कैंसर की जड़ तक पहुंचेगा AI, IIIT-Delhi का 'म्यूटएआईवर्स' बताएगा कैसे हुई शुरुआत
आईआईआईटी-दिल्ली के शोधकर्ताओं ने 'म्यूटएआईवर्स' नामक एक एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो डीएनए में हुए नुकसान का विश्लेषण कर ...और पढ़ें

HighLights
आईआईआईटी-दिल्ली ने 'म्यूटएआईवर्स' एआई प्लेटफॉर्म विकसित किया।
यह डीएनए क्षति का विश्लेषण कर कैंसर के कारण खोजता है।
गुवाहाटी के मरीजों में धुआंरहित तंबाकू के संकेत मिले।
लोकेश शर्मा, नई दिल्ली। कैंसर का इलाज खोजने के लिए दुनिया भर में शोध हो रहा है, लेकिन एक बड़ा सवाल अब भी कायम है कि आखिर शरीर में वह कौन-सा कारण था, जिसने कैंसर की शुरुआत की?
दिल्ली के इंद्रप्रस्थ इंस्टीट्यूट आफ इंफार्मेशन टेक्नोलाजी (आईआईआईटी-दिल्ली) के शोधकर्ताओं ने इस सवाल का जवाब तलाशने की दिशा में अहम कदम उठाया है।
शोधकर्ताओं ने ‘म्यूटएआईवर्स’ नाम का जनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) प्लेटफार्म विकसित किया है, जो डीएनए में हुए नुकसान का विश्लेषण कर यह पता लगाने की कोशिश करता है कि शरीर किन संभावित रसायनों या पर्यावरणीय कारकों जैसे वायु प्रदूषण, कीटनाशक और कृषि रसायन और रेडिएशन के संपर्क में आया था।
इस तकनीक का परीक्षण असम के गुवाहाटी में सिर एवं गर्दन के कैंसर से पीड़ित 27 मरीजों के नमूनों पर किया गया। विश्लेषण में ऐसे संकेत मिले, जो धुआंरहित तंबाकू (स्मोकलेस टोबैको) के संपर्क से जुड़ते हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि डीएनए में किसी रासायनिक नुकसान की पहचान हो जाना इस बात का अंतिम प्रमाण नहीं है कि उसी नुकसान ने कैंसर पैदा किया। इसके लिए बड़े स्तर पर क्लीनिकल, प्रयोगशाला और महामारी विज्ञान से जुड़े अध्ययनों की जरूरत होगी।
बीमारी ही नहीं, बीमारी की वजह जानने पर जोर
कैंसर की जांच में आमतौर पर यह पता लगाया जाता है कि शरीर में बीमारी कहां है और उसका स्वरूप क्या है। म्यूटएआईवर्स का फोकस इससे एक कदम आगे जाकर कैंसर के संभावित कारणों का पता लगाने पर है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, हमारा शरीर लगातार वातावरण में मौजूद अलग-अलग रसायनों के संपर्क में आता है। प्रदूषण, तंबाकू, औद्योगिक रसायन या अन्य पदार्थ शरीर की कोशिकाओं में पहुंचकर डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी नुकसान से आगे चलकर जीन में बदलाव हो सकते हैं।
टीम ने इस प्रोजेक्ट पर 2023 में काम शुरू किया था। शुरुआत आईआईआईटी-दिल्ली की आहुजा लैब में आठ पीएचडी छात्रों की कोर टीम से हुई।
पांच रिसर्च और क्लिनिकल संस्थानों के 22 शोधकर्ता हुए शामिल
बाद में पांच रिसर्च और क्लिनिकल संस्थानों के 22 शोधकर्ता इसमें शामिल हुए। इसका जल्द ही पेटेंट कराया जाएगा और अस्पातालों की पहुंच के जल्द ही प्रयास किए जाएंगे।
आईआईआईटी-दिल्ली के कंप्यूटेशनल बायोलाजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के प्रमुख लेखक गौरव आहूजा ने बताया कि कैंसर होने के बाद आमतौर पर यह सवाल कम पूछा जाता है कि मरीज किस चीज के संपर्क में आया था।
उनका कहना है कि यदि कैंसर के संभावित पर्यावरणीय कारणों की पहचान हो सके तो मरीज के साथ उसके परिवार और आसपास के लोगों को भी भविष्य में उस जोखिम से बचाने में मदद मिल सकती है।
27 मरीजों में मिला तंबाकू का संकेत
शोध के दौरान गुवाहाटी के 27 सिर एवं गर्दन कैंसर मरीजों के नमूनों का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं को डीएनए में ऐसे बदलाव और क्षति के संकेत मिले, जो स्मोकलेस टोबैको यानी चबाने वाले तंबाकू के संपर्क से संबंधित हो सकते हैं।
भारत में खासतौर पर पूर्वोत्तर राज्यों में तंबाकू और सुपारी का सेवन सिर एवं गर्दन के कैंसर के प्रमुख जोखिम कारकों में माना जाता है। इसलिए अध्ययन में मिले परिणामों ने शोधकर्ताओं को इस तकनीक की संभावित उपयोगिता का महत्वपूर्ण संकेत दिया है।
एडडक्ट क्या होता है?
डीएनए एडडक्ट को सामान्य भाषा में ऐसे समझ सकते हैं कि किसी रसायन ने डीएनए के किसी हिस्से के साथ रासायनिक रूप से संपर्क किया और उसमें बदलाव पैदा किया।
यदि शरीर में ऐसे एडडक्ट मिलते हैं तो वे इस बात का संकेत दे सकते हैं कि व्यक्ति किसी विशेष रसायन के संपर्क में आया था। लेकिन यहां सबसे महत्वपूर्ण सावधानी भी है। एडडक्ट मिलना और कैंसर का कारण साबित होना दो अलग बातें हैं।
आईआईटी कानपुर के जैव विज्ञान एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर सरवनन मथेश्वरन के अनुसार, डीएनए एडडक्ट केवल यह बताता है कि किसी रसायन ने डीएनए के साथ संपर्क किया है।
यह जरूरी नहीं कि वही क्षति स्थायी म्यूटेशन में बदली हो या अंततः कैंसर का कारण बनी हो। शरीर की कोशिकाएं डीएनए की कुछ क्षतियों को ठीक भी कर सकती हैं।
अशोका विश्वविद्यालय के कंप्यूटेशनल बायोलाजिस्ट एवं जीव विज्ञान के प्रोफेसर केदार नटराजन के अनुसार, कैंसर पैदा करने वाले एक्सपोजर की जानकारी बीमारी की गंभीरता, उसमें मौजूद म्यूटेशन, इलाज और संभावित उपचार रणनीति को समझने में उपयोगी हो सकती है। लेकिन मौजूदा रूप में यह प्लेटफार्म अस्पतालों या आम लोगों के लिए इस्तेमाल होने वाला क्लीनिकल डायग्नोस्टिक टूल नहीं है।
भविष्य में क्या फायदा?
यदि बड़े स्तर पर इस तकनीक का सफलतापूर्वक सत्यापन होता है तो यह कैंसर की जांच में एक अतिरिक्त जानकारी दे सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी मरीज में किसी खास रसायन के संपर्क का संकेत मिलता है तो वह भविष्य में उस एक्सपोजर से बच सकता है। उसी तरह समान जोखिम वाले लोगों को भी सावधान किया जा सकता है।
भविष्य में म्यूटएआईवर्स को जीनोम सीक्वेंसिंग, क्लीनिकल जांच और अन्य वैज्ञानिक तकनीकों के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे डॉक्टरों और शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किसी मरीज में कैंसर के विकास के पीछे कौन-कौन से संभावित कारक रहे होंगे।
कैसे काम करता है म्यूटएआईवर्स?
- डीएनए की जांच: मरीज के कैंसर से जुड़े डीएनए में हुए बदलावों का अध्ययन किया जाता है।
- नुकसान की पहचान: शोधकर्ता डीएनए पर रसायनों से हुए खास तरह के नुकसान, जिन्हें डीएनए एडडक्ट्स कहा जाता है, तलाशते हैं।
- एआई का इस्तेमाल: प्लेटफार्म इन संकेतों का कंप्यूटेशनल और जनरेटिव एआई की मदद से विश्लेषण करता है।
- रसायन से मिलान: यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि डीएनए में मिला नुकसान किस संभावित रसायन या एक्सपोजर से जुड़ा हो सकता है।
- सिमुलेशन से जांच: प्लेटफार्म यह भी मॉडल करता है कि जहरीले रसायन शरीर की कोशिकाओं में टूटने के बाद किस तरह डीएनए के साथ प्रतिक्रिया कर सकते हैं।
- संभावित एक्सपोजर की पहचान: इससे मरीज के तंबाकू, पर्यावरणीय प्रदूषक या व्यावसायिक रसायनों जैसे संभावित संपर्कों की दिशा में सुराग मिल सकता है।
यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल साबित होती है तो कैंसर के संभावित कारणों को समझने में चिकित्सकों को महत्वपूर्ण मदद मिलेगी। मरीज में किस तरह का एक्सपोजर रहा है, इसकी जानकारी उपचार की रणनीति तय करने, जोखिम कारकों से बचाव और भविष्य में बीमारी की रोकथाम की दिशा में भी उपयोगी हो सकती है।
- डॉ. प्रज्ञा शुक्ला, विभागाध्यक्ष, क्लिनिकल आंकोलाजी, दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट
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