जागरण संवाददाता, नई दिल्ली : दिल्ली विश्वविद्यालय में सत्र 2013 से चार वर्षीय स्नातक कोर्स लागू करने के मसले पर विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों ने चिंता जाहिर की है। उनका तर्क है कि देशभर में कहीं भी चार वर्षीय स्नातक कोर्स नहीं होने के कारण इससे समस्या पैदा होगी। विश्वविद्यालय द्वारा इस कोर्स को अमलीजामा पहनाने के मकसद से ही 24 दिसंबर को एकेडमिक काउंसिल (एसी) की बैठक बुलाई गई है। इस बैठक से पहले प्राध्यापकों ने बृहस्पतिवार को ऑर्ट फैकल्टी के डीन प्रो. एच.एस. प्रसाद के साथ बैठक की ओर अपना विरोध जताया। प्राध्यापकों ने लिखित में अपना विरोध और समस्या गिनवाते हुए बकायदा एक ज्ञापन भी उन्हें सौंपा, जिसमें जर्मन एंड रोमन विभाग की प्राध्यापिका विभा मोर्या, डा. विजया वेंकटरमन, ज्योति सब्बरवाल ने लिखित में अपना विरोध जताया। प्रो. प्रसाद ने कहा कि वह कुलपति को प्राध्यापकों की बात से अवगत करा देंगे।

दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (डूटा) एग्जिक्यूटिव काउंसिल (ईसी) की सदस्य डा. आभा देव हबीब ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहीं भी चार साल के स्नातक का उल्लेख नहीं है। देश में प्लस 2 और फिर प्लस 3 का उल्लेख है। डीयू एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है। राष्ट्रीय स्तर पर किसी कमेटी की कोई रिपोर्ट नहीं है। इसके बावजूद डीयू के कुलपति अपनी मनमानी चला रहे हैं। सेमेस्टर की परेशानियों पर चर्चा और उसे रिवाइज करना तो दूर अब चार साल का स्नातक होने से परीक्षा संबंधी परेशानियां अधिक बढ़ जाएंगी। अभी एक सेमेस्टर की चार परीक्षाओं का परिणाम घोषित करने में ही डीयू प्रशासन को काफी परेशानी हो रही है। इसके बाद तो हर सेमेस्टर में पांच परीक्षाएं होंगी, जिससे परेशानी और बढ़ ही जाएगी। उनका कहना था कि कुलपति ने कुछ गिने चुने प्राध्यापकों को बुलाकर गुपचुप तरीके से मंत्रणा की है। लोकतांत्रिक तरीके से चार वर्षीय स्नातक कोर्स पर चर्चा नहीं हुई है। डीयू के प्राध्यापकों को तो मालूम तक नहीं है कि उसमें क्या सिलेबस है? अब 24 दिसंबर को एसी में चार वर्षीय स्नातक कोर्स लागू करने को लेकर सिंगल एजेंडा लाया जा रहा है, जो छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा।

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