नई दिल्‍ली, अंशु सिंह। Friendship Day 2021 दोस्तो, आपदा के समय भी अवसर कैसे तलाशा जा सकता है? कैसे कुछ नया एवं सार्थक किया जा सकता है, इसकी बानगी बीते करीब डेढ़ वर्षों में काफी देखने को मिली। साल 2020 की घटना है। स्कूल-कालेज बंद हो गए थे और सब कुछ वर्चुअल होने लगा था। तब एजुकेशन इनोवेशन कंपनी ‘ओन एकेडमी’ ने ‘रिअल वर्ल्ड चैलेंज आउटब्रेक-वाट नेक्स्ट’ नाम से एक ग्लोबल आनलाइन प्रतियोगिता आयोजित की, जिसमें 36 देशों के बच्चों ने हिस्सा लिया और अपने क्रिएटिव आइडियाज पेश किए थे।

भारत की कृष्णा सिंह भी उनमें से एक थीं, जिन्होंने फिलीपींस की दिशिता के साथ मिलकर ‘एडुनेशन’ नाम से एक आनलाइन प्लेटफार्म लांच किया, जो डिसलेक्सिक बच्चों के लिए काम करता है। प्रतियोगिता में इन्हें ग्रैंड प्राइज भी प्राप्त हुआ। कृष्णा ने बताया कि हम दोनों प्रतियोगिता के दौरान ही मिले। दोनों को कम्युनिटी सर्विस करना पसंद था। इसलिए साथ मिलकर आइडिया पर काम किया। हमने देखा था कि कैसे महामारी के कारण सामान्य बच्चों की तरह डिसलेक्सिक बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है। इससे उनकी मानसिक स्थिति पर भी असर पड़ा है। लिहाजा, हमने उनके लिए आनलाइन क्लासेज शुरू करने का फैसला लिया। इस प्रोजेक्ट के लिए हम शिक्षाविदों, वालंटियर्स आदि की मदद ले रहे हैं।

अनजाने आए साथ, बढ़ाया मदद का हाथ : इसमें दो मत नहीं कि कोरोना काल में बच्चों ने अपनी क्रिएटिविटी को नया आयाम दिया। लेकिन ऐसे प्लेटफार्म कम ही रहे, जहां वे अपनी क्रिएटिविटी, आइडियाज, इनोवेशंस को शेयर कर सकें। अन्वी त्यागी एवं साची गुप्ता ने जरूर ‘वी हेल्प आवरसेल्वस’ (डब्ल्यूएचओ) प्लेटफार्म शुरू किया, जहां बच्चे-किशोर वीडियोज के जरिये अपना हुनर (कुकिंग, कोडिंग, आर्ट, फिल्ममेकिंग) दिखा सकते हैं। अन्वी कहती हैं कि हम हर बच्चे को एक मौका देना चाहते हैं जिससे वे अपनी पसंद की स्किल सबके साथ साझा कर सकें। इससे अन्य बच्चे भी अपनी रचनात्मकता को तलाशने के लिए प्रेरित होंगे। चेन्नई के आठवीं कक्षा के स्टूडेंट वेदांत भी एक-जैसी रुटीन को फालो करते-करते बोर हो गए थे। एक दिन उन्हें ‘टीच इंग्लिश इनिशिएटिव’ अभियान की जानकारी मिली। उन्होंने अपने दोस्तों से भी इस बारे में बात की और फिर एक अनूठी शुरुआत हो गई। वेदांत बताते हैं, हम कुछ दोस्त हफ्ते में एक या दो दिन ऐसे बच्चों को फोन करते हैं, जिनकी अंग्रेजी कमजोर होती है या उन्हें नहीं आती है। इससे पढ़ाने के साथ-साथ नये बच्चों को जानने का भी मौका मिलता है।

चार सहेलियों ने लांच किया स्टार्टअप : दिल्ली की लावण्या अक्सर देखा करती थीं कि उनके घर में काम करने वाली सहायिकाओं को कैसे अपनी या परिवार के सदस्यों की चिकित्सा के लिए दर-दर भटकना पड़ता था। बावजूद इसके, उन्हें सही उपचार नहीं मिल पाता था। इसके बाद उन्होंने स्कूल की अपनी तीन अन्य दोस्तों से इस मुद्दे पर बात की कि आखिर ऐसे लोगों के लिए क्या किया जा सकता है? सभी ने ‘टेली-मेडिसिन’ क्षेत्र को लेकर रिसर्च किया। विशेषज्ञों से सलाह-मशविरा किया और फिर ‘टेली-उपचार’ नाम से वेबसाइट लांच कर दी। इसे इन चारों ने मिलकर डेवलप किया। लावण्या बताती हैं, ‘जब कोविड की दूसरी लहर आई और स्वास्थ्य सेवाओं पर अचानक से दबाव बढ़ गया, तब हमारी टीम ने पीड़ितों के लिए प्लाज्मा व आक्सीजन की व्यवस्था करने, दवाइयां पहुंचाने के साथ-साथ घर में क्वारंटाइन मरीजों को डाक्टरों से कनेक्ट कराया। उन्होंने वृद्धाश्रम एवं अनाथालयों में रहने वालों तक की मदद की। हमारी टीम विशेषज्ञ चिकित्सकों के अलावा लोगों को मनोचिकित्सकों एवं योग गुरुओं से भी जोड़ती है, क्योंकि यह ऐसा वक्त है, जब हर कोई शारीरिक के साथ मानसिक परेशानियों से जूझ रहा है।‘ लावण्या, उनकी दोस्त वालंटियर्स एवं अन्य स्वयंसेवी संगठनों की मदद से देश के अन्य शहरों में जरूरतमंदों की सेवा कर रही हैं। समय-समय पर मानसिक स्वास्थ्य पर वेबिनार आदि भी आयोजित करती हैं। टीम की सदस्य वृंदा भोला कहती हैं कि समाज के लिए कुछ कर पाने से बहुत खुशी मिलती है। अच्छी बात यह है कि इसमें हमारे पैरेंट्स, स्कूल, टीचर्स एवं दोस्तों का भी पूरा सहयोग मिलता है। लावण्या बताती हैं कि वे पढ़ाई और समाजसेवा में संतुलन बनाकर चलती हैं। सभी साथियों की आपस की समझदारी अच्छी है। सभी एक-दूसरे को प्रेरित करते रहते हैं।

मदद के लिए आगे आया दोस्तों का समूह : मध्य प्रदेश के कटनी में दस दोस्तों के समूह ने तो कमाल ही कर दिखाया। वे न सिर्फ कोविड-19 से पीड़ित मरीजों को भावनात्मक सहयोग देने का प्रयास करते हैं, बल्कि उनकी काउंसिलिंग भी करते हैं। ‘फ्रेंड्स स्टूडियो’ नामक इस समूह के एक अहम सदस्य वंदित मलिक बताते हैं, ‘शहर में स्थित कोविड केंद्रों की स्थिति को देखकर हमें एहसास हुआ कि मरीजों पर पूरा ध्यान नहीं दिया जा रहा है। मरीजों की संख्या अधिक होने से डाक्टरों पर अत्यधिक दबाव पड़ रहा है। तब हमने इन केंद्रों पर स्वेच्छा से सेवाएं देने का निर्णय लिया। हम मरीजों का आक्सीजन लेवल चेक करने से लेकर उनका मनोबल बढ़ाने की कोशिश करते थे। इससे काफी फर्क आने लगा।‘ मलिक कंप्यूटर साइंस के स्टूडेंट हैं, जो सैनफ्रांसिस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं। मार्च 2020 में वह भारत लौटे थे। उसके बाद से यहीं हैं। वह कहते हैं, ‘वैसे तो हम 2016 से ‘फ्रेंड्स स्टूडियो’ चला रहे हैं। इसके जरिये हम गरीब बच्चों को पढ़ाया करते थे। उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी करने का प्रयास करते थे। लेकिन कोरोना काल में इसका और विस्तार हो गया। हमने सड़क पर रहने वाले पशुओं को चारा आदि भी उपलब्ध कराया। अपने इलाके से गुजरने वाले प्रवासी मजदूरों को राशन दिया। इसके अलावा, जो लोग घर में आइसोलेशन में हैं या जिन बुजुर्गों को जरूरत होती है, उन्हें भी हम मदद पहुंचाते हैं। उनके लिए भोजन की व्यवस्था करने से लेकर उनके साथ बातें करके उनका मनोबल बढ़ाते हैं।‘

आनलाइन अभियान : कोरोना काल में बच्चों-किशोरों का स्क्रीन टाइम बढ़ गया है। अभिभावक इससे खासे चिंतित हैं। खुद युवाओं में इससे कई प्रकार की समस्याएं आ रही हैं। लेकिन कहते हैं न कि हर चीज का एक सकारात्मक पक्ष होता है। जैसे, मुंबई के कुछ किशोरों ने 24 घंटे इसलिए मोबाइल फोन थामे रखा ताकि जरूरतमंदों तक मदद पहुंचाने में देर न हो। किशोरों-युवाओं द्वारा संचालित इस ‘अनकट’ नामक अभियान का नेतृत्व करने वाली स्वधा बताती हैं, ‘हमारे साथ दर्जनों वालंटियर स्टूडेंट्स जुड़े हैं, जो शहर एवं देश में उपलब्ध मेडिकल सुविधाओं का आनलाइन डाटा बेस तैयार करते हैं। वालंटियर्स लगातार सामान की आपूर्ति आदि को लेकर सूचनाएं अपडेट करते रहते हैं। कई बार मरीजों के रिश्तेदारों की कॉल आधी रात में भी आती हैं, तो उन्हें अटेंड करना होता है। क्योंकि अगर हम किसी एक का जीवन भी बचा सके, तो उससे बड़ी बात क्या हो सकती है।‘

इनोवेशन कर निभायी जिम्मेदारी : आज हमारे आसपास कई नये रोल माडल्स हैं। जैसे आइआइटी मद्रास के मैकेनिकल इंजीनियरिंग ब्रांच के स्टूडेंट सात्विक बाटे। महामारी के बीच एक दिन जब संस्थान के प्रोफेसर्स ने स्टूडेंट्स के समूह के सामने चैलेंज रखा कि वे कुछ ऐसा बनाकर दिखाएं,जिससे कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में डाक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की मदद की जा सके,तो सात्विक आगे आए। उन्होंने बिना समय गंवाए साथी स्टूडेंट्स एवं मेंटर्स से बातचीत की और 24 घंटे के भीतर एक प्रोटोटाइप विकसित कर दिखाया। सात्विक बताते हैं,‘हमारे प्रोफेसर्स ने कुछ सार्थक करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन तब लाकडाउन के कारण लाजिस्टिक्स को लेकर थोड़ी मुश्किलें आईं। फिर भी कहते हैं न कि नीयत अच्छी हो, तो राह मिलने में देर नहीं लगती। हम साधारण स्टेशनरी आइटम से कम कीमत का फेसशील्ड तैयार करने में सफल रहे। इसके निर्माण में चेन्नई स्थित आटोमेटिव स्टार्टअप ‘सीवाई4‘के अलावा, आइआइटी मद्रास के प्री-इंक्यूबेटर सेल ‘निर्माण‘ का भी साथ मिला। ‘एक्सिस डिफेंस लैब‘ के संस्थापक सात्विक कहते हैं,‘फेसशील्ड बनाते समय हमने सेफ्टी को सबसे अधिक प्राथमिकता दी है। इस फेसशील्ड की खास बात यह रही कि इसे री-यूज भी किया जा सकता है, जिसके लिए सिर्फ वाइजर को रोजाना बदलना होगा। इसके अलावा, हमारी कोशिश है कि बिक्री से होने वाले लाभ से जरूरतमंदों को निःशुल्क फेसशील्ड उपलब्ध कराएं।’

Edited By: Sanjay Pokhriyal