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जलवायु महासंकट पर संसद क्यों मौन? 10 सालों में पूछे गए केवल 3.3% सवाल

Published: Fri, 09 Oct 2026 03:25 PM (IST)

दुनिया में जलवायु की समस्या बढञ रही है, लेकिन संसद में इससे जुड़े सवाल बेहद कम पूछे जाते हैं। 2015-2025 ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर, एआई जेनरेटेड

प्रतीकात्मक तस्वीर, एआई जेनरेटेड

HighLights

  1. 2015-2025 में केवल 3.3% संसदीय सवाल जलवायु संबंधी थे।

  2. रिपोर्ट 'क्लाइमेट ऑन द फ्लोर' ने संसदीय निगरानी की कमी बताई।

  3. स्वच्छ ऊर्जा पर अधिक चर्चा, जलवायु वित्त पर बेहद कम सवाल।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। देश में बढ़ती गर्मी, बाढ़, सूखा, अनियमित वर्षा व चरम मौसम की घटनाएं जनजीवन और अर्थव्यवस्था को निरंतर प्रभावित कर रही हैं, लेकिन संसद में सवाल- जवाब की तस्वीर इसकी गंभीरता के अनुपात में नहीं है।

एक नए विश्लेषण के मुताबिक, 2015 से 2025 के बीच संसद में पूछे गए 2.4 लाख से अधिक सवालों में केवल 8,702 यानी तकरीबन 3.3 प्रतिशत सवाल ही जलवायु और पर्यावरण से संबंधित थे।

रिपोर्ट में हुआ खुलासा

पिछले सप्ताह जारी सेंटर फॉर फाइनेंशियल अकाउंटेबिलिटी की रिपोर्ट ‘क्लाईमेट ऑन द फ्लोर’ में लोकसभा और राज्यसभा में दिसंबर 2015 से दिसंबर 2025 तक पूछे गए 8,702 जलवायु-संबंधी सवालों का विश्लेषण किया गया है।

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि जलवायु संकट पर संसदीय निगरानी अभी भी सीमित और असमान है, जबकि भारत की जलवायु संवेदनशीलता लगातार बढ़ रही है।

इन मुद्दों पर सबसे ज्यादा चर्चा

विश्लेषण के अनुसार जलवायु से जुड़े सवालों में 37.7 प्रतिशत स्वच्छ ऊर्जा और कार्बन उत्सर्जन घटाने अथवा समाप्त करने से संबंधित थे। इसके विपरीत जलवायु वित्त से जुड़े सवालों की हिस्सेदारी महज 0.3 प्रतिशत रही।

इससे संकेत मिलता है कि संसद में ऊर्जा संक्रमण और उत्सर्जन घटाने जैसे मुद्दों पर अपेक्षाकृत अधिक चर्चा हुई, लेकिन जलवायु कार्रवाई के लिए धन, निवेश और वित्तीय जरूरतों पर चर्चा बेहद सीमित रही।

सरकारी घोषणाओं तक सीमित है चर्चा?

भारत ने पिछले एक दशक में जलवायु कार्रवाई को लेकर कई महत्वाकांक्षी लक्ष्य और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं सामने रखी हैं। ऐसे में संसद की भूमिका केवल सरकार की घोषणाओं पर चर्चा तक सीमित नहीं रह सकती।

उत्सर्जन में कमी, अनुकूलन, जलवायु वित्त, जंगल, कृषि, पानी, शहरों की गर्मी और चरम मौसम से होने वाले नुकसान पर नियमित संसदीय निगरानी जरूरी है।

जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है कई समस्याएं

रिपोर्ट उन सांसदों की सराहना करती है जो यह मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि यह किसानों की परेशानी, सार्वजनिक स्वास्थ्य और ऊर्जा सुरक्षा जैसी विकासात्मक और सामाजिक-आर्थिक चिंताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है।

विशेषज्ञों के अनुसार संसद में सवाल केवल आंकड़ा नहीं होते, बल्कि वे सरकार से जवाबदेही तय करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इसलिए 3.3 प्रतिशत की हिस्सेदारी यह सवाल जरूर खड़ा करती है कि बढ़ते जलवायु जोखिम के बीच संसद की प्राथमिकताओं में जलवायु संकट को वह स्थान मिला है या नहीं, जिसकी जरूरत अब पहले से कहीं अधिक है।

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