नई दिल्ली (जेएनएन)। परमार्थ के कार्यों से 20वीं सदी में मानवीय जगत और ईसाई समुदाय में काफी ऊंचा मुकाम हासिल करने वाली मदर टेरेसा को वेटिकन सिटी में आज संत की उपाधि प्रदान की गई। सेंट पीटर्स स्क्वायर में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में पोप फ्रांसिस ने टेरेसा को संत की उपाधि दी।

आज इस अहम मौके पर करीब एक लाख लोग वेटिकन सिटी में मौजूद रहे। पश्चिम बंगाल समेत पूरे भारत में लाखों लोग टीवी के जरिये इस ऐतिहासिक पल के गवाह बने। इस खास कार्यक्रम में भारतीय प्रतिनिधिमंडल भी मौजूद था।

मदर टेरेसा की कर्मभूमि कोलकाता में इस अवसर को उत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। मदर हाउस को सजाया गया है। जगह-जगह मदर के बड़े-बड़े पोस्टर लगाए गए हैं। वहीं, गोवा के पणजी में चर्च में विशेष प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

मदर टेरेसा को मिली संत की उपाधि

इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ शुक्रवार को ही इटली की राजधानी रोम पहुंच चुकी हैं। इसमें दिल्ली से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में तथा पं. बंगाल से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में राज्य स्तरीय दल भी इस कार्यक्रम में शरीक होंगे।

नोबेल पुरस्कार विजेता दिवंगत मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरी ऑफ चेरिटी की ननों के मुताबिक मदर की लोकप्रियता के कारण रोम में होने वाले इस समारोह का दुनियाभर में विशेष महत्व होगा। मिशनरी ऑफ चेरिटी की सुपीरियर जनरल सिस्टर मेरी प्रेमा के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों से आई 40 से 50 ननों का समूह भी इस समारोह में मौजूद था।

मदर टेरेसा के बारे में जाने कुछ खास बातें

नोबेल व भारत रत्न समेत कई सम्मान मिले

मदर टेरेसा को 1971 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' प्रदान किया गया था। 1988 में ब्रिटेन ने 'आर्डर ऑफ द ब्रिटिश एम्पायर' की उपाधि प्रदान की। कोलकाता से शुरू हुए मिशनरीज ऑफ चैरिटी का लगातार विस्तार होता रहा और मदर टेरेसा के निधन के समय तक इसका प्रसार 610 मिशन के तहत 123 देशों में हो चुका था। दुनियाभर में तीन हजार से ज्यादा नन इससे जुड़ी हुई हैं।

मदर टेरेसा ने कई आश्रम, गरीबों के लिए रसोई, स्कूल, कुष्ठ रोगियों की बस्तियां और अनाथ बच्चों के लिए घर बनवाए। 5 सितंबर, 1997 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। निधन के पश्चात पॉप जॉन पॉल द्वितीय ने उन्हें 'धन्य' घोषित किया था।

दो बाल्कन देश भी हुए खुशी में शरीक


पोप फ्रांसिस जब रविवार को मदर टेरेसा को संत की पदवी प्रदान करेंगे तो दो बाल्कन देश अल्बानिया और मेसेडोनिया भी इस खुशी में शरीक हुए। ये दोनों मदर टेरेसा को अपने देश का बताते हैं। 1950 में मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना करने वाली मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को मेसेडोनिया गणराज्य (तत्कालीन उस्कुब, ओटोमन साम्राज्य) की राजधानी स्कोप्जे में हुआ था। उनका असली नाम अग्नेसे गोंकशे बोजशियु था। उनकी मां अल्बानियाई थीं और उनका परिवार कोसोवो से आया था। उनके पिता के मूल स्थान को लेकर भी विवाद है।

ज्यादातर लोगों (खास तौर पर अल्बानिया में) का कहना है कि वह भी अल्बानियाई थे। लेकिन मेसेडोनिया के लोगों का कहना है कि वह एक अन्य बाल्कन जातीय समूह 'व्लाच' थे। दोनों बाल्कन देशों में मदर टेरेसा को लेकर किस कदर प्रतिस्पर्धा है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि दोनों ही देशों में मदर टेरेसा की मूर्तियां लगी हैं। सड़कों, अस्पतालों और अन्य स्मारकों के नाम भी उनके नाम पर रखे गए हैं।

ओबामा की सहयोगी ने भी की शिरकत

आतंकवाद निरोधक और होमलैंड सुरक्षा में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की सहयोगी लिसा मोनाको की अगुवाई में पांच सदस्यों का एक अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भी वेटिकन में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होगा।

जानें संत घोषित करने की पूरी प्रक्रिया

संत घोषित करने की प्रक्रिया की शुरुआत उस स्थान से होती है जहां वह रहे या जहां उनका निधन होता है। मदर टेरेसा के मामले में यह जगह है कोलकाता। प्रॉस्ट्यूलेटर प्रमाण और दस्तावेज जुटाते हैं और संत के दर्जे की सिफारिश करते हुए वेटिकन कांग्रेगेशन तक पहुंचाते हैं। कांग्रेगेशन के विशेषज्ञों के सहमत होने पर इस मामले को पोप तक पहुंचाया जाता है. वे ही उम्मीदवार के ‘नायक जैसे गुणों' के आधार पर फैसला लेते हैं।

अगर प्रॉस्ट्यूलेटर को लगता है कि उम्मीदवार की प्रार्थना पर कोई रोगी ठीक हुआ है और उसके भले चंगे होने के पीछे कोई चिकित्सीय कारण नहीं मिलता है तो यह मामला कांग्रेगेशन के पास संभावित चमत्कार के तौर पर पहुंचाया जाता है जिसे धन्य माने जाने की जरुरत होती है। संत घोषित किए जाने की प्रक्रिया का यह पहला पड़ाव है।

चिकित्सकों के पैनल, धर्मशास्त्रीयों, बिशप और चर्च के प्रमुख (कार्डिनल) को यह प्रमाणित करना होता है कि रोग का निदान अचानक, पूरी तरह से और दीर्घकालिक हुआ है और संत दर्जे के उम्मीदवार की प्रार्थना के कारण हुआ है। इससे सहमत होने पर कांग्रेगशन इस मामले को पोप तक पहुंचाता है और वे फैसला लेते हैं कि उम्मीदवार को संत घोषित किया जाना चाहिए, लेकिन संत घोषित किए जाने के लिए दूसरा चमत्कार भी चाहिए।

Posted By: JP Yadav

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