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15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति, दिल्ली HC बोला- जबरन मां बनाना सम्मान के अधिकार का उल्लंघन

Published: Tue, 15 Sep 2026 06:38 PM (IST)

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता को 30 सप्ताह से अधिक की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति ...और पढ़ें

मर्जी के बिना मां बनने की जिम्मेदारी डालना पीड़िता के सम्मान के साथ जीने के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा।

मर्जी के बिना मां बनने की जिम्मेदारी डालना पीड़िता के सम्मान के साथ जीने के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा।

HighLights

  1. दिल्ली हाई कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता को गर्भपात की अनुमति दी।

  2. जबरन मां बनाना सम्मान के अधिकार का गंभीर उल्लंघन है।

  3. अदालत ने 15 वर्षीय पीड़िता के अधिकारों को प्राथमिकता दी।

जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति की मांग वाली एक दुष्कर्म पीड़िता की याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। दुष्कर्म पीड़िता को भ्रूण को समाप्त करने की अनुमति देते हुए अदालत ने कहा कि अपराध से हुई गर्भावस्था को जारी रखने के लिए मजबूर करना और मर्जी के बिना मां बनने की जिम्मेदारी डालना पीड़िता के सम्मान के साथ जीने के अधिकार का गंभीर उल्लंघन होगा।

मां बनना तय करने का अधिकार है महिला का

मामले को दुर्भाग्यपूर्ण और दुखद बताते हुए अदालत ने कहा कि अपने शरीर के संबंध में महिला के अधिकार में यह तय करने का अधिकार भी शामिल है कि वह मां बनना चाहती है या नहीं। पीठ ने कहा कि यौन उत्पीड़न की पीड़िता को इसके कारण हुए बच्चे को पालने और जन्म देने के लिए मजबूर करने से उसे और अधिक और लंबे समय तक शारीरिक, मानसिक आघात का सामना करना पड़ सकता है।

पूरी प्रक्रिया को रिकॉर्ड करें

उक्त टिप्पणियों के साथ अदालत ने लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज और एसके अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट को निर्देश दिया कि वे जल्द से जल्द लड़की की गर्भावस्था को खत्म करने का इंतजाम करें और की गई प्रक्रिया का रिकाॅर्ड रखें। अदालत ने डाक्टरों से कहा कि वे दुष्कर्म के मामले में दर्ज आपराधिक मुकदमे के सिलसिले में डीएनए पहचान और अन्य कामों के लिए टिश्यू या भ्रूण के हिस्से को सुरक्षित रखें।

सरकार उठाएगी पूरा खर्चा

अदालत ने दिल्ली सरकार को गर्भावस्था खत्म करने से जुड़े सभी खर्च उठाने का निर्देश दिया गया। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर मेडिकल प्रक्रिया के बावजूद बच्चा जिंदा पैदा होता है, तो उसकी मेडिकल देखभाल के लिए सभी संभव उपाय किए जाएं और चाइल्ड वेलफेयर कमेटी कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करे।

'20 सप्ताह से अधिक और 24 सप्ताह तक की हो गर्भावस्था'

दुष्कर्म पीड़िता ने 30 सप्ताह से अधिक के गर्भ को गिराने की मांग की थी, जबकि मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम की धारा-तीन के तहत, कुछ खास श्रेणी की महिलाओं के लिए कानूनी जरूरतों को पूरा करने पर 20 सप्ताह से अधिक और 24 सप्ताह तक की गर्भावस्था खत्म करने की अनुमति है।

पीठ ने यह भी कहा कि गर्भावस्था का अधिक समय होने के कारण ज्यादा चिकित्सकीय सावधानी की जरूरत होती है, लेकिन सिर्फ इसी वजह से नाबालिग को शारीरिक स्वायत्तता, सम्मान और प्रजनन संबंधी पसंद के अधिकारों पर विचार करने से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा कि सुरक्षा, देखभाल और सुरक्षित व सम्मानजनक माहौल में बढ़ने का मौका मिलने के बजाय पीड़िता को ऐसी परिस्थितियों का सामना करने के लिए मजबूर किया गया, जिनका सामना किसी भी बच्चे को कभी नहीं करना चाहिए।

बच्चे को कभी वंचित नहीं किया जाना चाहिए

पीठ ने कहा कि अदालत की नजर में 15 साल की बच्ची को सिर्फ इसलिए 'मां' नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसे यौन हिंसा के परिणामस्वरूप गर्भावस्था के लिए मजबूर किया गया है। जज ने उम्मीद जताई कि याचिकाकर्ता को हर संभव मदद, देखभाल और सुरक्षा दी जाएगी ताकि उसे अपना बचपन और सम्मान वापस पाने का मौका मिल सके, जिससे किसी भी बच्चे को कभी वंचित नहीं किया जाना चाहिए।