संजय मांजरेकर का कॉलम:

मुझे संदेह है कि राशिद खान को ऐसा मैच फिर कभी मिल सकेगा। यहां तक कि आप इसे सपना सच होने जैसा प्रदर्शन भी नहीं कह सकते क्योंकि सपने में भी कुछ न कुछ वास्तविकता रहती है। जरा देखिए क्वालीफायर-2 में उन्होंने क्या किया। 

अधिकतर लोग नहीं जानते होंगे कि राशिद ने जब क्रिकेट खेलना शुरू किया था तब उन्होंने एक बल्लेबाज के तौर पर पहचान बनाने की ठानी थी। इससे बल्लेबाजी में उनके प्रभावशाली प्रदर्शन की वजह पता चलती है मगर उनकी गेंदबाजी ही है जो उन्हें चैंपियन बनाती है। दो प्लेऑफ में से पहले में उन्होंने चार ओवर में 11 रन देकर दो जबकि ईडन में दूसरे प्लेऑफ में चार ओवर में 19 रन देकर तीन विकेट लिए। यह असाधारण प्रदर्शन है। उनकी लेग स्पिन और गुगली विदेशी ही नहीं भारतीय बल्लेबाजों को भी परेशान करती है। बल्लेबाज के तौर पर जब आप गेंदबाज की बैक ऑफ द हैंड गेंद देख लेते हैं तो आपको अंदाजा लग जाता है कि गुगली आएगी या नहीं, लेकिन राशिद के मामले में यह थ्योरी आपको भारी पड़ सकती है। वह आपको बैक ऑफ द हैंड खेलने का मौका तो देते हैं, लेकिन उसके बाद अंगुलियां इस तरह घुमाते हैं कि आप उसे लेग स्पिन समझने की भूल कर बैठते हैं और भंवर में फंस जाते हैं। ऐसे में आपके पास गेंद को हवा में अपने पास आते हुए देखकर उसके घूमने का अंदाजा लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। 

फाइनल की बात करें तो सीएसके की टीम बेहद संतुलित है और फंसे मुकाबलों में दबाव से उबरना उसे आता है। हालांकि थोड़ी मिसफील्ड और कैच छोडऩा इस टीम को भारी पड़ सकता है। इसके अलावा 17 से 20 ओवरों की डेथ गेंदबाजी भी चिंता की बात है। इस काम को अंजाम देने के लिए उन्हें अब भी भरोसेमंद गेंदबाज की तलाश है। 

जहां तक सनराइजर्स हैदराबाद की बात है तो उसके लिए टीम की बल्लेबाजी चिंता की बात है। यह बात हैरान करती है कि इस तरह की बल्लेबाजी के बावजूद टीम ने टूर्नामेंट में इतना आगे तक का सफर तय कर लिया। मैं सीएसके को खिताब के दावेदार के रूप में देख रहा हूं क्योंकि उनके पास टेंपरामेंट है मगर फिर हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सनराइजर्स के पास राशिद खान हैं। 

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