जासं, नई दिल्ली : आजादी के बाद आर्थिक परिदृश्य में सभी पार्टी ने बहुत काम किया है। देश का विकास हुआ, लेकिन सामाजिक न्याय अभी तक नहीं हुआ है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के मुताबिक जिस देश में सबसे ज्यादा भूखे रहते हैं। 60 करोड़ लोग एक हजार रुपये महीने में जीवन यापन करते हैं। उस देश में प्रत्येक वर्ष चुनाव आयोजित होते हैं और देश पूरे पांच साल तक चुनाव मूड में रहता है। देश में गरीबी दूर करने का मूड बनता ही नहीं है। देश का लोकतंत्र चुनाव तंत्र बन गया है। जिसके पीछे शासन प्रणाली भी जिम्मेदार है और इस शासन प्रणाली में बदलाव की जरूरत है जिसके लिए एक आयोग गठित होना चाहिए। यह बातें पूर्व केंद्रीय मंत्री, हिमाचल प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा सासद शांता कुमार ने कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया में 'भारत में राष्ट्रपति प्रणाली : कितनी जरूरी, कितनी बेहतर' किताब के विमोचन के दौरान कही। इस दौरान पूर्व विदेश राज्य मंत्री और तिरुअनंतपुरम से काग्रेसी सासद शशि थरूर ने कहा कि यह सही वक्त है जब हमें विश्व के सबसे बड़े जनतंत्र की उन्नति के लिए अन्य उपलब्ध बेहतर विकल्पों के बारे में सोचना है। पुस्तक के लेखक भानु धमीजा ने कहा कि 18 साल तक अमरीका की संसदीय प्रणाली का अध्ययन करने और भारत की संसदीय प्रणाली की कमिया देखने के बाद मैं इस परिणाम पर पहुंचा कि वर्तमान संसदीय प्रणाली हमारे जैसे बड़े और विविधतापूर्ण देश के लिए अनुपयुक्त है।

Posted By: Jagran

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