डीयू कौथिग में सिमट आया 'पहाड़', गूंजा हुड़का और हरुल; पहाड़ी लोकगीतों की थाप पर झूम उठे छात्र
दिल्ली विश्वविद्यालय में 'देवभूमि फैमिली' द्वारा आयोजित डीयू कौथिग फ्रेशर्स एवं सांस्कृतिक समारोह में उत्तराखंड की लोक संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिला।

दिल्ली विश्वविद्यालय के शंकरलाल सभागार में आयोजित कार्यक्रम डीयू कौथिग में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते उत्तराखंड के छात्र। चंद्र प्रकाश मिश्र
HighLights
डीयू कौथिग में उत्तराखंड की लोक संस्कृति का प्रदर्शन
पहाड़ी लोकगीतों और नृत्यों ने छात्रों को मंत्रमुग्ध किया
दिल्ली विश्वविद्यालय में सांस्कृतिक विविधता का जीवंत उदाहरण
शशि ठाकुर, नई दिल्ली। दिल्ली की पहचान उसकी रफ्तार है...मेट्रो की आती-जाती ट्रेनें, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां और कालेज की तरफ भागते छात्र। लेकिन बुधवार, 16 सितंबर को नार्थ कैंपस की यह तेजी कुछ अलग मूड़ मिजाज में थी।
छात्रसंघ चुनावी शोर के बीच भी पहाड़ का हुड़का गूंज रहा था और किताबों के पन्नों के बीच हरुल की थाप सुनाई दे रही थी। शंकर लाल आडिटोरियम में बैठे छात्रों ने जब पहाड़ी लोकगीत की धुन पकड़ी तो सीटें जैसे कम पड़ गईं।
मौका देवभूमि फैमिली की ओर से आयोजित डीयू कौथिग फ्रेशर्स एवं सांस्कृतिक समारोह का था, जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय के अलग-अलग रंग देखने को मिले :
पहाड़ी धुनों ने दिल्ली की रफ्तार को थामा
पढ़ाई के लिए दिल्ली आने वाले विद्यार्थियों के लिए सबसे पहले जो चीज बदलती है, वह अक्सर जिंदगी की रफ्तार होती है। सुबह कालेज, दोपहर असाइनमेंट, शाम मेट्रो और रात तक पढ़ाई।
गांव में जहां शाम किसी लोकगीत या चौपाल की आवाज से पहचानी जाती थी, वहीं दिल्ली में शाम ट्रैफिक और हार्न के बीच गुजरती है। डीयू कौथिग में पहुंचे पहाड़ी विद्यार्थियों के लिए कुछ घंटों के लिए यही रफ्तार उलट गई।
मंच से हरुल की धुन उठी तो सभागार में बैठे विद्यार्थियों के चेहरे खिल गए। फिर नाटी, हुड़का नृत्य और झुमेलो ने माहौल को और रंगीन कर दिया। कलाकार मंच पर थिरक रहे थे और दर्शक दीर्घा में बैठे छात्र तालियों से उनका साथ दे रहे थे।
वहीं, जोरदार हूटिंग और तालियों के बीच आती एक बार और की आवाज गूंजती रही। सबसे दिलचस्प नजारा तब बना, जब कुछ अपनी सीटों से उठकर दोस्तों के साथ झूमने लगे। नृत्य कदमों की पूरी जानकारी भले नहीं, पर उत्साह में कोई कमी नहीं थी।
जिसे गीत आता था, वह गा रहा था और जिसे नहीं आता था, वह तालियों और ठुमकों से साथ दे रहा था। दिल्ली विश्वविद्यालय का सभागार पहाड़ों की संस्कृति से ओतप्रोत था।

एक धुन ने जोड़ दिए अनजान चेहरे
महोत्सव में शामिल प्रथम वर्ष की छात्रा प्रिया के लिए यह शाम इसलिए खास रही क्योंकि दिल्ली आने के बाद उसे पहली बार अपने जैसे कई युवा एक साथ मिले। शुरुआत में सबके चेहरे अनजान थे, लेकिन पहाड़ी गीत शुरू होते ही बातचीत का सिलसिला चल पड़ा।
किसी ने पूछा आप कहां से हैं और अगले ही पल गांव, तहसील और घर तक बात पहुंच गई। इसी तरह दूसरी छात्रा दृष्टि के लिए लोकगीत सुनना जैसे अचानक घर की खिड़की खुल जाने जैसा था।
दिल्ली आने के बाद पहली बार उसे लगा कि पढ़ाई और करियर की दौड़ के बीच वह अपनी पुरानी दुनिया को भी साथ लेकर चल सकती है। जब साथी विद्यार्थियों ने मिलकर पहाड़ी गीत गाया तो वह भी उनके साथ सुर मिलाने लगी।
यही इस आयोजन की खूबसूरती थी। यहां संस्कृति सिर्फ मंच पर नहीं, दर्शकों के बीच भी थी। उनकी बातचीत, उनके गीतों और ठहाकों में थी। जो नए बने दोस्तों के बीच गूंज रहे थे।

गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार एक माला में
उत्तराखंड की खूबसूरती सिर्फ पहाड़ों में नहीं, उसकी सांस्कृतिक विविधता में भी है। यहां गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार की लोक परंपराओं की झलक एक साथ देखने को मिली।
अलग-अलग अंचलों की अपनी बोली, गीत और नृत्य, लेकिन इस शाम सब मंच पर घुलेमिले थे। युवाओं ने पारंपरिक प्रस्तुतियों को अपनी ऊर्जा के साथ कुछ ऐसा पेश किया कि लोक संस्कृति पुराने दौर से निकलकर बिल्कुल आज की और अपनी लगी।
मंच पर पारंपरिक परिधान तो सामने आधुनिक दिल्ली के कपड़ों में बैठे युवा। दोनों के बीच की दूरी लोकधुन मिटा रहे थे। नरसिंह अवतार पर आधारित म्यूजिकल स्किट ने सांस्कृतिक शाम में आध्यात्मिक रंग भर दिया।
संगीत, अभिनय और मंचन के जरिये धार्मिक प्रसंग को प्रस्तुत किया गया। इस स्किट के जरिये उत्तराखंड की धार्मिक परंपरा और लोक संस्कृति के उस रिश्ते को सामने लाया गया, जिसमें आस्था केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि गीत, संगीत, नृत्य और सामुदायिक जीवन का हिस्सा बन जाती है।

दिल्ली ने फिर दिखाया अपना असली रंग
दिल्ली में हर ओर देश का कोई न कोई कोना दिखाई देता है। कहीं बिहार की बोली सुनाई देती है, कहीं उत्तर प्रदेश के गांव की चर्चा होती है तो कहीं उत्तराखंड का युवा अपने पहाड़ की यादों के साथ पढ़ाई में जुटा मिलता है।
दिल्ली विश्वविद्यालय इस विविधता का सबसे जीवंत उदाहरण है। ‘दू कोठाकी’ इसी दिल्ली की संस्कृति से जुड़ गया। उत्तराखंड के युवाओं ने अपनी लोक परंपराओं को मंच दिया और दूसरे प्रदेशों से आए विद्यार्थियों ने उसे अपनापन दिया।
इसीलिए यह सिर्फ फ्रेशर्स का स्वागत समारोह नहीं रहा। यह उस दिल्ली की तस्वीर बन उभरा, जहां अलग-अलग जगहों से अपनी पहचान लेकर लोग आते हैं और धीरे-धीरे एक साझा शहर की कहानी का हिस्सा बन जाते हैं।
यह भी पढ़ें- DUSU Election Result 2026 LIVE: 15 राउंड के बाद अध्यक्ष पद पर ABVP की वापसी, दीपांशु शौकीन का दबदबा बरकरार
