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AI बताएगा जवाब, शिक्षक सिखाएंगे तर्क; CBSE ने बदली पढ़ाई की दिशा

Published: Wed, 09 Sep 2026 05:25 AM (IST)

सीबीएसई ने एआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच शिक्षा की दिशा बदली है, जहां शिक्षक अब केवल जानकारी देने वाले ...और पढ़ें

एआई जेनेरेटेड इमेज।

एआई जेनेरेटेड इमेज।

HighLights

  1. शिक्षक अब मार्गदर्शक, एआई उत्तरों की सत्यता जांचना सिखाएंगे।

  2. सीबीएसई ने कंप्यूटेशनल थिंकिंग पर शिक्षक प्रशिक्षण शुरू किया।

  3. विद्यार्थियों में तार्किक सोच, समस्या-समाधान क्षमता विकसित होगी।

रीतिका मिश्रा, नई दिल्ली। कक्षा में अब शिक्षक की भूमिका केवल पाठ पढ़ाने और सवालों के जवाब बताने तक सीमित नहीं रहने वाली है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) के बढ़ते इस्तेमाल के बीच विद्यार्थी किसी भी सवाल का उत्तर कुछ ही सेकंड में हासिल कर सकते हैं।

ऐसे में असली चुनौती यह होगी कि विद्यार्थी मिले हुए उत्तर को समझे, उसकी सत्यता जांचे और खुद उस पर तर्क कर सके। इसी बदलाव को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 के शिक्षक प्रशिक्षण का मुख्य विषय कंप्यूटेशनल थिंकिंग एंड अंडरस्टैंडिंग एआइ रखा है।

सीबीएसई की इसी पहल के तहत 20 और 21 नवंबर 2026 को पुणे में राष्ट्रीय शिक्षक सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन में कंप्यूटेशनल थिंकिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता को कक्षा शिक्षण से जोड़ने तथा शिक्षकों को बदलती तकनीकी जरूरतों के अनुरूप तैयार करने पर चर्चा होगी।

सीबीएसई का जोर विद्यार्थियों को केवल कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साधनों का इस्तेमाल सिखाने के बजाय उनकी तार्किक सोच, समस्या समाधान और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने पर है। तीसरी से आठवीं तक कंप्यूटेशनल थिंकिंग को सीखने की प्रक्रिया से जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है।

विद्यार्थियों को किसी बड़ी समस्या को छोटे हिस्सों में बांटकर उसका क्रमबद्ध और तार्किक समाधान निकालना सिखाया जाएगा।

शिक्षक की भूमिका होगी मार्गदर्शक की 

सीबीएसई अधिकारियों के मुताबिक एआइ के दौर में शिक्षक विद्यार्थियों के लिए जानकारी का एकमात्र स्रोत नहीं होंगे। उनकी भूमिका मार्गदर्शक और सीखने में सहयोगी की होगी। शिक्षक यह समझाने पर जोर देंगे कि एआइ से मिला हर उत्तर सही नहीं होता।

विद्यार्थी को तथ्यों की जांच करना, अलग-अलग स्रोतों से जानकारी का मिलान करना और गलत उत्तर को पहचानना सीखना होगा। इससे कक्षा में केवल सही उत्तर क्या है के बजाय उत्तर सही क्यों है और इस निष्कर्ष तक कैसे पहुंचे जैसे सवाल अधिक महत्वपूर्ण होंगे।

हर विद्यार्थी की जरूरत के अनुसार पढ़ाई

वहीं, प्रधानाचार्यों के मुताबिक एआइ आधारित साधनों से विद्यार्थियों की सीखने की गति और कमजोरियों का आकलन करने में मदद मिल सकती है। इससे शिक्षक यह तय कर सकेंगे कि किस विद्यार्थी को किस विषय या अवधारणा पर अधिक अभ्यास की जरूरत है।

आगे चलकर एक ही कक्षा के सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसी शिक्षण योजना के बजाय उनकी जरूरत के अनुसार अभ्यास और गतिविधियां तैयार करने पर जोर बढ़ सकता है।

गृहकार्य और परीक्षा का तरीका भी बदलेगा 

एआइ के कारण पारंपरिक गृहकार्य की उपयोगिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। निबंध, सामान्य उत्तर या परियोजना का बड़ा हिस्सा विद्यार्थी कुछ ही समय में एआइ की मदद से तैयार कर सकता है। ऐसे में विद्यालयों को ऐसे कार्य देने होंगे जिनमें विद्यार्थी की स्वयं की सोच और समस्या समाधान की क्षमता सामने आए।

एआइ आधारित शिक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी विद्यालयों में समान डिजिटल सुविधाओं की उपलब्धता है। बड़े निजी विद्यालयों में कंप्यूटर प्रयोगशालाएं, तेज इंटरनेट और आधुनिक उपकरण उपलब्ध हैं, जबकि कई छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी विद्यालय अभी भी कंप्यूटर, इंटरनेट और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं।

ऐसे में केवल प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू कर देना पर्याप्त नहीं होगा। शिक्षकों को लगातार प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और कक्षा में इसका व्यावहारिक इस्तेमाल सिखाने की जरूरत होगी।

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