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'सिर्फ दुर्व्यवहार से SC-ST एक्ट लागू नहीं', दिल्ली हाईकोर्ट ने DU प्रोफेसर के खिलाफ रद की FIR

Published: Sun, 12 Apr 2026 06:01 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने डीयू की महिला प्रोफेसर के खिलाफ एससी-एसटी अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी रद कर दी। कोर्ट ...और पढ़ें

दिल्ली हाई कोर्ट ने डीयू की महिला प्रोफेसर के खिलाफ एससी-एसटी अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी रद कर दी। फाइल फोटो

दिल्ली हाई कोर्ट ने डीयू की महिला प्रोफेसर के खिलाफ एससी-एसटी अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी रद कर दी। फाइल फोटो

विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की महिला प्रोफेसर के खिलाफ अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (एससी-एसटी) अधिनियम के तहत हुई प्राथमिकी को दिल्ली हाई कोर्ट ने यह कहते हुए रद कर दिया कि सिर्फ किसी एससी व्यक्ति के साथ दुर्व्यवहार करना अपने आप में एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत अपराध नहीं बनता। 

अदालत ने कहा कि इसके लिए यह साबित होना आवश्यक है कि आरोपित ने जाति के आधार पर अपमान करने की मंशा से कार्य किया हो। न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा की पीठ ने कहा कि एससी-एसटी कानून की धारा-तीन के तहत अपराध तभी बनता है जब यह स्पष्ट हो कि उक्त कृत्य पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की मंशा से किया गया हो।

पीठ ने कहा कि प्राथमिकी करने के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं है कि शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति से है और उसके साथ दुर्व्यवहार हुआ है। यह मामला डीयू के लक्ष्मीबाई कालेज की दो एसोसिएट प्रोफेसरों के बीच अगस्त 2021 में हुई बहस से जुड़ा है।

याचिकाकर्ता कॉलेज की ऐसोसिएट प्रोफेसर हैं और हिंदी विभाग की इंचार्ज हैं और उसी कालेज में शिकायतकर्ता भी ऐसोसिएट प्रोफेसर हैं। याचिका के अनुसार 18 अगस्त 2021 को विभागीय बैठक में नेशनल असेसमेंट एंड एक्रेडिटेशन काउंसिल (एनएएसी) का मिनट्स तैयार किया गया था और बैठक में शामिल सभी संबंधित सदस्यों के हस्ताक्षर जरूरी थे।

याचिकाकर्ता ने शिकायतकर्ता से मिनट्स को पढ़ने और हस्ताक्षर करने का अनुरोध किया। हस्ताक्षर के बाद याची ने शिकायतकर्ता से रजिस्टर वापस देने को कहा, क्योंकि वह उसे अपने साथ ले जाने लगी थीं। याचिकाकर्ता ने रजिस्टर वापस लेने की कोशिश की, इस पर शिकायतकर्ता ने उनके बाल खींचे। इस बीच शिकायतकर्ता द्वारा रजिस्टर का एक पन्ना फाड़ दिया गया।

23 अगस्त 2021 में दी गई दूसरी शिकायत के आधार पर प्राथमिकी की गई थी, लेकिन इसमें भी याचिकाकर्ता पर कोई खास जातिवादी टिप्पणी या बात कहने का आरोप नहीं लगाया गया है। 16 अगस्त 2021 को प्रिंसिपल व पुलिस से की गई किसी भी शिकायत में जाति का कोई जिक्र नहीं था। जातिवादी टिप्पणी का जिक्र 17 अगस्त 2021 की शिकायत में बाद में जोड़ा गया था और उसके बाद भी इसमें कोई खास बात नहीं थी।

अदालत ने कहा कि इस मामले में जातिवादी टिप्पणियों का जिक्र केवल अस्पष्ट और सामान्य शब्दों में किया गया है। शिकायतकर्ता ने कहा कि याचिकाकर्ता ने कहा था कि ये लोग पिछड़े इलाके से आते हैं और वे खराब माहौल बना रहे हैं। इसके अलावा यह भी कहा था कि इस तरह के शब्द सामाजिक रूप से पिछड़े लोग ही बोलते हैं।

पीठ ने नोट किया कि शिकायत में जातिवादी टिप्पणी की कोई जानकारी नहीं थी, जोकि शिकायतकर्ता के खिलाफ की गई थी। उसका कहना बस इतना था कि एससी समुदाय की सदस्य होने के नाते याचिकाकर्ता का रवैया दमनकारी था और उनका बर्ताव ऐसा था कि वे एससी समुदाय को नापसंद करते हैं।

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता के रवैये से शिकायतकर्ता ने नापसंदगी और अपमान की एक आम भावना महसूस की थी, लेकिन याची द्वारा कही गई कोई थी जातिवादी टिप्पणी के किए जाने के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी।

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