मोबाइल के दौर में भी मजबूत भारतीय पुस्तक बाजार, ई-बुक और ऑडियोबुक का बढ़ा क्रेज, AI से मिलेगा नया विस्तार
भारतीय पुस्तक बाजार मोबाइल और इंटरनेट के दौर में भी मजबूत बना हुआ है, जहां छपी किताबों के साथ ई-बुक ...और पढ़ें
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मोबाइल के दौर में भी किताबों की चमक बरकरार। AI जनरेटेड
HighLights
भारतीय पुस्तक बाजार 95,816 करोड़, डिजिटल 7,048 करोड़।
प्रिंट और डिजिटल माध्यमों का साथ-साथ विकास, नए पाठक।
AI से प्रकाशन में तेजी, कॉपीराइट सुरक्षा महत्वपूर्ण चुनौती।
संजीव गुप्ता, नई दिल्ली। मोबाइल और इंटरनेट के दौर में किताबों की दुनिया जरूर बदल रही है, लेकिन किताबों की जरूरत और बाजार दोनों कायम हैं। अब पाठक छपी किताबों के साथ ई-बुक और ऑडियोबुक जैसे विकल्प भी अपना रहे हैं।
इंडिया बुक मार्केट रिपोर्ट 2026-2030 के अनुसार, 2024-25 में देश में छपी किताबों का बाजार करीब 95,816 करोड़ रुपये रहा, जबकि डिजिटल प्रकाशन का बाजार करीब 7,048 करोड़ रुपये तक पहुंच गया।
यह रिपोर्ट फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स (FIP) के लिए NielsenIQ BookData ने तैयार की है। रिपोर्ट में 2030 तक भारतीय प्रकाशन उद्योग में होने वाले बदलावों को समझने के लिए प्रिंट और डिजिटल किताबों के साथ शिक्षा, शोध, भारतीय भाषाओं, तकनीक, एआई और कॉपीराइट जैसे पहलुओं का भी अध्ययन किया गया है।
पढ़ाई अब भी किताबों की सबसे बड़ी वजह
देश में किताबों की मांग की सबसे बड़ी वजह अब भी स्कूल-कॉलेज की पढ़ाई है। इसके अलावा बच्चों की किताबों, पेशेवर शिक्षा, भारतीय भाषाओं, शोध और नई चीजें सीखने वाली सामग्री की मांग भी बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रिंट और डिजिटल को एक-दूसरे का विकल्प मानने के बजाय दोनों को साथ लेकर चलने वाला बाजार तेजी से विकसित हो रहा है।
एक किताब, कई तरीके से पढ़ सकेंगे
आने वाले समय में एक ही किताब छपी प्रति, ई-बुक, ऑडियोबुक और दूसरी भाषाओं में अनुवाद के रूप में पाठकों तक पहुंच सकती है। इससे खासकर भारत जैसे बहुभाषी देश में किताबों की पहुंच बढ़ाने के नए रास्ते खुलेंगे।
एआई से बदलेगा किताब बनाने का तरीका
किताबों की दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का इस्तेमाल भी बढ़ेगा। इससे सामग्री तैयार करने और पाठकों तक पहुंचाने का काम तेज हो सकता है। हालांकि रिपोर्ट के मुताबिक एआई के दौर में सही जानकारी, लेखकों के अधिकार, गोपनीयता और कॉपीराइट की सुरक्षा बेहद जरूरी होगी।
‘आंकड़ों के बिना तस्वीर अधूरी’
फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स के उपाध्यक्ष प्रणव गुप्ता के मुताबिक भारतीय प्रकाशन उद्योग बहुत विविध है और इसे समझने के लिए अनुमान के बजाय विश्वसनीय आंकड़ों की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट उद्योग के लिए सिर्फ बाजार का अध्ययन नहीं, बल्कि शिक्षा, ज्ञान और रचनात्मक अर्थव्यवस्था से जुड़े क्षेत्र को बेहतर ढंग से समझने का आधार है। उनके मुताबिक विश्वसनीय आंकड़ों से प्रकाशक बेहतर फैसले ले सकते हैं और नीति बनाने वालों को भी उद्योग की वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिल सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत में बड़ी संख्या में विद्यार्थी और पाठक, कई भाषाओं में सामग्री और मजबूत प्रकाशन तंत्र मौजूद है। यही वजह है कि आने वाले वर्षों में भारत केवल किताबों का बड़ा बाजार ही नहीं, बल्कि दुनिया के महत्वपूर्ण ज्ञान और प्रकाशन केंद्रों में शामिल होने की क्षमता रखता है।
