रणविजय सिंह, नई दिल्ली

दिल्ली सरकार के अंतर्गत स्वायत्तशासी संस्थान यकृत व पित्त विज्ञान संस्थान (आइएलबीएस) में राष्ट्रीय बायो बैंक (टिश्यू बैंक) बनेगा। केंद्र सरकार का बायोटेक्नोलॉजी विभाग आइएलबीएस में इसका निर्माण करा रहा है ताकि लिवर की बीमारियों पर बेसिक व क्लीनिकल शोध हो सके। यह देश में अपनी तरह का पहला बायो बैंक होगा, जिसका दूसरे संस्थान भी शोध में इस्तेमाल कर सकेंगे। इस साल के अंत तक यह बायो बैंक शुरू हो जाएगा।

आइएलबीएस के डॉक्टरों का कहना है कि इसके खुलने से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि देश में अब तक हर तरह के शोध के लिए पहले चूहे, खरगोश आदि के नमूनों पर ही शोध होता है, क्योंकि ऐसा कोई बायो बैंक नहीं है जहां मरीजों से जांच के मकसद से लिए गए विभिन्न प्रकार के सैंपल को सुरक्षित रखा जा सके और बाद में उसका इस्तेमाल लिवर के बीमारियों पर शोध में हो सके। इसलिए शोध को बढ़ावा देने के लिए बायो बैंक बनाया जा रहा है। अस्पताल के साइटो पैथोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. छगन बिहारी ने कहा कि इस बायो बैंक में मरीजों के ब्लड व ऊतक के सैंपल को लिक्विड नाइट्रोजन की मदद से 5 से 10 वर्षो तक सुरक्षित रखा जा सकेगा। इसका इस्तेमाल लिवर की बीमारियों की जांच व इलाज की नई तकनीक विकसित करने में होगा। मौजूदा समय में क्लीनिकल शोध के लिए पहले लोगों से सैंपल जुटाए जाते हैं और उसका एनालिसिस किया जाता है। इस प्रक्रिया में ही तीन साल गुजर जाता है। वहीं बायो बैंक होने पर आसानी से सैंपल उपलब्ध हो सकेगा।

उन्होंने कहा कि देश में कई ऐसे अनुसंधान संस्थान हैं, जहां विभिन्न बीमारियों पर बेसिक शोध होता है लेकिन उनके पास मरीज उपलब्ध नहीं होते। इस वजह से जांच के नए मार्कर के तलाश के लिए भी पहले चूहे, खरगोश आदि के सैंपल पर परीक्षण किए जाते हैं जबकि जंतुओं और मानवों के नमूनों में अंतर होता है। इसलिए बेसिक शोध करने वाले अनुसंधान संस्थान भी इस बायो बैंक में सुरक्षित रखे गए इंसानों के नमूनों का इस्तेमाल कर सकेंगे। दूसरे अस्पताल यहां नमूने लाकर सुरक्षित रख सकते हैं और यहां संरक्षित नमूनों पर शोध कर सकते हैं। मेडिकल शोधार्थियों को भी इससे फायदा होगा। वे कम समय में अपना प्रोजेक्ट पूरा कर सकेंगे।

Posted By: Jagran