2003 में गुजरात ने बदली विकास की दिशा, निवेश के साथ प्रशासनिक सुधारों को भी बनाया आधार
गुजरात ने 2003 में भूकंप और 2002 की चुनौतियों से उबरकर विकास को स्थायी गति देने के लिए निवेश, प्रशासनिक ...और पढ़ें

प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस।
HighLights
पहली वाइब्रेंट गुजरात समिट 2003 में अहमदाबाद में आयोजित हुई।
नागरिकों की शिकायतों के लिए स्वागतम व्यवस्था अप्रैल 2003 में लागू हुई।
आपदा प्रबंधन अधिनियम 2003 में बना, प्राधिकरण 1 सितंबर को आया।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। 2003 आते आते गुजरात अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक यात्रा के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका था। भूकंप के बाद पुनर्निर्माण और 2002 की उथल पुथल से जुड़ी तत्काल चुनौतियां अब धीरे धीरे पीछे छूट रही थीं।
सामने एक बड़ा सवाल था कि राज्य के विकास को स्थायी गति किस तरह दी जाए। इसी दौर में निवेश, प्रशासनिक तत्परता और उद्योग तथा नागरिकों के साथ सीधे संवाद को विकास की नई रणनीति के केंद्र में लाने की कोशिश शुरू हुई।
निवेश सम्मेलन से प्रशासनिक रूपांतरण तक
28 सितंबर 2003 को अहमदाबाद में पहली वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट आयोजित हुई। बाद के वर्षों में यह आयोजन जिस बड़े वैश्विक निवेश मंच के रूप में सामने आया, उसकी तुलना में यह पहला सम्मेलन काफी छोटा था।
फिर भी इसका महत्व कम नहीं था। गुजरात पहली बार इतनी स्पष्टता के साथ देश और दुनिया के निवेशकों के सामने स्वयं को एक निवेश गंतव्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। सरकार और उद्योग के बीच सीधे संवाद के लिए एक मंच तैयार किया जा रहा था।
मेरी दृष्टि में ऐसे आयोजन का वास्तविक महत्व उसके मंच और घोषणाओं से आगे होता है। निवेश सम्मेलन में प्रस्ताव और घोषणाएं हो सकती हैं, लेकिन उनसे अपने आप कारखाने, बंदरगाह या रोजगार नहीं बनते।
उनके लिए जमीन, बिजली, पानी, सड़क, पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियां और कई विभागों के बीच समन्वय जरूरी होता है। निवेशक के लिए सरकार की वास्तविक पहचान किसी सम्मेलन में दिए गए भाषण से नहीं, बल्कि उसके बाद शुरू होने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया से होती है।
गुजरात में इसी अंतर को समझने की कोशिश शुरू हुई। निवेश सुविधा धीरे धीरे केवल औद्योगिक नीति का विषय न रहकर प्रशासन की जिम्मेदारी बनने लगी।
अलग अलग विभागों के बीच बेहतर समन्वय, प्रस्तावों पर निर्णय लेने की गति और प्रक्रियाओं में स्पष्टता को महत्व दिया जाने लगा। प्रशासन के लिए किसी परियोजना में देरी केवल एक विभागीय समस्या नहीं थी। उसका सीधा असर निवेश और रोजगार पर पड़ सकता था।
इस अर्थ में वाइब्रेंट गुजरात केवल एक निवेश सम्मेलन नहीं था। यह इस बात का शुरुआती संकेत था कि राज्य पूंजी के लिए किस तरह स्वयं को तैयार करना चाहता है। गुजरात निवेश आकर्षित करने के लिए केवल प्रोत्साहनों पर निर्भर नहीं रहना चाहता था। प्रशासनिक भरोसा और परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की क्षमता भी उसकी पहचान का हिस्सा बन रही थी।
इसी समय नागरिकों के साथ शासन के संबंधों में भी एक नया प्रयोग शुरू हुआ। अप्रैल 2003 में स्वागतम व्यवस्था लागू की गई। इसके माध्यम से नागरिकों की ऐसी शिकायतों को मुख्यमंत्री स्तर तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई गई, जिनका समाधान निचले स्तर पर नहीं हो पाया था।
प्रशासनिक जवाबदेही और समग्र विकास का मॉडल
वरिष्ठ अधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से इसमें शामिल होते थे और शिकायतों की नियमित समीक्षा की जाती थी। दिसंबर 2003 तक मुख्यमंत्री स्तर पर 469 शिकायतें पहुंची थीं, जिनमें से 443 का निस्तारण किया जा चुका था।
स्वागतम का महत्व केवल इन आंकड़ों में नहीं था। तकनीक का इस्तेमाल सरकारी अभिलेखों को डिजिटल बनाने के बजाय नागरिक और प्रशासन के बीच दूरी कम करने के लिए किया जा रहा था। किसी शिकायत को ऊपर तक ले जाने की संभावना और संबंधित अधिकारी से उसके समाधान के बारे में जवाब मांगने की व्यवस्था ने प्रशासनिक जवाबदेही की एक नई अपेक्षा पैदा की।
बिजली के क्षेत्र में भी इसी समय ऐसे बदलावों की नींव रखी जा रही थी, जिनका असर आगे के वर्षों में दिखाई दिया। कृषि और गैर कृषि उपयोग के लिए बिजली आपूर्ति को अलग करने की दिशा में काम शुरू हुआ, जिसने आगे चलकर ज्योतिग्राम योजना का रूप लिया।
इसका उद्देश्य केवल बिजली की आपूर्ति सुधारना नहीं था। ग्रामीण घरों, सिंचाई, छोटे कारोबार, शिक्षा और गांवों की आर्थिक गतिविधियों के लिए नियमित बिजली को विकास से जोड़कर देखा गया।
शिक्षा के क्षेत्र में शाला प्रवेशोत्सव और कन्या केलवणी जैसे अभियानों के जरिए सरकार और वरिष्ठ अधिकारी गांवों तक पहुंचने लगे। बच्चों के स्कूल में प्रवेश, विशेषकर बालिकाओं की शिक्षा को केवल शिक्षा विभाग का विषय न मानकर व्यापक प्रशासनिक जिम्मेदारी बनाने की कोशिश हुई।
अधिकारियों का गांवों और स्कूलों तक जाना इस बात का संकेत था कि सरकारी योजनाओं की सफलता को कागज पर दर्ज आंकड़ों के बजाय जमीन पर भी परखा जाना चाहिए।
भूकंप से मिले अनुभव को भी स्थायी संस्थागत क्षमता में बदलने का प्रयास हुआ। 2003 में गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन अधिनियम बनाया गया और 1 सितंबर को गुजरात राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण अस्तित्व में आया।
इसका जोर केवल आपदा के बाद राहत देने तक सीमित नहीं था। तैयारी, जोखिम कम करने, पुनर्वास और पुनर्निर्माण को भी प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया।
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर 2003-04 की प्रशासनिक दिशा स्पष्ट होती है। निवेश को विकास के केंद्र में लाने की कोशिश हो रही थी, लेकिन उसके साथ प्रशासन को अधिक जवाबदेह और परिणाम केंद्रित बनाने पर भी जोर था।
उद्योग के साथ संवाद बढ़ाया जा रहा था, नागरिकों को प्रशासन के शीर्ष स्तर तक पहुंचने का माध्यम दिया जा रहा था, ग्रामीण बिजली को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ा जा रहा था और शिक्षा को सीधे क्षेत्रीय प्रशासन से जोड़ा जा रहा था।
विकास केवल पूंजी आने से नहीं होता
बाद के वर्षों में गुजरात के विकास मॉडल पर व्यापक बहस हुई। उसकी आर्थिक उपलब्धियों और सामाजिक परिणामों को लेकर अलग अलग मत रहे हैं। लेकिन 2003-04 को उसके अपने संदर्भ में देखना जरूरी है।
यह वह वर्ष था जब निवेश गुजरात की विकास रणनीति का एक प्रमुख आधार बनने लगा और प्रशासनिक सुधार उस रणनीति का अभिन्न हिस्सा बनने लगे।
विकास केवल पूंजी आने से नहीं होता। उसके लिए राज्य की प्रशासनिक क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। निवेश को जमीन तक पहुंचाने, परियोजनाओं को गति देने और नीतियों को परिणाम में बदलने की क्षमता ही किसी राज्य को आगे ले जाती है।
2003 में गुजरात ने इसी संबंध को अधिक स्पष्ट रूप से स्थापित करना शुरू किया। आने वाले वर्षों में राज्य की आर्थिक पहचान पर इसका प्रभाव दिखाई दिया।
- प्रेम शंकर झा, आईआरएसएस।
(बहुचर्चित पुस्तक माडिफाइड गवर्नेंस के लेखक)
