AIIMS की बड़ी खोज: मोटापे की ‘जड़’ पर सीधा वार करने वाले प्रोटीन के रहस्य को किया उजागर; आसान इलाज की राह खुली
एम्स के वैज्ञानिकों ने मोटापे की जड़ पर सीधा प्रहार करने वाले प्रोटीन की खोज की है, जिससे इसके आसान इलाज की उम्मीद जगी है। यह प्रोटीन शरीर में वसा के जमाव को नियंत्रित करता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रोटीन को लक्षित करके मोटापे का प्रभावी इलाज किया जा सकता है, जिससे मधुमेह और हृदय रोग का खतरा भी कम होगा।

अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। दिल्ली एम्स के विज्ञानियों ने मोटापे का असली कारण समझने की दिशा में महत्वपूर्ण शोध किया है। विज्ञानियों ने मोटापे (ओबेसिटी) के रहस्य यानी चर्बी की बूंदों (लिपिड ड्रापलेट्स) के निर्माण और नियंत्रण को समझने में कामयबी हासिल की है। यह बताता है कि शरीर में चर्बी भंडारण को चलाने वाला प्रोटीन सेइपिन कई हिस्सों में किस तरह काम करता है और मोटापा, डायबिटीज व लिपोडिस्ट्राफी जैसे विकारों की जड़ कहां छिपी है।
आसान उपचार भी संभव हो सकेगा
सेइपिन किस तरह लिपिड ड्रापलेट्स को नियंत्रित करता है। यह शोध अध्ययन इस 27 नवंबर को नेचर कम्युनिकेशंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है और इसे मोटापा, डायबिटीज और जन्मजात चर्बी विकारों के इलाज में ‘गेम-चेंजर’ माना जा रहा है। दावा है कि यह खोज मोटापा और डायबिटीज उपचार के तंत्र को जड़ से बदल देने वाली है। इससे आसान उपचार भी संभव हो सकेगा।
क्या है खोज?
एम्स के शोध में पाया गया कि सेइपिन प्रोटीन का एक हिस्सा ल्यूमिनल डोमेन रीजन (एलआर) चर्बी जमा होने की प्रक्रिया का ‘ब्रेक सिस्टम’ है। पहले वैज्ञानिक मानते थे कि अगर यह एलआर हिस्सा न हो तो चर्बी की बूंदें बन ही नहीं सकतीं लेकिन एम्स के शोध ने साबित कर दिया कि बूंदें तो बनती हैं, पर उन पर एलआर के न होने से ‘नियंत्रण’ नहीं रहता और चर्बी अनियंत्रित तरीके से भरने लगती है।
इससे यह समझ आता है कि असली समस्या भूख, सुस्ती या ब्लड शुगर नहीं, बल्कि लिपिड मेटाबालिज्म (चर्बी चयापचय) का बिगड़ना है और यही मोटापे व डायबिटीज की जड़ है। इसलिए यह समझना कि ये बूंदें कैसे बनती हैं, बीमारी की जड़ पहचानने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शोध कैसे किया गया?
एम्स बायोटेक्नोलाजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मुख्य शोधकर्ता डाॅ. विनीत चौधरी ने बताया कि इस अध्ययन में यीस्ट माडल का प्रयोग किया गया। सेइपिन का एलआर हिस्सा हटाने पर भी चर्बी की बूंदें बन जाती हैं, लेकिन उनमें ट्राइग्लिसराल (टीएजी) जरूरत से ज्यादा भरने लगता है।
फ्लोरेसेंस माइक्रोस्कोपी और इलेक्ट्राॅन माइक्रोस्कोपी से पुष्टि हुई कि लिपिड बूंदों का बनना सामान्य रहता है पर, नियंत्रण पूरी तरह खो जाता है। सहशोधकर्ता अमित खत्री और रितिका चौधरी के अनुसार एलआर चर्बी के बंटवारे को संतुलित करता है यानी यह ‘गेटकीपर’ की तरह काम करता है।
इलाज पर प्रभाव: अब दवा जड़ पर लगेंगी
आज तक मोटापे का इलाज लक्षण-आधारित (सिम्पटम-बेस्ड) था। आज तक मोटापे और डायबिटीज का इलाज भूख कम करने वाली दवाओं या ब्लड शुगर नियंत्रित करने वाली दवाओं पर आधारित था।
इस शोध के बाद अब सीधे चर्बी नियंत्रण तंत्र पर दवाएं बनाई जा सकेंगी, जैसे सेइपिन एलआर को सक्रिय करने वाली दवा जो ओवरफिलिंग रोकेगी और वजन घटाने को प्राकृतिक बनाएगी।
हालांकि, अभी इसके क्लिनिकल ट्रायल में समय लगेगा पर, इसने उम्मीद जगा दी है। यह मोटापे से जूझ रहे लोगों के लिए एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत है। मुख्य शोधकर्ता डाॅ. विनीत चौधरी कहते हैं कि छोटी सी प्रक्रिया को समझने से बड़ी बीमारियों का इलाज बदल सकता है, यही इस शोध के खोज का असली संदेश है।

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