'प्रदर्शन में मौजूदगी से पुलिस के काम में बाधा डालने की मंशा साबित नहीं होती', दिल्ली HC का बड़ा आदेश; FIR रद
दिल्ली हाई कोर्ट ने रामलीला मैदान में एसएससी परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले अभ्यर्थी पर दर्ज एफआईआर रद ...और पढ़ें

प्रदर्शन करने पर दिल्ली पुलिस की एफआईआर हाई कोर्ट ने रद की। फोटो: आर्काइव
HighLights
दिल्ली हाई कोर्ट ने एसएससी अभ्यर्थी की एफआईआर रद की।
प्रदर्शन में केवल मौजूदगी आपराधिक मंशा का सबूत नहीं।
पुलिस विशिष्ट आपराधिक कृत्य साबित करने में विफल रही।
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी प्रदर्शन में शामिल होना मात्र इस बात का सुबूत नहीं है कि व्यक्ति की मंशा पुलिस के वैध आदेशों की अवहेलना करने या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने की थी।
न्यायमूर्ति संजीव नरूला की पीठ ने कहा कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध में शामिल होने या अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ मिलकर अपराध करने की साझा मंशा का कोई ठोस आधार न हो, तो केवल प्रदर्शन में मौजूदगी के आधार पर उसे आपराधिक कार्यवाही का सामना करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
अदालत ने कहा कि लोक सेवक के वैध रूप से जारी आदेश की अवहेलना के अपराध के लिए संबंधित व्यक्ति की जानकारी और आदेश की अवहेलना से जुड़े आवश्यक तत्वों का होना जरूरी है।
केवल एक ही प्रदर्शन में शामिल होने से पुलिस के निर्देशों की अवहेलना करने या पुलिसकर्मियों के काम में बाधा डालने की साझा मंशा स्थापित नहीं होती।
प्रदर्शन में मौजूदगी से अपराध साबित नहीं
अदालत ने यह टिप्पणी कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की प्रवेश परीक्षा में अनियमितताओं के खिलाफ अगस्त 2025 में रामलीला मैदान में हुए प्रदर्शन से जुड़े मामले में की। पीठ ने एक एसएससी अभ्यर्थी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद कर दी।
दिल्ली पुलिस ने आरोप लगाया था कि निर्धारित समय समाप्त होने और बार-बार माइक से घोषणा किए जाने के बावजूद कुछ प्रदर्शनकारी मैदान खाली करने को तैयार नहीं थे।
पुलिस ने निषेधाज्ञा उल्लंघन का लगाया आरोप
अभियोजन के अनुसार, प्रदर्शन के कुछ आयोजकों ने निर्धारित समय के बाद भी प्रदर्शन समाप्त करने से इनकार किया और मांगें पूरी होने तक लोगों को मैदान में रुकने के लिए उकसाया।
पुलिस का आरोप था कि कुछ प्रदर्शनकारियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 के तहत जारी निषेधाज्ञा का उल्लंघन किया और कुछ ने पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की भी की।
याचिकाकर्ता के खिलाफ नहीं मिला विशिष्ट कृत्य
हालांकि, हाई कोर्ट ने पाया कि न तो एफआईआर और न ही बाद में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में याचिकाकर्ता के किसी विशिष्ट आपराधिक कृत्य का उल्लेख था।
अदालत ने कहा कि केवल प्रदर्शनकारियों के बीच मौजूद होने से यह साबित नहीं होता कि याचिकाकर्ता ने जानबूझकर आदेश की अवहेलना की या अन्य लोगों के साथ मिलकर अपराध करने की मंशा से भाग लिया।
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