नई दिल्ली, राज्य ब्यूरो : दिल्ली सरकार ने हाईकोर्ट में कहा है कि जब सरकार ने शहर में 961 स्कूल खोल रखे हैं, तो लोग पब्लिक स्कूलों की ओर क्यों भागते हैं? उन्हें इन स्कूलों में मोटी-मोटी फीस भरने की क्या दरकार है, लेकिन सरकार की यह दलील सुविधाओं के मामले में कहीं टिकती नहीं जान पड़ती। सरकार भले ही बेहतर रिजल्ट का दावा करती हो, लेकिन इन स्कूलों की हालत की तुलना निजी स्कूलों से किसी भी सूरत में नहीं की जा सकती। इस पूरे मामले पर पेश है दैनिक जागरण की रिपोर्ट।

दिल्ली की पौने दो करोड़ की आबादी के लिए सरकार ने शहर में 961 स्कूल खोल रखे हैं, जिसमें 14 लाख बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। शहर की आबादी का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन सरकार उसी तेजी से नए स्कूल नहीं खोल पा रही। परिणाम यह है कि एक-एक क्लास में 60 से 100 तक की संख्या में बच्चों को दाखिल कर दिया गया है। ऐसे में बच्चों की बेहतर पढ़ाई की बात बेमानी जान पड़ती है।

एक क्लास में 45 बच्चों की हुई थी सिफारिश

अशोक गांगुली कमेटी ने दिल्ली की स्कूली शिक्षा को लेकर सौंपी अपनी रिपोर्ट में यह सिफारिश की थी कि किसी भी क्लास में 45 से अधिक बच्चे नहीं होने चाहिए। ज्यादातर निजी स्कूलों में इस पद्धति का पालन किया जाता है, लेकिन सरकारी स्कूल ऐसा नहीं कर पा रहे।

शिक्षकों का है भारी अभाव

सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का भी भारी अभाव है। खुद सरकार भी यह मानती है कि इन स्कूलों में करीब आठ हजार शिक्षकों की कमी है। हालांकि यह कमी दस हजार से भी ज्यादा बताई जाती है। फिलहाल सरकारी स्कूलों में करीब 22 हजार शिक्षक काम कर रहे हैं।

कम से कम 100 स्कूलों की तत्काल जरूरत

जानकारों की मानें, तो जिस तेजी से दिल्ली की जनसंख्या में इजाफा हो रहा है, उसे देखते हुए शहर में तत्काल कम से कम 100 नए स्कूल और खोले जाने की जरूरत है, लेकिन जमीन की कमी का रोना रोकर सरकार ऐसा नहीं कर रही। शिक्षकों के अभाव में सभी स्कूलों को दोनों पाली में चलाने के काम को भी अंजाम नहीं दिया जा पा रहा। परिणाम यह है कि स्कूलों में बच्चों की भारी मारामारी है।

मंत्रियों, विधायकों के बच्चे क्यों नहीं पढ़ते सरकारी स्कूलों में

दिल्ली सरकार आम लोगों को भले ही सरकारी स्कूलों की राह दिखाती हो, लेकिन तमाम मंत्री, विधायक और आला अधिकारी तक इन स्कूलों को अपने बच्चों की पढ़ाई के काबिल नहीं समझते। शायद यही वजह है कि इनके परिवार से ताल्लुक रखने वाले बच्चे शहर के नामी पब्लिक स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं।

निजी स्कूलों की तुलना में सुविधाएं नहीं

दिल्ली में यह आम धारणा है कि इन स्कूलों को लेकर सरकार चाहे जो दावे करती हो, लेकिन हकीकत यही है कि पब्लिक स्कूलों की तुलना में इन स्कूलों की हालत बेहद खराब है। जिस प्रकार का माहौल निजी स्कूल उपलब्ध कराते हैं, उसकी तुलना में सरकारी स्कूल कहीं नहीं टिकते। इतना जरूर है कि निजी स्कूलों की भारी भरकम फीस न चुका पाने वाले लोग निहायत मजबूरी में सरकारी स्कूलों का रुख करते हैं।

सरकार ने भी शुरू की थी पब्लिक स्कूल खोलने की कवायद

दिल्ली सरकार ने खुद भी पब्लिक स्कूल खोलने की कवायद की थी और कहा गया था कि तमाम सुविधाओं से लैस ऐसा एक स्कूल प्रीत विहार में खोला जाएगा, लेकिन अब तक इस स्कूल की नींव नहीं रखी जा सकी है

सुरक्षा की दृष्टि से भी फिसड्डी हैं सरकारी स्कूल

पूर्वी दिल्ली के खजूरी खास इलाके में लड़कियों के एक स्कूल में भगदड़ से कई बच्चों की दर्दनाक मौत का मामला कोई बहुत पुराना नहीं हुआ है। बच्चों के निकलने का रास्ता नहीं होने की वजह से ऐसा हादसा हुआ। इस दुर्घटना ने स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े किए थे।

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