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'जागरण साहित्य सृजन सम्मान' से सम्मानित हुए डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र, दैनिक जागरण से बातचीत में साझा किए विचार

Published: Sun, 11 Oct 2026 07:20 AM (IST)

वरिष्ठ कवि डा. बुद्धिनाथ मिश्र को गीत विधा के लिए 'जागरण साहित्य सृजन सम्मान' प्रदान किया गया। उन्होंने हिंदी कविता ...और पढ़ें

हिंदी के वरिष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र को गीत विधा के लिए ‘जागरण साहित्य सृजन सम्मान’ प्रदान किया गया। जागरण

हिंदी के वरिष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र को गीत विधा के लिए ‘जागरण साहित्य सृजन सम्मान’ प्रदान किया गया। जागरण

HighLights

  1. डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र को गीत विधा के लिए जागरण सम्मान मिला।

  2. उन्होंने हिंदी कविता की उपेक्षा और छंद के महत्व पर बात की।

  3. युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़े रहने का संदेश दिया।

मुहम्मद रईस, नई दिल्ली। ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’ गीत के रचयिता और एक दर्जन से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित हिंदी के वरिष्ठ कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र को गीत विधा के लिए ‘जागरण साहित्य सृजन सम्मान’ प्रदान किया गया।

हिंदी और मैथिली के प्रबल राष्ट्रवादी कवि, कथाकार, निबंधकार और राजभाषा विशेषज्ञ डॉ. मिश्र 60 के दशक से शीर्ष साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय काव्यमंचों पर समान रूप से प्रतिष्ठित नाम हैं।

शनिवार को पुरस्कार प्राप्त करने के बाद राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने दैनिक जागरण संवाददाता मुहम्मद रईस से विविध विषयों पर बात की। प्रस्तुत है बातचीत के प्रमुख अंश।

साहित्य सृजन सम्मान को आप किस तरह लेते हैं?

इसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूं। चार अक्टूबर को मैंने अपने जीवन यात्रा के 80वें वर्ष में प्रवेश किया और लगता है यह पुरस्कार इसकी ही प्रतीक्षा कर रहा था। ये जो नवगीत संग्रह है कवि के मन से इसके लिए इंडिया नेट बुक के संपादक और मालिक रहे संंजीव कुमार ने प्रेरित किया। उनकी हार्दिक इच्छा थी के मैं कविताओं का संग्रह निकालूं। इस पुरस्कार के दैनिक जागरण परिवार का बहुत आभार।

सम्मान के लिए एक लंबी यात्रा को किस रूप में देखते हैं?

यह पुरस्कार मुझे नहीं मिला है, बल्कि पिछले 50 वर्ष से जो उपेक्षित गीत विद्या को मिला है। क्योंकि बाहरी विचारधारा के कारण हिंदी के प्रोफेसरों ने भारतीय गीत, कविता और पदों की जो परंपरा थी, उस परंपरा को भूल गए। उसे पढ़ाना बंद कर दिया। स्थिति अभी ये है कि पिछले 50 वर्षों में हिंदी कविता बहुत पिछड़ गई है।

उर्दू से तुलना करें तो समाज में उर्दू शायरी ज्यादा प्रचलित है। हिंदी कविता के जो गायक हैं, वे भी या तो गजल गाते हैं या भजन गाते हैं। जो साहित्यिक 40-50 साल में लिखे गए, उनका कहीं पता नहीं है। एक तरफ तो गजल की गायकी है तो दूसरी तरफ फिल्मी गाने हैं।

इनके बीच में जब तक बाहर के स्रोत न मिले, संबल न मिले, तब तक हम रचना करके भी भला क्या करेंगे। हम लिख तो सकते हैं, लेकिन लेखनी की उपयोगिता तभी है जब उसे संगीतकार और गायक प्रस्तुत करें। संगीत के माध्यम से यह समाज में ज्यादा पहुंचेगी।

दैनिक जागरण अपनी भाषा हिंदी को समृद्ध करने के लिए पिछले एक दशक से विभिन्न प्रकल्प चला रहा है, इसको आप किस तरह से देखते हैं?

1970 से 80 तक मैं आज अखबार में साहित्य संपादक था। तब से जागरण को देखता आ रहा हूं। दृढ़ इच्छाशक्ति और उचित प्रबंधन कला और संकल्प शक्ति के बल पर जागरण आज दुनिया का सबसे बड़ा हिंदी का अखबार है। सामाजिक सरोकार हो या साहित्य सेवा, इसे हमेशा प्राथमिकता दी। जागरण अभी इससे भी आगे जाएगा, क्योंकि इसने समय को पहचाना है। जो समय को पहचान लेता है, वह कभी पीछे नहीं रहता।

कविताएं या नवगीत को समाज में लोकप्रिय बनाने के लिए क्या किया जा सकता है?

छंदहीन कविता तो खूब लिखी जा रही हैं। साधन संपन्न एक-एक व्यक्ति 50-60 पुस्तकें लिख दे रहा है। लेकिन उसकी चार लाइन का भी कहीं पता नहीं। ऐसे कविता लिखकर भी भला क्या किया जा सकता है। उसके बजाय जो एक कविता भी लोगों की जुबान पर हो, उसका लिखना सार्थक है। मैंने सुझाव भी दिया और अपील भी करता हूं कि औद्योगिक घराने इसे गंभीरता से लें। जिस तरह फिल्मी गानों को संगीतबद्ध करके अच्छे गायकों से प्रस्तुत कराया जाता है। उसी प्रकार हिंदी के अच्छे साहित्यिक गीतों को प्रस्तुत कराया जाय।

हिंदी गीतों या कविता के उपेक्षा को किस रूप में देखते हैं?

ये भाग्य की बात है। हमारी वैदिक परंपरा तो छंद के रूप में ही रही है। वेद को ही छंद कहा गया है। उससे भी पहले वाचिक परंपरा रही। हजारों वर्षों से कविता लिखी जा रही थी और लोगों को याद भी थी। क्योंकि वो छंदोबद्ध थी। जब छंदोबद्ध नहीं रही तो उसके समाज से संबंध भी कमजोर पड़ गए। हमको फिर से उस कविता को जो छांदस्य परंपरा है, जो वाचिक परंपरा है, उससे कविता को जोडने और समाज को जोड़ने की पहल करनी होगी।

नई पीढ़ी यानी जेनजी को कविता से किस प्रकार जोड़ पाएंगे?

कविता का मंच चुटकुलों के हवाले हो गई है। बावजूद इसके कोरोना काल में जब कुछ नहीं था, लोग बाहर नहीं निकल सकते थे। उस समय छंद फिर से उभरकर आया। नई पीढ़ी ने जमकर छंदों में लिखना शुरू किया। मुझे लगता है कि अगर जिसमें आगे बढ़े या आगे जीने की आकांक्षा होगी, वो छंद को सहजता से लेगा। मैं मानता हूं कि छंद कविता नहीं है, वो एक आधार जरूर है। उसी तरह से जैसे धान की भूसी है। जब आप चावल बनाने तो भूसी को फेंक देते हैं, लेकिन अगर बीज के रूप में उपयोग करना है तो भूसी की तो जरूरत पड़ती है। कविता का अंकुरण बिना छंदों के नहीं हो सकता।

आज की युवा पीढ़ी को क्या संदेश देना चाहेंगे?

ये जो आंधियां आती हैं, उसमें न जाएं। अपने को समझें और जहां तक हो सके अपनी धरती से जुड़े रहें क्योंकि आकाश का मतलब है शून्य। और शून्य में ज्यादा देर तक नहीं रहा जा सकता। आपको धरती पर आना ही पड़ेगा। धरती को पकड़कर रहिए। धरती माता है। धरती माता जब तक आश्रय देंगी, आप आगे बढ़ेंगे। हिंदी कविता धरती माता की कविता है।

प्रमुख कृतियां

जाल फेंक रे मछेरे, शिखरिणी, जाड़े में पहाड़, ऋतुराज एक पल का, गीत उत्तरा फाल्गुनी, सूरज अपने पास बहुत है, निरख सखी ये खजन आये, छायापात, कवि के मन से एवं मैथिली गीत संग्रह क्यो नहि दे अछि आगि और पुरना सतघरवा मे बैसल।