचय

श्रीराम काॅलेज ऑफ कॉमर्स के पूर्व छात्र विजेन्द्र गुप्ता छात्र जीवन से ही राजनीति से जुड़ गए थे। वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के उपाध्यक्ष रहे। भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष, तीन बार पार्षद और तीन बार रोहिणी क्षेत्र से विधायक रहे गुप्ता दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। वर्तमान में वह दिल्ली विधानसभा के सातवें अध्यक्ष हैं। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य भी हैं। 

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआई) की जरूरत क्यों है?

दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष बनने के बाद मैंने सदन और सम्मेलनों दोनों ही जगह देखा कि बहुत से विषय उठाए जाते हैं। ढेरों सवाल खड़े होते हैं, लेकिन उनका समाधान क्या है, इस पर आखिर तक चर्चा नहीं होती है। या यूं कहें कि पता ही नहीं होता है कि उस समाधान की ओर कैसे बढ़ें? उसी समाधान को ढूंढने का रास्ता है नेशनल लेजिस्लेटिव इंडेक्स (एनएलआई), यानी राष्ट्रीय विधायी सूचकांक। इसका उद्देश्य है राज्यों के बीच एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा के साथ किसी भी मुद्दे पर समग्र रूप से ध्यानाकर्षित करना है। जैसे, आज मैं दिल्ली में बैठकर अगर यह देखना चाहूं कि तमिलनाडु की विधानसभा में किस तरह के प्रश्न पूछे जा रहे हैं? उसका क्या उत्तर आ रहा है? कितनी बैठकें हो रही हैं? कितने सदस्य उसमें शामिल हो रहे हैं? जो सवाल पूछ रहे हैं, वह किस आयु वर्ग के हैं? क्या कार्रवाई हो रही है?... नेशनल ई-विधानसभा एप्लीकेशन (नेवा) के जरिए यह सब पता करना संभव होगा, यानी नेवा के साफ्टवेयर पर एक ही फार्मेट में पूरे देश की विधानसभा की कार्रवाई को देखा जा सकता है।

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एनएलआई की परिकल्पना कब से शुरू हुई थी? आप इससे कैसे जुड़े?

बेंगलुरू में बीते साल सितंबर में राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (कामनवेल्थ पार्लियामेंटरी एसोसिएशन, यानी सीपीए) के सम्मेलन में मैंने पहली बार यह प्रस्ताव रखा था। सीपीए, राष्ट्रमंडल देशों की संसदों और विधानमंडलों को जोड़ने वाला एक संगठन है, जिसकी स्थापना 1911 में हुई थी। जिसका मुख्य उद्देश्य संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करना, ज्ञान का आदान-प्रदान करना और सदस्यों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है, ताकि संवैधानिक, विधायी और सुशासन के मुद्दों पर चर्चा की जा सके।

एनएलआई और नेवा में क्या अंतर है?

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक (एनएलआई) भारतीय विधानमंडलों के प्रदर्शन, उत्पादकता और पारदर्शिता को मापने और उनकी रैंकिंग निर्धारित करने के लिए प्रस्तावित एक ढांचा है। वहीं, राष्ट्रीय ई-विधान एप्लिकेशन (नेवा) एक डिजिटल प्लेटफार्म (एप/वेबसाइट) है, जिसे विधायी प्रक्रियाओं को कागजी कार्रवाई से मुक्त करने और सभी सदनों को एक ही मंच पर जोड़ने के लिए डिजाइन किया गया है। हर विधानसभा का एक डाटा बैंक तैयार हो रहा है। राष्ट्रीय विधायी सूचकांक लागू होते ही यह सब जानकारियां नेवा के प्लेटफार्म पर उपलब्ध होंगी। जरूरत के मुताबिक इसमें बदलाव भी किया जा सकेगा।

कितने राज्यों में लागू करने की तैयारी है?

- देश की 31 में से 28 विधानसभा में नेवा लागू करने पर काम चल रहा है।

कोई ऐसा घटनाक्रम, जिसके बाद इसे लागू करने की पहल में तेजी आई?

- जब बेंगलुरू में नेशनल इंडेक्स का यह विषय रखा गया तो इस मुद्दे ने तुरंत ही अपना एक स्थान बना लिया। इस पर बहुत सकारात्मक चर्चा होने लगी। समाचार-पत्रों ने भी इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया। इन प्रतिक्रियाओं को देखते हुए लगा कि इसकी बहुत जरूरत महसूस की जा रही है। वहीं पर निर्णय हुआ कि जनवरी में जब लखनऊ में मिलेंगे, तो इस पर कुछ तय करेंगे। उस बीच मैं लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से भी मिला था। मैंने इससे जुड़े कुछ प्रस्ताव उनके सामने रखे थे, तो उन्होंने उसको काफी सराहा था। लखनऊ में जब मैंने यह विषय रखा तो उन्होंने कहा कि प्रिसाइडिंग आफिसर्स की एक कमेटी बनाएंगे, जो इस पर अपनी रिपोर्ट देगी।

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छात्रसंघ चुनाव से लेकर विधानसभा अध्यक्ष तक के सफर में आपने विधायिका के छोटे से लेकर बड़े स्वरूप को देखा है। इसकी कार्यप्रणाली को कैसे बदलते हुए पाया? क्या कुछ घटनाएं याद हैं?

- मैंने जो महसूस किया है कि बहुत तेजी से सदनों की गरिमा प्रभावित हो रही है। अगर मैं अतीत में अपने से भी पहले... और बहुत पहले जाता हूं तो मैं देखता हूं कि सदनों में पहले बहुत गंभीर चर्चाएं होती थीं। गंभीर बहस होती थी। उसमें से समाधान भी निकलता था। अभी जो मैं देख रहा हूं, वह सबकुछ बड़ी तेजी से शोरगुल में परिवर्तित होता जा रहा है। सदनों की बैठकों की संख्या में कमी आ रही है। सदनों में होने वाले कामकाज सिर्फ एक खानापूर्ति बनते जा रहे हैं। जो बातें तथ्यों के साथ होनी चाहिए, उस पर सिर्फ शोरगुल कर एक सस्ती लोकप्रियता हासिल करने का एक तरीका निकाला गया है। शोरगुल करो, सदन की बैठक को डिस्टर्ब करो और अपनी बात किसी भी तरह से लोगों तक पहुंचाओ। चाहे उसका कोई नतीजा निकले या नहीं निकले। उनको न तो उस पर कोई चर्चा चाहिए, न जवाब। सदन लोकतंत्र का मंदिर है। अगर इसके 'स्टैंडर्ड' (स्तर) में गिरावट आ गई है तो यह चिंता का विषय है। इसमें सुधार होना चाहिए।

कार्य प्रणाली में क्या-क्या खामियां हैं, जिन्हें सुधारा जाना जरूरी है?

- संविधान हमारे लिए रूलबुक है। हमारी रूलबुक जो कह रही है, उसका पालन नहीं हो रहा है। एनएलआई का उद्देश्य न सिर्फ इस कार्यप्रणाली को प्रभावी बनाना, बल्कि उसको और उत्कृष्ट करना है। वैसे, आज जो प्रविधान हैं, वह भी यदि ईमानदारी से लागू हो जाए और सदन के सभी सदस्य (पक्ष-विपक्ष) उसका अनुपालन करने लगे, तो इसमें से ही बहुत बड़ा समाधान निकल सकता है।

आपने लखनऊ सम्मेलन में कहा कि राष्ट्रीय विधायी सूचकांक विधानसभा को जनता के प्रति उत्तरदायी बनाएगा, नवाचारों को बढ़ावा देगा और राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को विकसित करेगा। कैसे?

देखिए, नए सदस्य बोल ही नहीं पाते हैं। सदन की बैठकें लगातार कम हो रही हैं। उसमें भी शोरगुल में कितना समय चला जाता है। डिबेट (किसी मुद्दे पर बहस) आज भी होती है, लेकिन उसका वह महत्व नहीं रह गया। एनएलआई से बहस की परिपाटी पुनस्थार्पित होगी। जब इंडेक्स बनेगा तो प्रतिस्पर्धा होगी। मान लीजिए केरल दावा करता है कि उनके प्रदेश में 'रेट आफ लिटरेसी', यानी साक्षरता दर सबसे ज्यादा है। इस हिसाब से माना जाना चाहिए कि वहां की शिक्षा व्यवस्था का माडल देशभर में सबसे बेहतर होगा। इसी तरह कोई यह दावा करता है कि उसके राज्य में चिकित्सा व्यवस्था का माडल देश में सबसे बेहतर है, यानी उसके यहां हेल्थ सर्विसेस राष्ट्रीय मानकों पर सबसे बेहतर होगी। अब दूसरे, तीसरे, छठे, आठवें या आखिरी नंबर पर आने वाला राज्य इन राज्यों के माॅडल को देखकर, उसमें और बेहतरी कर पहले नंबर पर पहुंचने का दावा पेश कर सकता है। इससे सकारात्मक प्रतिस्पर्धा को बल मिलेगा।

तकनीक के उपयोग पर कितना जोर?

राष्ट्रीय विधायी सूचकांक तकनीक के बगैर मुमकिन ही नहीं है। नेशनल ई-विधान एप्लीकेशन (नेवा) इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इसमें जो एसोसिएट फेलो हैं, वे भी बड़ा रोल प्ले कर सकते हैं। अगर डिबेट के स्तर को सुधारना है तो हर विधानसभा में हर विधायक के साथ एक एसोसिएट फेलो जोड़ना बहुत जरूरी है। आज जो हम एनएलआई पर काम कर रहे हैं, वह ऐसा नहीं है कि मेरे मन में एक विचार आया , मैंने कहा और वह शुरू हो गया। पैरामीटर्स तय करने के लिए 31 विधानसभाओं का तुलनात्मक चार्ट तैयार होगा। यानी, किस विधानसभा ने उस संबंधित विषय पर क्या कहा। वहां क्या चर्चाएं हुईं। क्या समधान रखा गया। नेवा साफ्टवेयर के जरिये जब यह बेसिक काम हो जाएगा। उसके बाद कोई विधायक पूरी तैयारी के साथ सदन के फ्लोर पर आएगा। उतनी ही तैयारी और तथ्यों के साथ दूसरा पक्ष तैयार होगा। जब पक्ष-विपक्ष इतनी तैयारी के साथ बहस में भाग लेंगे तो सदन में शोरगुल-हंगामे के लिए बहुत कम जगह होगी।

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कार्य कुशलता, जवाबदेही और विधायी विचार-विमर्श की गुणवत्ता का आकलन कैसे होगा ? कोई पैमाना?

पहली कार्यकुशलता, इसका आकलन तो इस आधार पर होना चाहिए कि जो बात सदन में हो रही है, वह मैदानी स्तर पर लागू हो पा रहा है या नहीं। उसका लाभ जनता तक पहुंच रहा है या नहीं। मान लीजिए, कैग (सीएजी) की रिपोर्ट्स सदन में टेबल होती हैं, यानी रखी जाती है। पब्लिक अकाउंट्स कमेटी अपनी रिपोर्ट्स को समय पर सबमिट करती है। रिपोर्ट में सरकार को चेताया गया, कुछ मापदंड तय किए गए, दिशा-निर्देश जारी किए गए। अब इससे जुड़ा हुआ कोई मुद्दा सदन में उठता है। मंत्री कोई आश्वासन देते हैं और व्यवस्था में सुधार होता है तो यह कार्यक्षमता को दर्शाता है, यानी सदन के पटल से चर्चा के दौरान, जो अमृत के रूप में विचारों का आदान-प्रदान हुआ और उसका लाभ जनता तक पहुंचा, ये उसकी कार्य क्षमता को दर्शाता है, यानी जो सदन 'कांक्रीट डिबेट' से जितने ज्यादा जनहित के मुद्दों को लागू करवा पाएगा, उस सदन की कार्यक्षमता उतनी ही बेहतर होगी। 31 विधानसभाओं के बीच इसी तरह से प्रतिस्पर्धा होगी, रैकिंग भी इसी आधार पर तय होगी।

दूसरा जवाबदेही। वास्तविकता में तो सदन में जो बहुमत का दल है, वह सरकार है, इसलिए सरकार सदन के प्रति जवाबदेह है। अब यह तय करना है कि सरकार सदन के प्रति कितनी जवाबदेह है। इसके लिए उनकी कार्य पद्धति, कार्य क्षमता, कार्य प्रणाली का आकलन जरूरी है। जो सदन जितनी पारदर्शी होगी, वह उतनी बेहतर मानी जाएगी।

तीसरा, विचार-विमर्श। सदन में कितनी बहस हो रही है? विपक्ष के दिए हुए सुझावों पर सरकार गौर कर रही है या नहीं? सरकार में सत्तारूढ़ दल के साथ कई बार छह-सात दल शामिल होते हैं। उन दलों के विधायक भी विचार-विमर्श में समान रूप से शामिल हो रहे हैं या नहीं। सदन में सभी पार्टियों के विचार-विमर्श से निकला समाधान लागू हो रहा है या नहीं। 

नगर निगम, विधानसभा, लोकसभा, राज्यसभा में अब जनहित या निर्णायक बहस देखने के बजाय सिर्फ शोरगुल, धरना प्रदर्शन और बहिष्कार ही दिखाई देता है। जनता के पैसे के दुरुपयोग को भी क्या इससे रोका जा सकेगा?

-सदन राजनीतिक मंच नहीं है। यह एक पवित्र स्थान है। राजनीति करने के लिए और बहुत तरीके हैं। सिर्फ राजनीति करके, शोर करके, राजनीतिक मुद्दों को आगे लाकर आप जनता को गुमराह नहीं कर सकते, लेकिन इस वक्त यही हो रहा है। उसी का इलाज है राष्ट्रीय विधायी सूचकांक। जैसे, मैंने पहले कहा कि सत्तारूढ़ दल सदन के प्रति जवाबदेह है। उस पर लगाम लगाने के लिए बहुत से नियम-कायदे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विपक्ष की जवाबदेही कैसे तय की जाए। वर्तमान में विपक्ष को लगता है कि मुद्दा उठाया, हल्ला किया, बहिष्कार किया। बस, उनको लगता है कि उनका काम हो गया। राष्ट्रीय विधायी सूचकांक जिस तरह से सरकार की समीक्षा करेगा, उसी तरह से विपक्षी विधायकों की कार्यप्रणाली व परिणाम की भी समीक्षा करेगा। शोरगुल से क्या समस्याओं का समाधान हुआ? इसका कोई भी डाटा अभी हमारे पास नहीं है। राष्ट्रीय विधायी सूचकांक के जरिये यह संभव हो सकेगा।

एक सदन नहीं चलने से आर्थिक रूप से कितना नुकसान होता है और जनहित के कार्यों में कितनी देरी होती है?

देखिए, आर्थिक रूप से तो नुकसान इसलिए कहा जाएगा कि सदन की बैठक रखी गई है। बैठक हो या नहीं हो, सारी व्यवस्थाएं करनी पड़ती है। तन्ख्वाह, भत्ता, सदन का खर्च, स्टाफ की व्यवस्थाएं आदि सभी शामिल हैं। बैठक हो या नहीं हो, यह खर्च तय है। ऐसे में यदि सदन की बैठक से जनहित से जुड़ी कोई पहल या सुधार नहीं हो पाए, तो इसे नुकसान ही माना जाएगा।

यदि राष्ट्रीय विधायी सूचकांक लागू होने के बाद भी जनप्रतिनिधियों द्वारा इसका पालन नहीं किया गया तो क्या किसी सजा या जुर्माने का प्रविधान रहेगा?

पेनल्टी या जुर्माना तो अध्यक्ष आज भी तय कर सकते हैं। सजा भी दे सकते हैं। मार्शल आउट का अधिकार आज भी विधानसभा अध्यक्ष को है, लेकिन इन सभी कार्रवाइयों के जरिये व्यवस्था में सुधार का कोई प्रविधान नहीं है। मेरा मानना है छोटे-मोटे विरोध को शांत करने के लिए यह प्रविधान ठीक है, लेकिन जब योजनाबद्ध तरीके से व्यवधान का तरीका ढूंढ निकाला गया हो, तो राष्ट्रीय विधायी सूचकांक ही एक मात्र तरीका है इस व्यवस्था को पटरी पर लाने का।

क्या एनएलआई के जरिये तैयार रिपोर्ट कार्ड को जनता के सामने रखा जाएगा?

बिल्कुल। मैं तो कहता हूं कि जो विधानसभाएं अच्छा करेंगी, वह अपने आप ही अपना रिपोर्ट कार्ड बनाएगी। जो अच्छा नहीं करेंगे या नहीं कर पाएंगे, वह जरूर जनता से इसे छिपाएंगे। रिपोर्ट कार्ड अलग से बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, यह आटोमैटिकली ही बनने लगेगा।

इसे लागू होने में कितना समय लग सकता है और किस तरह के परिणाम की अपेक्षा है?

मेरा मानना है कि एक शुरुआत हो गई है। जब किसी चीज की शुरुआत हो जाती है, तो परिणाम भी जल्दी आने लगते हैं। मेरा पूरा विश्वास है कि बहुत जल्द इसके परिणाम आएंगे। मैं लोकसभा के स्पीकर ओम बिरला का भी आभारी हूं, उन्होंने इस बात पर तुरंत निर्णय लिया है। राष्ट्रीय विधायी सूचकांक में कोई खामी न रहे और सभी स्टेक होल्डर्स (पक्ष-विपक्ष) शामिल हों और जो चार्ट बने, वह पुख्ता हो। इसमें इन बातों की कोई गुंजाइश नहीं हो कि मुझे कम आंका गया और उसे ज्यादा। सबकुछ डाटा पर आधारित होना चाहिए, यानी गणित... एक और एक दो ही होगा, ग्यारह नहीं। इसे इतना पुख्ता बनाने की तैयारी है कि यदि कोई मानकों को सामने रखकर खुद का 'सेल्फ असेसमेंट' करे तो वह खुद ही अपना ठीक-ठीक आकलन कर सके।

क्या इसे लागू करने के लिए कानून लाने की जरूरत है? यानी, यदि एनएलआई का पालन करने से इन्कार कर दे तो?

यदि इसे लागू करने के लिए कानून की आवश्यकता पड़ी तो वह भी बनाया जाना चाहिए। संविधान में भी अगर कोई बदलाव की आवश्यकता लगती है, तो वह भी होना चाहिए। हालांकि मेरा मानना है कि इसकी जरूरत नहीं होगी।

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शोरगुल, धरना-प्रदर्शन और बहिष्कार से होने वाले जनता के पैसे के दुरुपयोग को भी क्या इससे रोका जा सकेगा?

सदन राजनीतिक मंच नहीं है। राजनीति करने के लिए और बहुत तरीके हैं। सत्तारूढ़ दल सदन के प्रति जवाबदेह है। उस पर लगाम लगाने के लिए बहुत से नियम-कायदे हैं, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती यह है कि विपक्ष की जवाबदेही कैसे तय की जाए। वर्तमान में विपक्ष को लगता है कि मुद्दा उठाया, हल्ला किया, बहिष्कार किया। बस, उनका काम हो गया। शोरगुल से क्या समस्याओं का समाधान हुआ? इसका कोई भी डाटा अभी हमारे पास नहीं है। राष्ट्रीय विधायी सूचकांक के जरिये यह संभव हो सकेगा।

इस पूरी प्रक्रिया से जनता को कैसे अवगत कराएंगे? क्या उन्हें भी जागरूक करने की कोई योजना है, ताकि चुनाव के दौरान वह जवाबदेही पूरी कर सकने वाले जनप्रतिनिधियों को ही चुनकर सदन में भेजें?

यह खुद ब खुद होगा। व्यवस्था बनेगी और जनता के पास अपने विधायक या राजनीतिक दलों के आकलन का एक साइंटिफिक और डाटा बेस आधारित प्लेटफार्म होगा, तो जागरूकता अपने आप ही आ जाएगी। मेरा आकलन है कि आने वाले समय में यह चुनावी मुद्दा बनेगा...और बनना चाहिए। लोकतंत्र सिर्फ किताबी जमा-खर्च नहीं, भाषण-नारेबाजी नहीं है। यहां हर जनप्रतिनिधि, पक्ष-विपक्ष और हर सदन को एक-एक काम का हिसाब देना होगा। लोकतंत्र को परिभाषित करने वाला वह चर्चित कोट-'ऑफ द पीपल, बाय द पीपल, फाॅर द पीपल' में ऑफ द पीपल और बाय द पीपल तो हम हैं। हमारी वर्तमान व्यवस्थाएं हैं, लेकिन फाॅर द पीपल को मजबूत करने के लिए एनएलआई की जरूरत है।

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