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दिल्ली HC ने कहा- समझौता अपराध से मुक्ति नहीं देता, लेकिन जमानत में महत्वपूर्ण; धोखाधड़ी आरोपी को मिली अग्रिम जमानत

Published: Mon, 23 Mar 2026 09:10 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने धोखाधड़ी के एक मामले में अग्रिम जमानत देते हुए कहा कि मध्यस्थता समझौता आपराधिक दायित्व से ...और पढ़ें

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपित की जमानत याचिका पर विचार करते समय दोनों पक्षों के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपित की जमानत याचिका पर विचार करते समय दोनों पक्षों के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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विनीत त्रिपाठी, नई दिल्ली। धोखाधड़ी के मामले में एक आरोपित को अग्रिम जमानत देते हुए दिल्ली हाई काेर्ट ने कहा कि भले ही मध्यस्थता से हुआ समझौता आपराधिक दायित्व से मुक्ति नहीं देता, लेकिन जमानत पर विचार करते समय यह एक महत्वपूर्ण कारक बना रहता है।

न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया की पीठ ने कहा कि अगर अपराध साबित होता है, तो मध्यस्थता समझौता आरोपित को उसके आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं करेगा। हालांकि, पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि आरोपित की जमानत याचिका पर विचार करते समय दोनों पक्षों के आचरण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

'जमानत देने से नहीं कर सकते वंचित'

अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता ने भी वास्तव में पूर्व पीठ के समक्ष खुद ही इस विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध किया था और उसने इस प्रक्रिया में भाग भी लिया था। अदालत ने कहा कि ऐसे में जब आरोपित पहले ही समझौता राशि का एक बड़ा हिस्सा चुका दिया है, ऐसे में उसे जमानत पर रिहा करने से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने आरोपित को 25 हजार रुपये के निजी मुचलके व इतनी ही राशि के एक जमानती पर रिहा करने का आदेश दिया। संपत्ति के लेन-देन से जुड़े विवाद के मामले में आरोपित के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा- 420 के तहत प्राथमिकी हुई थी।

समझौते की शेष राशि के लिए हुई बहस

अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि शिकायतकर्ता ने एक दुकान खरीदने के लिए आरोपी को कुल 10 लाख का भुगतान किया था। आरोप लगाया गया था कि पैसे मिलने के बावजूद आरोपित ने न तो संपत्ति शिकायतकर्ता के नाम पर स्थानांतरित की और न ही पैसे वापस किए।

वहीं, आरोपित ने तर्क दिया कि यह विवाद मूल रूप से दीवानी (सिविल) प्रकृति का था और पैसे की वसूली के लिए दबाव बनाने के मकसद से इसे आपराधिक रंग दे दिया गया था। यह भी कहा कि दोनों पक्ष मध्यस्थता के ज़रिए विवाद को सुलझाने पर सहमत हो गए थे और उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट मध्यस्थता केंद्र के समक्ष एक समझौता भी कर लिया था।

तय की गई राशि का 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा पहले ही चुकाया जा चुका था। वहीं, याचिका का विराेध करते हुए पुलिस ने तर्क दिया था कि यदि आरोपों से कोई अपराध साबित होता है तो मध्यस्थता समझौता आरोपित को उसके आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता। शिकायतकर्ता ने भी कहा कि समझौते के बावजूद बची हुई राशि का भुगतान नहीं किया गया है।

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