75 साल का हुआ दिल्ली का खान मार्केट, रेफ्यूजी बैरक से सबसे महंगा लग्जरी बाजार बनने तक की Inside Story
दिल्ली का खान मार्केट, जो कभी विभाजन के बाद शरणार्थियों के लिए बैरक बाजार था, आज दुनिया के सबसे महंगे ...और पढ़ें

75 साल का हो गया है दिल्ली का खान मार्केट। फोटो: जागरण
HighLights
विभाजन के बाद शरणार्थियों के लिए बैरक बाजार के रूप में स्थापित
आज भारत का सबसे महंगा और विश्व का 24वां महंगा बाजार
पुराने बुकस्टोर और आधुनिक ब्रांडों का अनूठा संगम
प्रियंका दुबे मेहता, नई दिल्ली। दिल्ली का खान मार्केट, एक एलीट मार्केट, गुणवत्ता और आधुनिकता के प्रतीक होने के अलावा देश ही नहीं, विश्व के सबसे महंगे बाजारों में श्रेणी में शुमार किया जाने वाला बाजार।
वर्ग विशेष में इतना लोकप्रिय कि यहां से शॉपिंग करना भी एक स्टेटमेंट के तौर पर देखा जाने लगे। यह बाजार, जो कभी बैरक मार्केट हुआ करता था, आज डिजाइनर बुटीक्स, कैफे, रेस्टोरेंट्स और बुकस्टोर्स से सजा है।
यहां पर आधुनिकता के साथ कदमताल करते, अतीत के अहसास भी हैं। गर्व के भावों के साथ-साथ अपनापन भी है, स्टाइल के साथ अतीत की यादों की सौंधी खुशबू भी समेटे है बाजार।

यहां पर खिलौने हैं, दूर से अपनी चमक बिखेरते ब्रांडेड शोरूम्स और समृद्धि का उजाला फैलाती ज्वलेरी शॉप्स हैं जिनके आभूषणों में ही नहीं, वहां के वातावरण में भी एक सुनहरी आभा प्रस्फुटित होती है।
इस चकौचौंध को देखते हुए आगे बढ़िये तो पहले कदम ठहरते हैं फिर दिमाग सोच पाता है कि हम क्यों रुके हैं? वहां कुछ अलग है, कुछ अपना सा, कुछ पुराना सा, वर्षों की कहानियां समेटे एक स्थान।

एक बुक स्टोर जिसने अपना स्वरूप नहीं बदला, बिलिंग के लिए कंप्यूटर नहीं हैं, दुकान का इंटीरियर 75 साल पुराना है और ग्राहक हर वर्ग के। इस बाजार की चमक से पीछे की मेहनत दुकानदारों के चेहरों नजर आती है, गर्व के भाव उनकी बातों की खनक में होते हैं, उनकी गंभीरता और एक तरह की संतुष्टि में दिखाई पड़ते हैं।
खान मार्केट अपनी स्थापना के 75वें वर्ष में पहुंचा तो हमने सोचा कि सबरंग के इस अंक में इस बाजार की समृद्धि, इसके रंगों और रोशनी से आपको रूबरू करवाया जाए।

एक बैरक बाजार से पॉश मार्केट तक का सफर
खान मार्केट एक बैरक बाजार हुआ करता था। विभाजन के बाद जब शरणार्थी उस ओर से आए तो दिल्ली के अन्य स्थानों की तरह इस जगह भी उन्हें बसाने की कोशिश की गई। इसी प्रक्रिया में यहां पर दुकानें किराए पर दी जाने लगीं।
लोगों के पास पैसे नहीं थे तो 1950-51 में उन्हें पचास रुपये किराए पर दुकानें दी गईं। 1951 में भारत सरकार ने खान मार्केट को इसी उद्देश्य से बसाया था। यहां पर ऊपर मकान और नीचे दुकानें थीं।
नॉर्थ वेस्ट फ्रंटीयर यानी आज के पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा इलाके से दिल्ली आए विस्थापितों को कारोबार का आधार देने के लिए इसे तैयार किया गया। शुरुआती दौर में यह यू (U) के आकार का दो मंजिला कॉम्प्लेक्स था। जिसमें नीचे दुकानें और ऊपर दुकानदारों के लिए रिहायशी फ्लैट थे।

ऊपर मकान, नीचे दुकान
खान मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के प्रधान संजीव मेहरा के मुताबिक विभाजन के बाद पाकिस्तान से दिल्ली आए लोगों को रिहायश के अलावा कारोबार मुहैया करवाने, उनकी मदद करने की जरूरत थी।
उस समय खान मार्केट के आसपास बैरक थीं और पास के सुजान सिंह मार्ग में सिपाहियों के रहने की व्यवस्था थी, इन्हीं सिपाहियों के रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक बेहद सामान बैरक मार्केट बना था।
बाद में विस्थापितों के लिए सरकार ने इसे नो प्रॉफिट, नो लॉस' के आधार पर विकसित किया। अब क्योंकि इनके पास कारोबार शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं थी तो सरकार ने दुकानों को बेहद कम किराये पर दिया।

यहां पहले 74दुकानें और इतने ही रेजिडेंशियल फ्लैट्स बनाए गए। लोगों की संख्या बढ़ी तो सरकार ने इसे बांट दिया। ऊपरी मंजिल के फ्लैट वैसे ही रहे लेकिन दुकानों को दो हिस्सों में कर दिया गया।
एक दुकान 535 वर्ग फुट और एक 464 वर्ग फुट की बनी क्योंकि इसमें से सीढ़ी जाती थी तो 70 वर्ग फुट कम हो जाता था। सरकार ने पहले इन्हें किराए पर दिया और बाद में संबंधित कानून के तहत बेचने की प्रक्रिया शुरू हुई।
किसी ने दुकान ली तो किसी ने आवास। संजीव मेहरा बताते हैं कि शुरुआती खान मार्केट आज की चमक-दमक से बिल्कुल अलग था। यहां प्रोविजन स्टोर, किराना, डेयरी और रोजमर्रा के सामान की दुकानें थीं। बाद में किताबों की दुकानें आईं।
फकीर चंद और बारीसंस जैसे नाम धीरे-धीरे मार्केट की पहचान बनने लगे। पहले जितने भी दूतावास थे वे चाणक्यपुरी नहीं बल्कि जोर बाग और अन्य इलाकों में स्थित थे। दूतावास और विदेशी लोग रहते थे।
इससे खान मार्केट में एक अलग तरह का ग्राहक आने लगा। ऐसे में आसपास का राजनयिक और सरकारी इलाका खान मार्केट के लिए महत्वपूर्ण ग्राहक आधार तैयार कर चुका था।

अपनेपन के अहसास में बंधे ग्राहक
अपनापन, स्नेह और संवेदनाएं, इसका अर्थ, इसकी आवश्यकता उस ओर से आए शरणार्थियों से बेहतर भला एक दौर में कौन समझ सकता था। उन्होंने बाजार पौध को भावनाओं से सिंचित किया। बस इसी इमोशन और अपनेपन की खुशबू में देसी-विदेशी ग्राहक यहां खिंचे चले आते हैं।
संजीव अंग्रेजी में एक फ्रेज सुनाते हैं जिनका हिंदी अर्थ यह है - ग्राहक वहीं जाता है, जहां उसे बुलाया जाता है और वहां बना तब तक रहता है उसे अच्छे से ट्रीट किया जाता है। इस नब्ज को इस बाजार ने, इसके दुकानदारों में पकड़ लिया था जिसे आजतक नहीं छोड़ा।
लोग आते गए, कारवां बनता गया। आसपास भारती नगर, मान नगर, शान नगर और निजामुद्दीन जैसी बस्तियां और सरकारी आवास विकसित हुए। ऐसे में मार्केट की लोकेशन भी इसकी बड़ी ताकत बनी।

दिल्ली के कई प्रमुख इलाकों से यहां कुछ ही मिनट में पहुंचा जा सकता था। साफ-सफाई, सुरक्षा और आसान पहुंच के अलावा दुकानदारों का ग्राहकों से व्यक्तिगत रिश्ता इसकी खासियत बन गया।
उनके शब्दों में पुराने समय में दुकानें सिर्फ सामान बेचने की जगह नहीं थीं। परिवार के बुजुर्ग खुद ग्राहकों को अटेंड करते थे। धीरे-धीरे दुकानदार और ग्राहक के बीच एक व्यक्तिगत रिश्ता बनने लगा जो स्थाई हो गया।
विदेशी और एग्जॉटिक आइटम्स से बना खास
खान मार्केट में राशन और खाने-पीने के सामान की गुणवत्ता के साथ ऐसी चीजें भी यहां मिलने लगीं जो दिल्ली के दूसरे बाजारों में आसानी से उपलब्ध नहीं थीं। विदेशी ग्राहकों के लिए एग्जॉटिक फूड और अलग-अलग देशों से आने वाली खाद्य सामग्री उपलब्ध होने लगी।
धीरे-धीरे यह साधारण जरूरतों के बाजार से एक महंगे और खास बाजार में बदलने लगा। अफगानिस्तान से लेकर यूरोप तक के आइटम्स, फल और सूखे मेवे यहां के अलावा कहीं नहीं मिलते थे। 1990 के दशक में उदारीकरण के साथ बाजार की तस्वीर तेजी से बदली।
संजीव बताते हैं कि 1992 के आसपास ओपन जनरल लाइसेंस के बाद विदेशी कंपनियों के लिए भारत में कारोबार करना आसान हुआ। कंपनियों ने खान मार्केट के ग्राहक वर्ग को देखा और समझा कि यहां आने वाला ग्राहक सिर्फ घूमने नहीं आता, खरीदारी भी करता है।
यहीं से बड़े-बड़े ब्रांड की दिलचस्पी बढ़ी। यहां सबसे पहले बरिस्ता जैसे कैफे आए, फिर फैबइंडिया और अनोखी जैसे ब्रांड पहुंचे और देखते ही देखते खान मार्केट धीरे-धीरे दिल्ली के प्रमुख ब्रांडेड और लाइफस्टाइल बाजारों में शामिल होता चला गया।

किराया, जिसे सुनकर होश उड़ जाएं
बात करने के लिए हम बेहद संकरी दुकान में पहुंचे, लगा कि यह आकार इसकी प्रसिद्धि के साथ कुछ न्याय करता नहीं जान पड़ रहा था लेकिन इसका किराया सुनकर कानों पर विश्वास नहीं होता, दस से ग्यारह लाख रुपये... सुनकर एक बारगी किसी को भी मूर्छा आ जाए।
वर्ष 2002 में कुछ परेशानियां पेश आईं, दुकानदारों ने एनडीएमसी के सामने यह परेशानी रखी कि बाजार के ऊपर के हिस्सों में भी व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही थीं लेकिन उसके अनुरूप बुनियादी ढांचा नहीं बढ़ रहा था।
ऊपर के आवासीय हिस्सों का व्यवसायीकरण शुरू हो गया था और वहां भी दुकानें, दफ्तर और दूसरे कारोबारी प्रतिष्ठान आने लगे। इससे पुराने निवासियों के लिए रहना मुश्किल होने लगा।
जैसे-जैसे खान मार्केट की लोकप्रियता बढ़ी, संपत्ति की कीमतें और किराये भी बढ़ते गए। उधर बढ़ते परिवारों के बीच संपत्ति को लेकर विवादों और हिस्सेदारी के कारण भी पुरानी संपत्तियां बिकने लगीं। बाद में संपत्तियों की बिक्री पर अंकुश लगा दिया गया।
वाइन के लिए मिली लोकप्रियता
शुरुआती दौर में दिल्ली में वाइन शॉप्स की कमी थी, इसके लिए उस दौरान बॉन्डेड वेयरहाउस हुआ करते थे। बाजार में इसी तरह का वेयरहाउस यहां बनाया गया जहां विदेशी शराब और दूसरे आयातित सामान का कारोबार भी होता था।
यह अपनी तरह का अलग आकर्षण और बाजार की अलग यूएसपी थी। संजीव मेहरा का परिवार इस तरह का वेयरहाउस चलाता था लेकिन समय के साथ भ्रष्टाचार और इंस्पेक्टर राज से परेशान होकर परिवार ने वह कारोबार छोड़ दिया।
1970 के दशक में जब उन्होंने कारोबार संभाला तब हालात अलग थे। 1975 में इमरजेंसी के दौरान आवश्यक वस्तुओं से जुड़े कारोबार पर भी कई तरह के नियंत्रण थे।
ऐसे में उन्होंने पुराना कारोबार छोड़कर 1975 में खिलौनों की दुकान शुरू की। वे बताते हैं कि यहां नामी नेता, अभिनेता, खिलाड़ी अपने बच्चों के साथ खिलौने से उसी दौर से आते रहे हैं।
वे जिक्र करते हैं कि एक बार एक बार उनसे ग्राहक ने एक रस्सी मांगी तो वे बिना उसकी ओर देखे रस्सी निकालने लगे, फिर आवाज आई कि रस्सी नायलोन की नहीं चाहिए, उन्होंने फिर बिना ग्राहक की ओर देखे कहा कि आपकी आवाज तो सैफ अली खान से मिलती है और फिर ग्राहक ने कहा जी मैं वही हूं। इसी तरह के कई वाकए हुए, तो कुल मिलाकर सेलिब्रिटी का इस बाजार में आना शुरू से ही आम था।
और यूं बने रेस्तरां
खान मार्केट की बात करें तो युवाओं में इसका क्रेज रेस्तरां के लिए देखने को मिलता है। हालांकि पहले ऐसा नहीं था, आज जहां चालीस रेस्तरां हैं वहां पहले इक्की दुक्की मिठाई की दुकानें हुआ करती थीं।
खान मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के उपप्रधान ब्रिज गोपाल खोसला बताते हैं कि शुरुआती खान मार्केट में राशन और रोजमर्रा के सामान की दुकानें प्रमुख थीं। रेस्तरां के लिए उपयुक्त जगह नहीं थी।
बाद में जब ऊपर के फ्लैटों और दुकानों के व्यावसायिक इस्तेमाल की अनुमति मिली तो बाजार की संरचना ही बदलने लगी। नीचे की दो दुकानों को जोड़कर करीब एक हजार वर्ग फुट की जगह और ऊपर बरसाती जैसी अतिरिक्त जगह मिल जाती थी।
इस तरह रेस्तरां चलाने के लिए खान मार्केट एक आदर्श स्थान बन गया। ब्रिजमोहन याद करते हुए बताते हैं एक वक्त खाने पीने की दुकानों के नाम पर बंगाल स्वीट्स और एल्फिना जैसे आउटलेट्स थे, आज ऐसा कोई बड़ा ब्रांड नहीं है जो इस बाजार में न हो।
वे बताते हैं कि जहां आज पार्किंग लग्जरी गाड़ियों से पटी रहती है, उस दौरान रविवार को अक्सर वे दोस्तों के साथ क्रिकेट खेला करते थे क्योंकि वहां खाली जगह बहुत थी।
जहां से आती है अतीत की खुशबू
जैसा कि हमने बताया कि रंग और रोशनी की शृंखला को देखते देखते मानो एक ऐसी जगह पैर ठिठक जाते हैं जहां लगता है कि भागदौड़ की दुनिया कुछ ठहर जाती है, सबकुछ एक तरह से ब्लैक एंड व्हाइट खी फिल्म की तरह दिखने लगता है।
फकीर चंद बुक स्टोर का वह नोस्टाल्जिया एक दौर में पहुंचा देता है जहां पुराना जंग लगा शटर अपने रंग और अवस्था से अपनी उम्र बयां करता नजर आता है।
किताबें सारी हैं लेकिन आपको कंप्यूटरीकृत बिल नहीं मिलेगा, आज भी वैसे ही अरेंज की गई हैं किताबें जैसे 1951 में थी जब यह दुकान खुली थी। इस दुकान पर चौथी पीढ़ी के रूप में बैठे अभिनव बाम्ही बताते हैं कि फकीरचंद की शुरुआत 1931 में पेशावर कैंट में हुई थी।

विभाजन के बाद परिवार दिल्ली आया और खान मार्केट में दुकान शुरू हुई। कई दशक बीत गए, बाजार की शक्ल बदल गई, आसपास के ग्राहक बदल गए, कारोबार का तरीका बदल गया और कंप्यूटर तक आ गया, लेकिन फकीरचंद की दुकान की मूल पहचान में बदलाव नहीं आया।
सोचिए कितना जुड़ाव होगा कि जब सब कुछ खत्म हो गया उस दौर में हर कोई कुछ मुनाफे की ओर भागता था लेकिन फकीरचंद ने यादें चुनीं, भावनाएं चुनीं और किताबें चुनीं जो हालात की उस तरह की जरूरत कतई नहीं थी।
अभिनव बताते हैं कि यह कारोबार मुनाफा देने वाला कारोबार नहीं था। जिस दौर में राशन और रोजमर्रा की चीजें जरूरी मानी जाती थीं, उस दौर में किताबों का कारोबार 'एसेंशियल' नहीं था।
फिर भी फकीरचंद ने किताबों का साथ नहीं छोड़ा। बड़े-बड़े लोग यहां आते रहे और दुकान ने अपनी पुरानी पहचान को संभालकर रखा। अभिनव के मुताबिक वे दृश्य सबसे सुंदर होते हैं जिनमें लोग अपनी तीसरे, चौथी पीढ़ी के साथ आते हैं और दुकान का वही स्वरूप पाते हैं और अपनी कहानियां उन बच्चों को सुनाते हैं।
इसी तरह की एक और बुकशॉप है जो पुराने दिनों की यादें ताजा करती है। बहरीसंस। आंचल मल्होत्रा की पुस्तक 'रेम्नेंट्स आफ सेपरेशन' में लिखा है कि 1953 में बलराज बिहारी मल्होत्रा ने खान मार्केट में बहरीसंस बुकसेलर्स सा काम शुरू किया था।

नाम की कहानी
नार्थ वेस्ट फ्रंटियर प्राविंस यानी उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत के नेता खान अब्दुल जब्बार खान के नाम से जोड़ा गया है। वे खान अब्दुल गफ्फार खान यानी फ्रंटियर गांधी के बड़े भाई थे।
खान मार्केट की शुरुआती दुनिया को समझने के लिए लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह का संदर्भ भी दिलचस्प है। वे बाजार के सामने सुजान सिंह पार्कमें रहते थे और शुरुआती दौर में कैरी होम आइसक्रीम पार्लर जैसे प्रतिष्ठानों से उनका जुड़ाव था।
हालिया ऐतिहासिक लेखों में पुराने दुकानदारों और खान मार्केट के उस दौर का जिक्र मिलता है, जब यहां आने वाले लोग दुकानदारों को जानते थे और बाजार एक पड़ोस जैसा लगता था।
विलियम डलरिंपल की 'सिटी ऑफ जिन्स: अ ईयर इन देल्ही' भी इस बाजार को एक अलग समय की दिल्ली में के रूप में प्रस्तुत करती है। कुशमैन एंड वेकफील्ड की 'मेन स्ट्रीट्स अक्रॉस द वर्ल्ड 2025' रिपोर्ट में खान मार्केट को भारत की सबसे महंगी हाई स्ट्रीट रिटेल लोकेशन के तौर पर दर्ज किया गया और दुनिया में 24वें स्थान पर थी।
यह भी पढ़ें- मोदीनगर तो सब जानते हैं, मगर ओखला की 'मोदी मिल्स' का असली मालिक कौन? यहां से दिल्ली में घर-घर तक पहुंचता था आटा!
