3 साल में 89 जानें ले चुका दिल्ली का लापरवाह सिस्टम, जनकपुरी में DJB के गड्ढे में 'कमल' की मौत ने फिर खोली कलई
दिल्ली में खुले नालों और जलजमाव के कारण हर महीने औसतन चार लोगों की जान जा रही है, पिछले दो ...और पढ़ें

जनकपुरी में डीजेबी के इस गड्ढे में गिरकर हो गई कमल की मौत।

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जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। नोएडा के सेक्टर-150 में निर्माणाधीन बेसमेंट में डूबकर इंजीनयर युवराज मेहता की मौत के बाद बृहस्पतिवार को जनकपुरी में गड्ढे में गिरकर कॉल सेंटर कर्मचारी कमल की मौत ने दिल्ली–एनसीआर में बुनियादी ढांचे की बदहाली और प्रशासनिक लापरवाही को बेनकाब कर दिया है।
जनकपुरी में Delhi Bike Accident वाली जगह पर दिल्ली जल बोर्ड ने गड्ढा तो खोदा हुआ था, लेकिन वहां कोई बैरिकेडिंग नहीं की थी। न बैरिकेडिंग थी और न चेतावनी संकेत। बृहस्पतिवार की रात इसी में गिरने से कमल की मौत हो गई। सिस्टम एक बार फिर फेल हो गया। यह कोई एक मामला नहीं है, सिस्टम की नकामी की वजह से ऐसी कई घटनाए हैं।
राजधानी दिल्ली में खुले नालों और मानसून के दौरान जलजमाव के कारण औसतन हर माह चार लोगों की जान जा रही है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 के बीच ऐसे हादसों में 89 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, इसके बावजूद लापरवाही थमने का नाम नहीं ले रही।
कार्रवाई दूर, मुआवजा भी नसीब नहीं
राजस्व विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इन मौतों के बाद न तो जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होती है और न ही कई मामलों में पीड़ित परिवारों तक मुआवजा पहुंच पाता है। हादसों के बाद जांच और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया इतनी जटिल हो जाती है कि परिवार न्याय की आस में वर्षों भटकते रहते हैं।
बहुविभागीय जिम्मेदारी, जवाबदेही शून्य
दिल्ली में नालों और सड़कों की देखरेख बहुविभागीय है, पीडब्ल्यूडी, सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण विभाग, नगर निगम, डूसिब और Delhi Jal Board जैसे विभाग जिम्मेदार हैं। हादसे के वक्त यह तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि किस विभाग की चूक थी।
इसी भ्रम का फायदा उठाकर विभाग और अधिकारी अक्सर बच निकलते हैं। कई मामलों में विभागों के बीच आरोप-प्रत्यारोप चलता रहता है। करीब डेढ़ साल पहले गाजीपुर में खुले नाले में गिरने से मां-बेटे की मौत के बाद डीडीए और एमसीडी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहे। बाद में नाला एमसीडी का निकला, लेकिन तब तक कार्रवाई ठंडी पड़ चुकी थी।
केस स्टडी: जहां न्याय भी नहीं, मुआवजा भी नहीं
- 06 जुलाई 2025: रामगढ़ गांव (उत्तर-पश्चिम दिल्ली) में पीडब्ल्यूडी के खुले नाले में गिरने से चार वर्षीय रिजवान की मौत। एफआईआर दर्ज हुई, लेकिन कोई नामजद आरोपी नहीं। परिवार को न मुआवजा मिला, न न्याय।
- 21 मार्च 2025: खजूरी खास में सिंचाई विभाग के नाले में तीन वर्षीय बच्चे की डूबकर मौत। जिम्मेदारी तय नहीं, मुआवजा नहीं।
- 10 अगस्त 2024: रोहिणी सेक्टर-20 में डीडीए पार्क के छठ घाट में बारिश का पानी भरने से आठ वर्षीय तरुण की डूबकर मौत। जांच के बाद भी विभाग के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं।
- 03 मार्च 2024: अलीपुर में सीवर लाइन की खुदाई के दौरान सुरक्षा इंतजाम न होने से 10 फुट गहरे गड्ढे में गिरकर रमेश चंद की मौत। लंबे संघर्ष के बाद ठेकेदार पर केस दर्ज हुआ, मामला अदालत में लंबित।
विशेषज्ञों की राय, सजा के बिना नहीं थमेगी लापरवाही
कड़कड़डूमा कोर्ट के वकील मनीष भदौरिया के अनुसार, ऐसे मामलों में प्रत्यक्षदर्शी मिलना मुश्किल होता है और मिलने पर दबाव में बयान बदल जाते हैं। लापरवाही साबित करना चुनौतीपूर्ण है, इसलिए अधिकारी बच निकलते हैं। हालांकि नए कानून (बीएनएस) में लापरवाही से मौत पर सजा की अवधि दो साल से बढ़ाकर सात साल कर दी गई है, लेकिन जब तक दोषियों को सजा नहीं मिलती, लापरवाही पर अंकुश लगना मुश्किल है।
दिल्ली में पिछले दो वर्षों के बड़े हादसे
- 27 जुलाई 2024: ओल्ड राजेंद्र नगर में कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में जलभराव, तीन अभ्यर्थियों की मौत।
- 31 जुलाई 2024: गाजीपुर में खुले नाले में डूबकर 23 वर्षीय महिला और उसके तीन वर्षीय बेटे की मौत।
- 7 अक्टूबर 2024: अलीपुर में पांच वर्षीय बच्चे की खुले नाले में गिरकर मौत।
- 5 मार्च 2025: उत्तर-पूर्व दिल्ली में सात वर्षीय बच्चे की खुले नाले में गिरकर मौत।
- 9 जुलाई 2025: महिंद्रा पार्क में चार वर्षीय बच्चे की मौत।
- 16 अगस्त 2025: वेलकम में पतंग के पीछे भागते समय सात वर्षीय बच्चे की खुले नाले में गिरकर मौत।
बड़ा सवाल
जब मौतें आंकड़ों में दर्ज हो चुकी हैं, जिम्मेदार विभाग चिह्नित हैं और कानून सख्त हो चुका है, तो फिर खुले नालों और जलजमाव पर लगाम क्यों नहीं लग रही? क्या प्रशासन किसी और हादसे का इंतजार कर रहा है, या पीड़ित परिवारों की टूटती उम्मीदें ही इस सिस्टम की सबसे बड़ी कीमत बन चुकी हैं?
