नई दिल्ली। पटियाला हाउस कोर्ट द्वारा दिल्ली सचिवालय पर छापे के दौरान जब्त कागजात तुरंत लौटाने के निर्देश के खिलाफ सीबीआइ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख करेगी। पटियाला हाउस विशेष सीबीआइ कोर्ट ने कल सुनवाई के दौरान कड़ी फटकार लगाते हुए जब्त फाइलें तत्काल लौटाने के साथ सीबीआइ को दी गई शक्ति का दुरुपयोग नहीं करने की सलाह दी थी।

गौरतलब है कि पिछले साल दिसंबर में दिल्ली सरकार के सचिवालय में मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर छापा मारा था और दिल्ली सरकार के कई कागजात जब्त कर लिए थे।

जब्त दस्तावेजों को दिल्ली सरकार को लौटाने का आदेश देते हुए अदालत ने कहा कि सीबीआइ को अपने ही बनाए कानूनों को तोड़ने के लिए दैवीय शक्ति नहीं दी जा सकती है। न्यायाधीश अजय कुमार जैन ने कहा कि सीबीआइ महज जांच के नाम पर दस्तावेजों को अपने पास नहीं रख सकती।

उसे बताना होगा कि दिल्ली सरकार के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के मामले में यह दस्तावेज किस प्रकार जरूरी हैं? सीबीआइ की तरफ से दिए गए तर्क अस्पष्ट हैं। महज यह कह देना की मामले की जांच अभी जारी है और जांच के नाम पर बेलगाम शक्ति प्राप्त करने का अधिकार उसे नहीं दिया जा सकता।

अदालत ने कहा कि मौजूदा दस्तावेजों को जब्त करना सीबीआइ के मैन्युअल के क्लाज 14.19 का उल्लंघन है। सीबीआइ को यह बनाने की जरूरत नहीं है कि वह अपने ही मैन्युअल के अनुसार काम करने के लिए बाध्य है।

सीबीआइ को अपार शक्ति व छूट मिलना उसे दैवीय शक्ति देने के समान है। उसे ऐसा करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। नियमों के मुताबिक ही काम करना होगा। महज यह कहकर कि जांच जारी है, वह सचिवालय से कोई भी दस्तावेज जब्त करने के लिए आजाद नहीं है।

वह ऐसा कोई दस्तावेज जब्त नहीं कर सकती, जिसका मामले से लेना-देना न हो। लिखित जवाब में सीबीआइ स्पष्ट तौर पर बता पाने में असमर्थ रही है कि उक्त दस्तावेज उसे क्यों चाहिए और मामले की जांच में क्या मदद मिलेगी।

अदालत ने कहा कि जिस तरह राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर छापेमारी की गई, उसे देखकर प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि पूरी कार्रवाई जल्दबाजी में की गई। छापेमारी से पहले प्राथमिक जांच नहीं की गई।

जब कोई नौकरशाह अपने पद पर हो और उसपर निजी फायदे के लिए पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगा हो तो सीबीआइ के लिए कार्रवाई करने से पहले प्राथमिक जांच करना बेहद जरूरी होता है। उक्त मामले में सीबीआइ ने महज मौखिक जानकारी के आधार पर मुकदमा दर्ज कर लिया, जिसे देखकर लगता है कि पूरी कार्रवाई जल्दबाजी में की गई है।

अदालत द्वारा जांच के दौरान अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना जांच को बाधित करना नहीं कहा जा सकता। अदालत ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले के आदेशों में स्पष्ट कहा है कि अगर जांच एजेंसी उसे कानूनी रूप से मिली ताकतों का गलत इस्तेमाल करती है और पीड़ित पक्ष अदालत से मदद की गुहार लगाता है तो उसके पास पूरा अधिकार है कि जांच एजेंसी को उसकी सीमा में रहने के लिए बाध्य करे।

सीबीआइ को जांच के लिए वापस लौटाए गए दस्तावेजों की दोबारा जरूरत है तो वह उसे कानूनी रूप से उसे प्राप्त कर सकती है। सीबीआइ को उक्त दस्तावेजों की फोटो कॉपी अपने पास रखकर असल कॉपी सरकार को लौटाने का आदेश दिया गया।

अदालत ने अर्जी का निपटारा करते हुए कहा कि जांच को एक माह का वक्त गुजर जाने के बाद भी सीबीआइ स्पष्ट तौर पर नहीं बता पाई कि उक्त दस्तावेजों का आइएएस अधिकारी पर दर्ज मामले से सीधा क्या संबंध है।

जब जांच एजेंसी सर्च वारंट उनकी इजाजत से प्राप्त करती है तो, उनके पास यह अधिकार है कि वह इस बात का ख्याल रखें कि अदालत द्वारा जांच एजेंसी को दी गई ताकत का गलत इस्तेमाल न किया जाए।

कार्रवाई के नहीं दिए आदेश

दिल्ली सरकार की उस अर्जी को भी खारिज कर दिया गया था, जिसमें छापेमारी करने वाले अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। अदालत ने कहा कि इस अर्जी में दम नजर नहीं आता।

Posted By: JP Yadav