CJP के फ्लॉप शो से JNU की छात्र राजनीति में हलचल, जनवरी में चुनाव से पहले वामपंथ के सामने छात्र जुटाने की चुनौती
काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की विफलता ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दिया ...और पढ़ें

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव से पहले वाम दलों के सामने छात्र समर्थन बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो सकती है।
HighLights
सीजेपी प्रदर्शन की विफलता से वामपंथी छात्र संगठनों को झटका।
जनवरी जेएनयू छात्रसंघ चुनाव से पहले वामपंथ के लिए चुनौती।
एबीवीपी छात्र मुद्दों पर सक्रिय, वामपंथी संतुलन बनाने में जुटे।
लोकेश शर्मा, नई दिल्ली। दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के प्रदर्शन की विफलता ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की छात्र राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है।
प्रदर्शन को वामपंथी छात्र संगठनों का समर्थन मिलने के बावजूद अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा। ऐसे में जनवरी में होने वाले जेएनयू छात्रसंघ चुनाव से पहले वाम दलों के सामने छात्र समर्थन बनाए रखने की चुनौती खड़ी हो सकती है।
छात्र समर्थन जुटाने की क्षमता पर सवाल
सीजेपी के प्रदर्शन को आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष और वामपंथी नेता नेहा बोरा का समर्थन मिला। वह प्रेस वार्ता में भी सक्रिय दिखीं और प्रदर्शन स्थल पर पहुंचने के दौरान दो बार पुलिस हिरासत में ली गईं। इसके बावजूद प्रदर्शन व्यापक छात्र लामबंदी में तब्दील नहीं हो सका।
हालांकि, प्रदर्शन में आइसा, एसएफआइ और अन्य वामपंथी संगठनों के कार्यकर्ता मौजूद रहे। जेएनयू छात्रसंघ के संयुक्त सचिव दानिश अली समेत वामपंथी छात्र भी इसमें शामिल हुए। ऐसे में इसे वाम राजनीति की पूरी तरह कमजोर होती व छात्र समर्थन जुटाने की क्षमता पर सवाल उठे हैं।
छात्रहित के मुद्दों पर मुकाबला
पिछले वर्ष जेएनयू छात्रसंघ की चारों प्रमुख सीटों पर वाम समर्थित गठबंधन ने जीत दर्ज की थी, जबकि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) कोई प्रमुख पद नहीं जीत सकी थी। इस बार तस्वीर बदलने की संभावना के पीछे छात्रहित से जुड़े मुद्दों पर संगठनों की सक्रियता अहम हो सकती है।
एबीवीपी ने खेल प्रतियोगिताओं, परिसर में सुरक्षा और छात्र समस्याओं को लेकर अपनी गतिविधियां तेज की हैं। सत्य निकेतन में छात्रावास की इमारत ढहने के बाद छात्रों की सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया।
दूसरी ओर, वामपंथी संगठनों के सामने अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और छात्रहित के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। उमर खालिद की किताब और फिल्म से जुड़े मुद्दों पर समर्थन को लेकर राजनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं। एबीवीपी समर्थकों ने यूएपीए के तहत जेल में बंद उमर खालिद के समर्थन में हो रही इस चर्चा का कड़ा विरोध और नारेबाजी की थी।
जेएनयू अध्यक्ष का निष्कासन भी एक वजह
छात्रसंघ अध्यक्ष अदिति मिश्रा का निष्कासन भी चुनावी विमर्श को प्रभावित कर सकता है। जेएनयू प्रशासन ने दो फरवरी 2026 को पुस्तकालय में बायोमेट्रिक व्यवस्था के विरोध के दौरान हुई तोड़फोड़ के मामले में अदिति समेत पांच छात्रों को दो सेमेस्टर के लिए निष्कासित कर परिसर में प्रवेश पर रोक लगाई थी।
अक्टूबर 2026 में अदिति को सुरक्षाकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार और विश्वविद्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के मामले में एक प्राक्टोरियल (अनुशासन) नोटिस जारी किया है। वहीं अदिति निष्कासन वापस लेने की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं। ऐसे में उनके आंदोलन और चुनावी गतिविधियों पर असर पड़ने की संभावना है।
