यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jul 01, 2016 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
संस्कृत को उचित स्थान देने की मांग
जासं, पश्चिमी दिल्ली : नई शिक्षानीति में संस्कृत को उचित स्थान नहीं देने की बात कहते हुए संस्कृत श

जासं, पश्चिमी दिल्ली :
नई शिक्षानीति में संस्कृत को उचित स्थान नहीं देने की बात कहते हुए संस्कृत शिक्षक संघ ने नाराजगी जताई है। संघ ने कहा कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से जारी नई शिक्षानीति 2016 में संस्कृत को उचित स्थान नहीं दिया गया है। पूर्ववर्ती सरकारों की ओर से जारी शिक्षानीति 1968 व 1986 में संस्कृत को सम्मानित स्थान दिया गया था,परंतु इस बार संस्कृत के लिए औपचारिकता निभाई गई है। संस्कृत शिक्षक संघ दिल्ली ने समय-समय पर शिक्षानीति निर्माण समिति, मानव संसाधन विकास मंत्रालय व प्रधानमंत्री को ज्ञापन सौंपे , जिनमें संस्कृत के उत्थान का निवेदन किया गया। इनमें प्रमुख रूप से अखिल भारतीय संस्कृत शिक्षाबोर्ड खोलने, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय बनाने, सभी केंद्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभाग खोलने, संस्कृत विश्वविद्यालयों तथा विद्यालयों को स्किल्ड इंडिया, डिजिटल इंडिया से जोड़कर उनमें आयुर्वेद, फार्मेसी, योग, संगीत आदि रोजगार परक पाठ्यक्रम लागू करने, विदेशों में संस्कृत केंद्र स्थापित करने, पांच लाख संस्कृत पाडुलिपियों पर अनुसंधान हेतु हाईटेक केंद्रों को खोलने की मांग की गई। साथ ही संस्कृत में निहित ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक विषयों में जोड़ने के लिए निवेदन किया था। इस मांग की ओर ध्यान नहीं दिया गया है। संस्कृत शिक्षक संघ दिल्ली ने अपनी मागों को शिक्षानीति में सम्मिलित करने का अनुरोध किया है। उच्च, तकनीकी व प्रबंधन शिक्षा का माध्यम भारतीय भाषाओं को बनाने के लिए निवेदन किया है। बैठक में डॉ.वी दयालु, डॉ. ब्रजेश गौतम, डॉ.श्री कृष्ण सेमवाल,डॉ रीता शर्मा व सुशील कुमार आदि उपस्थित थे।
