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दिल्ली में सजा अरुणाचल का सुदूर 'डेके' गांव, कला प्रदर्शनी 'नगोक डोलू' में दिखा बचपन का कैनवास

Published: Sat, 19 Sep 2026 07:41 PM (IST)

दिल्ली में लगी 'नगोक डोलू' (मेरा गांव) प्रदर्शनी अरुणाचल प्रदेश के कलाकार जेनजुम गादी के बचपन की यादों और ग्रामीण जीवन को पीतल की कलाकृतियों के माध्यम से दर्शाती है।

लोधी रोड स्थित गैलरी वायु में ब्रास से बनी बैंगन के पौधे का स्कल्पचर को दिखाते कलाकार जेनजुम गादी। जागरण

लोधी रोड स्थित गैलरी वायु में ब्रास से बनी बैंगन के पौधे का स्कल्पचर को दिखाते कलाकार जेनजुम गादी। जागरण

HighLights

  1. जेनजुम गादी की 'नगोक डोलू' प्रदर्शनी दिल्ली में।

  2. अरुणाचल के ग्रामीण जीवन, बचपन की यादें पीतल में।

  3. दादी की कहानियों, बैकयार्ड गार्डन से प्रेरित कलाकृतियाँ।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। कहीं ब्रास में ढला बैंगन का पौधा नजर आता है, तो कहीं फैली हुई लताओं के साथ कद्दू की बेल। एक तरफ केले का बड़ा सा पेड़ ध्यान खींचता है, तो दूसरी ओर फलों-सब्जियों से भरी टोकरी और प्रकृति से जुड़े कई आकार ग्रामीण जीवन की कहानियां सुनाते दिखाई देते हैं।

पहली नजर में ये कलाकृतियां महज खेती बाड़ी से जुड़ी वस्तुएं लगती हैं, लेकिन थोड़ा ठहरकर देखने पर इनके पीछे एक पूरा गांव दिखाई देने लगता है। दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच इन दिनों लगी प्रदर्शनी 'नगोक डोलू' (मेरा गांव') में अरुणाचल प्रदेश के एक छोटे से गांव की शांत दुनिया सजी है।

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दरअसल इन कलाकृतियों के पीछे दिल्ली में रहने वाले कलाकार व फैशन डिजायनर जेनजुम गादी के बचपन की यादें सजी हैं। अरुणाचल प्रदेश के एक सुदूर गांव 'डेके' में पले-बढ़े जेनजुम के लिए ग्रामीण दुनिया केवल एक जगह नहीं है, बल्कि उनके जीवन का अहम हिस्सा है।

घर के आसपास होती खेती, खेतों में काम करते लोग, बांस और लकड़ी से बने घर, फूस की छतें, जंगल, नदी और मौसम के बदलते रंग उनके बचपन की दुनिया का हिस्सा रहे। यही दुनिया वह ब्रास में सजाकर दर्शकों के सामने लेकर आए हैं।

दादी की कहानियों से सजी कल्पना की दुनिया 

प्रदर्शनी में एक वाल हैंगिंग खास तौर पर ध्यान खींचती है। इसमें कलाकार ने अपनी दादी से सुनी कहानियों और बचपन की कल्पनाओं को आकार दिया है। जेनजुम बताते हैं कि उनकी दादी उन्हें हाथी-घोड़े, सूरज-चांद, गुड़िया और परियों की कहानियां सुनाया करती थीं।

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इस खास कलाकृति में उड़ते पशु-पक्षी, सूरज और चांद जैसे आकार दादी से सुनीं कहानियों के उसी कल्पनालोक को सामने लाते हैं।

बैकयार्ड गार्डन में बसी बचपन की यादें

प्रदर्शनी में ‘बैकयार्ड गार्डन’ भी कलाकार की निजी स्मृतियों से जुड़ी महत्वपूर्ण कृति है। इसमें घर के पीछे मौजूद उस बगीचे को याद किया गया है, जो उनके लिए सिर्फ पेड़-पौधों और खेती की जगह नहीं था। वह बचपन के खेल और शरारतों का भी हिस्सा था।

कलाकार बताते हैं कि उनके गांव में पहले फल और सब्जियां खरीदने के लिए बाजार जाने की जरूरत बहुत कम पड़ती थी। घर और खेत के आसपास ही जरूरत की चीजें उगाई जाती थीं। ऐसे में घर के पीछे का बगीचा परिवार के जीवन का अहम हिस्सा था।

'बचपन में आज की तरह मनोरंजन के साधन नहीं थे, हम लोग प्रकृति के बेहद करीब थे। पढ़ाई की वजह से 10वीं कक्षा के बाद वे दिल्ली आ गया लेकिन गांव और वहां का रहन-सहन दिल में बसता है। यह प्रदर्शनी अपने गांव में लौटने जैसी है।'